विषैला वामपंथ : सिविल राइट्स-2

गतांक से आगे…

भीषण सामाजिक विषमता, अत्याचारों और अन्याय की पृष्ठभूमि में अमेरिका में 1950 और 60 के दशक में सिविल राइट्स मूवमेंट की शुरुआत हुई। इसके नेता बन कर उभरे डॉ मार्टिन लूथर किंग।

डॉ किंग के नेतृत्व में लोगों ने विशाल रैलियाँ निकालीं, फ्रीडम राइड्स में भाग लिया, बसों का सामूहिक बहिष्कार किया। ऐसा नहीं है कि इसमें सिर्फ अश्वेत शामिल थे, इन घटनाओं ने पूरे अमेरिका के मानस को जगा दिया और बड़ी संख्या में श्वेत जनसँख्या ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया।

डॉ मार्टिन लूथर ने पूरी तरह से शांतिपूर्ण और द्वेषरहित आंदोलन का आह्वान किया और उन्हें विश्व ने अमेरिकी गांधी की संज्ञा दी। 1964 में उनकी हत्या हो गयी और उसी वर्ष सिविल राइट्स एक्ट के द्वारा लिंडन जॉनसन की सरकार ने अमेरिका में सेग्रीगेशन और भेदभाव को समाप्त करने की घोषणा कर दी। अगले कुछ वर्षों में तेजी से कई ऐसे कानून बने जिसने ‘जिम क्रो’ को इतिहास की चीज बना दिया।

लेकिन इतने बड़े अन्याय की पृष्ठभूमि हो, उसके लिए आंदोलन हो और वामपंथी उसका फायदा उठाने से चूक जाएं और अपनी वर्ग संघर्ष की प्रयोगशाला ना लगाएं, यह हो नहीं सकता।

बड़ी संख्या में कम्युनिस्टों ने इस आंदोलन में घुसपैठ कर ली। यह आंदोलन देखते ही देखते हिंसक प्रदर्शनों में बदल गया। लाखों की भीड़ सड़क पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए उतरती, लेकिन उसमें किसी एक कोने से कोई हिंसा और आगज़नी की चिंगारी छोड़ देता और एक अहिंसक गाँधीवादी प्रदर्शन रेसिज़्म और नस्ली दंगों में बदल जाता।

फिर पुलिस हिंसा को कण्ट्रोल करने के लिए गोलियां चलाती, और लोग मरते। इससे आने वाले और अधिक उग्र प्रदर्शन और दंगों के लिए और मसाला मिलता। आपको पिछले चार सालों में भारत में हुए अनेक प्रदर्शनों में, जाट आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, पटेल आंदोलन, सोनपेड की घटना के बाद हुए दलित प्रदर्शन जैसे अनेक आंदोलनों में इस रणनीति की झलक दिखाई देगी।

अमेरिका में सिविल राइट्स आंदोलन का ही एक और बड़ा नाम है मैल्कॉम एक्स। बीस वर्ष की उम्र में मैल्कॉम लिटिल नाम का एक अश्वेत व्यक्ति चोरी के आरोप में जेल गया। वहां उसकी मुलाकात अन्य अपराधियों से हुई और उसी में से एक के प्रभाव में आकर वह कम्युनिस्ट बन गया।

उसने अपना नाम बदल कर मैल्कॉम एक्स रख लिया। उसने इस्लाम भी स्वीकार कर लिया और अपने आप को शाहबाज़ मालिक भी कहने लगा।

उन दिनों अमेरिका में डेट्रॉइट में नेशंस ऑफ़ इस्लाम (NOI) नाम की एक संस्था थी, जो अश्वेत अमेरिकनों को इस्लाम में कन्वर्ट करने का काम करती थी। मैल्कॉम एक्स इस संस्था का एक प्रमुख सदस्य बन गया। उसने इस संस्था का खूब विस्तार किया और मुक्केबाज क्लेशियस क्ले (मुहम्मद अली) और उपन्यास ‘रूट्स’ के लेखक अलेक्स हेली भी उसके प्रभाव में मुस्लिम बन गए।

मैल्कॉम एक्स एक घोषित कम्युनिस्ट था। एक चोर और गैंगस्टर कैदी को जिस तरह मीडिया कवरेज देकर अमेरिका में अश्वेत आंदोलन का चेहरा बनाया गया वह ध्यान देने लायक है।

उसे रेडियो और टेलीविज़न पर बुलाया गया। दुनिया भर के राजनेता अमेरिका आते तो उससे मिलने जाते, जिसमें इजिप्ट के राष्ट्रपति नासिर और क्यूबा के फिदेल कास्त्रो शामिल थे। वह यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्रों के बीच डिबेटिंग करता था और बीबीसी तक उसके डिबेट्स को लाइव प्रसारित करता था।

वह नेशंस ऑफ़ इस्लाम का प्रचारक और मौलवी था। उसकी शिक्षा के चार मुख्य विन्दु थे :

– दुनिया के मूल निवासी अश्वेत हैं
– श्वेत लोग शैतान हैं
– अश्वेत जातियां श्वेतों से श्रेष्ठ हैं
– श्वेत जातियों का अंत निकट है

वह अमेरिकी सिविल राइट्स आंदोलन का विरोधी और आलोचक था। उसकी शिकायत थी कि यह आंदोलन अश्वेतों और श्वेतों के बीच की दूरी और विषमता को मिटाने पर केंद्रित है, जबकि वह और अधिक रेशियल संघर्ष और विद्वेष चाहता था।

