विषैला वामपंथ : सिविल राइट्स-1

अमेरिका में अश्वेत अधिकारों का आंदोलन सिविल राइट्स मूवमेंट कहलाता है। वामपंथ के संदर्भ में इसकी चर्चा करना इस आंदोलन के साथ न्याय नहीं होगा। पर इसके कुछ वामपंथी सूत्र हैं।

और उससे भी महत्वपूर्ण है कि भारत में वर्तमान में होने वाली राजनीतिक सामाजिक गतिविधियों में इस सिविल राइट्स आंदोलन की रणनीतियों की प्रतिछवि देखी जा सकती है।

पर उसके पहले आपको अमेरिका में अश्वेत अधिकारों की लड़ाई का अधिकार देखना पड़ेगा। 1864 में अमेरिका में गृहयुद्ध के बाद अमेरिका से दासता समाप्त कर दी गई। पर यह अश्वेतों पर अत्याचारों का अंत हो ऐसा नहीं था।

उसके बाद भी अमेरिका में अनेक ऐसे कानून बनाये गए जिससे अमेरिकी समाज में अन्याय और भेदभाव का प्रभुत्व बना रहा। इन कानूनों को ‘जिम क्रो’ कानून कहा गया। ‘जिम क्रो’ कोई व्यक्ति नहीं था, यह अश्वेतों के प्रति एक अनादर का शब्द था।

इन कानूनों के अनुसार अमेरिकी समाज में श्वेत और अश्वेत अलग अलग रखे गए। वे अलग अलग बसों और ट्रेनों में चलते थे। श्वेतों के रेस्टोरेंट में अश्वेत प्रवेश नहीं कर सकते थे।

एमन्शिपेशन लॉ के तहत एक अश्वेत को सिद्ध करना होता था कि वह रोज़गार में है, अन्यथा उसे जेल या लेबर कैम्प्स में डाला जा सकता था। उनके वोटिंग के अधिकार सीमित थे। 1969 तक इंटर-रेशियल शादियाँ गैरकानूनी थीं।

पर बात इतने तक नहीं थी। समाज में व्यवहार में जो भेदभाव था, वह इन कानूनी भेदभाव तक सीमित नहीं था। अमेरिका में, खासतौर से दक्षिणी राज्यों में स्थिति विकट थी।

किसी श्वेत व्यक्ति को किसी अश्वेत व्यक्ति का व्यवहार अगर पर्याप्त सम्मानजनक नहीं लगता था तो इसके परिणाम कुछ भी हो सकते थे। अगर किसी अश्वेत व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लग जाये तो दंड का निर्धारण आम सहमति से होता था… न्यायिक प्रक्रिया से ही हो यह आवश्यक नहीं था।

अगर पब्लिक को न्यायिक प्रक्रिया से निर्धारित न्याय पसंद नहीं आये तो यह न्याय भीड़ कर देती थी। ऐसी हज़ारों घटनाएँ हैं जिसमें उत्तेजित श्वेत भीड़ ने किसी अश्वेत आरोपी को पकड़ कर उसे मारा पीटा, नाक कान काट लिए, आंखें फोड़ दीं और फाँसी दे दी, ज़िंदा जला दिया।

अगर आरोपी जेल में बंद हो तो भीड़ ने उसे जेल से निकाल कर मार डाला। उसके बाद उस भीड़ ने मृत व्यक्ति के साथ गर्व से फ़ोटो निकलवाई, और ऐसे फोटोग्राफ्स उस समय के अमेरिकी अखबारों में मज़े से छपा करते थे। ऐसी घटनाओं को ‘लिंचिंग सक्सेस’ भी बताया जाता था।

अखबारों में छपे उन फोटोग्राफ्स के बावजूद किसी भी श्वेत व्यक्ति को ऐसी घटनाओं के लिए सज़ा हुई हो ऐसा नहीं है।

1955 में मिसिसिपी में ऐसी एक घटना हुई जिसने अमेरिका को झकझोर दिया। एक 14 साल का अश्वेत लड़का, शिकागो निवासी एमेट टिल अपने किसी रिश्तेदार से मिलने मिसिसिपी गया। वहाँ वह एक ग्रॉसरी स्टोर में गया जहाँ स्टोर की 21 वर्षीया मालकिन को उसका व्यवहार पसंद नहीं आया। उसने एमेट पर उसपर सीटी मारने और छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया।

एमेट पर मुकदमा चला। उस महिला कैरोलिन ब्रायंट ने एमेट पर आरोप लगाया कि उसने उसकी कमर पर हाथ डाला और अश्लील बातें कहीं। हालांकि 2008 में दिए गए एक इंटरव्यू में उसने माना कि यह सच नहीं था।

पर भीड़ ने न्यायिक प्रक्रिया का इंतज़ार नहीं किया। उस महिला के पति और भाई ने एक भीड़ के साथ एक रात उस लड़के को उसके दादा के घर से निकाल कर उसे मारा पीटा, क्षत विक्षत किया और फिर गोली मार दी और लाश को नदी में फेंक दिया।

उसी वर्ष एक श्वेत जूरी ने दोनों व्यक्तियों को सभी आरोपों से अपराधमुक्त घोषित किया।

एमेट का शव शिकागो लाया गया। वहाँ उसकी माँ ने अपने बेटे की शवयात्रा खुले कास्केट में निकाली जिससे कि दुनिया देख सके कि उस 14 वर्ष के बच्चे के साथ क्या किया गया। इस शवयात्रा में हज़ारों लोग जुटे और इस घटना ने अमेरिकी सिविल राइट्स आंदोलन को हवा दी।

आज भी अमेरिकी इतिहास और जन स्मृति ने एमेट टिल को जीवित रखा है। वहाँ एक एमेट टिल मेमोरियल कमीशन बनाया गया है। मिसिसिपी में 51 ऐसे स्थान हैं जो एमेट टिल के स्मारक स्थलों के रूप में पहचाने गए।

क्रमशः…

शासन चलाने और जनता को सुख-समृद्धि देने में अक्षम है विषैला वामपंथ

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY