पितृसत्ता : ब्राह्मणिक बनाम अब्राहमिक

आभासी दुनिया की एक विदुषी मित्र ने कुछ समय पहले धर्म परिवर्तन की घोषणा की। वे कुछ हिंदू महानुभावों से उत्पीड़ित थीं, इसलिए यह निर्णय उन्होंने किया था। उन्होंने इसकी बाक़ायदा घोषणा सोशल मीडिया पर की और धर्म परिवर्तन की तिथि भी बताई।

मुझे बहुत हैरानी हुई। इसलिए नहीं कि उन्होंने धर्म परिवर्तन का निर्णय लिया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने नए धर्म के रूप में ईसाइयत का चयन किया था। उन्होंने जैनिज़्म अथवा बुद्धिज़्म का चयन किया होता, तब मुझे इतना आश्चर्य नहीं होता और अगर सिख धर्म अंगीकार करने की घोषणा की होती, तो बिलकुल भी नहीं होता। इसलिए कि वे पढ़ी-लिखी ही नहीं हैं, बल्कि पढ़ती-लिखती हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, वे विदुषी हैं।

मेरे मन में मंथन शुरू हुआ – फिर यह क्या? क्या धर्म परिवर्तन का फैसला इतना आसान और सरल है? क्या वह चाय का अनायास टूट गया कप उठा कर कचरापात्र में फेंक देने के समान है? क्या यह प्रतिदिन स्नान के पश्चात वस्त्र बदल लेने के सदृश है? क्या उन्होंने धर्मों के विषय में पर्याप्त नहीं पढ़ा? क्या उन्होंने इनके सिद्धांतों पर एक नज़र तक नहीं डाली? क्या उन्होंने इनके अनुयायियों के आचरण के विषय में कोई खोज-खबर नहीं ली?

इस मंथन के बाद मुझे अपनी जानकारी पर संशय होने लगा। सोचा, हो सकता है कि मैं ही ग़लत होऊं। हो सकता है कि मेरे अध्ययन में ही कहीं कोई कमी हो। हो सकता है कि उन्होंने कुछ ऎसी दृष्टि सभी धर्मों के आधारभूत ग्रंथों पर डाली हो, जिसकी पहली सीढ़ी तक मैं अभी पार नहीं कर पाया होऊं। हो सकता है कि धर्म, मज़हब, रिलीजन, पंथ, सम्प्रदाय आदि का मेरा अध्ययन अभी कच्चा हो।

दो-चार दिन मैं इस वैचारिक स्थिति यानी ऊहापोह में रहा, फिर मैंने सभी धर्मों के ऐसे ग्रंथ निकालने शुरू किए, जिनसे हम उनमें नारी की स्थिति, उसका अस्तित्व, उसका स्थान आदि जान सकते हैं और इनका अध्ययन शुरू किया।

कुछ समय गुज़र गया। और अचानक मैंने देखा कि उन्होंने अपना फैसला बदल दिया है। मित्र पर पड़े सामाजिक दबाव ने उन्हें विवश किया कि वे अपना निर्णय बदल दें। मेरे लिए यह मिले-जुले भावों की खबर थी।

जिन रिलीजन या मज़हबों का परम-चरम लक्ष्य महज़ संख्या बढ़ाना है, उनके लिए ही यह खराब, बुरी अथवा हानिकारक खबर हो सकती है।

जिस धर्म का मूल सिद्धांत ‘वसुधैव कुटुंबकम’ है, उसके लिए कैसा परिवर्तन? उसके लिए आप जो पहले थे, वही अब भी हैं। एक पुण्यात्मा। आपने अपनी उपासना पद्धति बदली है, लेकिन नत उसी ईश्वर, उसी परम पिता, उसी परमेश्वर के समक्ष हो रहे हैं।

फिर भी मैं पता नहीं क्यों प्रसन्न हुआ कि मेरी मित्र एक गहन गह्वर में गिरने से बच गईं। इसके बावजूद कुछ दिन मैंने धार्मिक ग्रंथों में नारी की स्थिति और तथाकथित नारीवाद आदि पर पढ़ना जारी रखा। लेकिन जैसा कि मानवीय स्वभाव है, कुछ दिन बाद मेरे अवचेतन में संभवतः यह विचार घर कर गया कि मित्र ने विचार त्याग दिया, तो छोड़ो। अब कैसा अध्ययन? कैसा विचार? और मैं लापरवाह हो गया।

कुछ समय पूर्व कुछ कूढ़मग़ज़ महिलाओं ने भारत आए ट्विटर के सीईओ की आभा का नाजायज़ फायदा उठाया। उसे एक प्लेकार्ड थमाया, जिस पर लिखा था – ‘Smash Brahminical Patriarchy.’ (ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर प्रहार हो)। एक शानदार तसवीर उतरवाई गई और उसे प्रसारित कर दिया गया। उधर से माफी मांग ली गई। सफाई दी गई कि उन्हें पता नहीं था कि उन्हें क्या भेंट किया गया है और खेद प्रकट कर दिया गया।

यह एक अद्भुत घटना है। इस मायने में नहीं कि देश के अंदरूनी मामलों में विदेशियों के इस्तेमाल का यह एक श्रेष्ठ उदाहरण है, बल्कि इसलिए कि इसके बाद देशभर में जो उत्पात हुआ, वह अनुपम है। सभी की अपनी परिभाषाएं हैं। सभी का अपना गणित है। सभी के अपने तर्क-वितर्क हैं। अभाव केवल एक चीज़ का है, और वह है अपने समाज, संस्कृति, समय और इतिहास का ज्ञान। बिना पढ़े, बिना सोचे, बिना विचारे, बिना समझे, जतन से स्थापित की गई अवधारणाओं पर कदमताल करना हम भारतीयों का पसंदीदा मनोरंजन है।

पश्चिम की किसी विदुषी ने अपने समाज पर कोई टिप्पणी की है। वह फ़ौरन हम अपने समाज पर थोप देते हैं। पश्चिम के आचरणीय विकल्प क्या हैं और हमारे क्या, इस पर विचार किए बिना उनकी अवधारणाएं हम अपने मस्तिष्क पर लाद लेते हैं। और भी अज़ब प्रतिक्रियाएं हमारी होती हैं।

क्रमशः…

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