इसके लिए वह डॉ मार्टिन लूथर का भी विरोधी था और उन्हें गोरों का एजेंट कहता था। हालाँकि उस समय अमेरिका में तेजी से रेशियल कानूनों में सुधार हो रहे थे पर वह इन सुधारों का समर्थक नहीं था। वह सेग्रीगेशन ख़त्म करने का विरोधी था और उसने अश्वेत लोगों के ‘सेल्फ-डेटर्मिनेशन’ यानि उनके लिए अलग देश की माँग की और अश्वेतों को सशस्त्र विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया।

मैल्कॉम एक्स अमेरिका के लिए बड़ा सरदर्द बन कर उभर रहा था तभी उसकी नेशंस ऑफ़ इस्लाम के अन्य नेता मुहम्मद एलिज़ा से अनबन हो गयी। वह इस संस्था से अलग हो गया। और जैसा कि गैंगस्टर्स के साथ अक्सर होता है, नेशंस ऑफ़ इस्लाम वालों ने उसकी दिन दहाड़े हत्या कर दी।

आज भारत में आप एक लहर देख रहे हैं जो मूलतः 1960 के अमेरिकी परिदृश्य को री-स्टेज किये जाने की कोशिश है। दलित अधिकारों की मांगों को बिलकुल अमेरिकी सिविल राइट्स आंदोलन की तर्ज पर खड़ा किये जाने का प्रयास है। वही भीड़ जुटाना, वही उन्माद पैदा करना, जातीय हिंसा फैलाना और पुलिस को आक्रामक कार्रवाई करने को मजबूर करना… और अगर आप की नज़र से छूट रहा है तो उनका ग्लोबल स्ट्रेटेजिक अलायन्स भी है, इस्लाम से। तो भीम-मीम की पार्टर्नशिप भी नयी नहीं है।

अमेरिका जिन अपराधों का दोषी रहा है उन्हें भारत पर मढ़ा जा रहा है। भारतीय समाज स्वतः स्फूर्त और स्वप्रेरणा से जिन सामाजिक भूलों का सुधार कर चुका है, उसे समाज पर प्रत्यारोपित करने के लिए नयी और झूठी कृत्रिम कहानियाँ गढ़ी जा रही हैं। और चूँकि स्वतंत्र भारत में कभी ‘जिम क्रो’ कानून थे नहीं, तो लिंचिंग की कहानियां भी पैदा की जा रही हैं। लिंचिंग नाम के शब्द को खूब दुहराया जा रहा है, किसी दो चार लोगों के बीच मारपीट की किसी भी घटना को लिंचिंग का नाम देकर देश विदेश के मीडिया में खूब फैलाया जा रहा है।

अमेरिका अपने रेसिस्ट भूतकाल को पीछे छोड़ आया है। आज अमेरिका में अश्वेत किसी भी अफ्रीकन देश से ज्यादा समानता और अधिकार के साथ रहते हैं। पर बीच बीच में ऐसी कहानियां उछाली जाती रही हैं जिसे आप रेसिज़्म से जोड़ कर दिखा सकते हैं।

इस वर्ष फिलडेल्फिआ में स्टारबक्स कॉफ़ी शॉप में ऐसी ही एक घटना हुई। एक दूकान में दो व्यक्ति घुसे और वॉशरूम इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी। स्टाफ ने कहा कि यह सुविधा सिर्फ उसके कस्टमर्स के लिए है, इसलिए उन्हें कुछ खरीदना होगा।

इसपर वे दोनों लड़ने लगे। झगड़ा बढ़ गया और स्टाफ ने पुलिस बुला ली। वे दोनों पुलिस से भी लड़ने लगे तो पुलिस उन्हें अरेस्ट कर के ले गयी। अब खास बात यह है कि वे दोनों व्यक्ति अश्वेत थे तो इस घटना ने रेसिज़्म की शक्ल ले ली।

इतनी सी बात मीडिया तक पहुँच गयी, पूरी दुनिया में इसकी ख़बरें छपीं और स्टारबक्स को माफ़ी मांगनी पड़ी, हर्जाना देना पड़ा और कंपनी ने एक दिन के लिए पूरी दुनिया में अपने सारे स्टोर्स बंद रखे और सारे स्टाफ को रेशियल इक्वलिटी ट्रेनिंग पर भेजा गया।

आज आप भारत में इनटॉलेरेंस-कथा सुनते हैं… हर तरफ इनटॉलेरेंस का एपिडेमिक फैला है। क्योंकि यह मोदी का भारत है। तो उधर ट्रम्प के अमेरिका में भी यही कहानी चल रही है। लोगों को बताया जा रहा है कि कैसे समाज में ट्रम्प के आने से रेसिज़्म बढ़ रहा है। लोगों को ट्रम्प को वोट देने के लिए शर्मिंदा किया जा रहा है।

आप कोई भी बॉलीवुड फिल्म देखते हैं, और आपको कहानी लैला-मजनू की कहानी से थोड़ी भी अलग लगती है तो आप समझ जाते हैं कि यह किसी ना किसी हॉलीवुड फिल्म की नक़ल है। तो भारत का वर्तमान वामपंथी परिदृश्य भी कोई ओरिजिनल स्क्रिप्ट नहीं है, 1960 की हिट अमेरिकन स्क्रिप्ट सिविल राइट्स की चोरी भर है।

विषैला वामपंथ : सिविल राइट्स-1

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