सारी रचनात्मकता नष्ट कर देती है सरकारी नौकरी पाने की तैयारी

जीवन के सफर में कई वर्षों की यात्रा करने के बाद मुझे शुरुआती पड़ाव कुछ अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं।

चाहे विश्वविद्यालय की परीक्षा हो, या सिविल सर्विस की, दिन-रात एक कर के सैकड़ों पेज के नोट्स रट लिए जाते थे। यूपीएससी के लिए मैंने कम से कम दो हजार पेज के नोट्स कंठस्थ कर रखे थे।

सुबह शाम सिर्फ रट्टा मारना और प्रैक्टिस करना कि 40 मिनट के अंदर कैसे पहले प्रश्न के अंतर्गत पूछे गए तीन प्रश्नों का उत्तर लिखा जा सकता है; हर प्रश्न का उत्तर लगभग 600 शब्दों में होना चाहिए।

परीक्षा में अगर रटे गए पन्नों से प्रश्न आ गया तो वारे न्यारे। अच्छे खासे नंबर खींच लिए जाते थे। लेकिन अगर उस रटंत विद्या के बाहर कुछ पूछ लिया तो जो कंठस्थ था उसी में से कुछ उत्तर भिड़ाने का प्रयास करते थे और मरते गिरते कुछ न कुछ नंबर निकाल ले जाते थे।

कभी भी किसी थ्योरी, विचार, तथा घटनाओं पर गहन रूप से सोचा ही नहीं। किसी भी विषय के बारे में उत्सुकता होने के बाद भी सिर्फ मतलब की पढ़ाई और रटाई की। कुछ विषय इतने नीरस लगते थे क्योंकि बिना अर्थ समझे सिर्फ परिभाषाएं रटी जाती थीं और कुछ रटे हुए तर्क-वितर्क के माध्यम से उत्तर पुस्तिका भर दी जाती थी।

चूंकि सारी पढ़ाई-लिखाई और परीक्षा रट के पास की, तो वही हालत सरकारी नौकरी में हो गई थी। कोई क्रिएटिविटी नहीं, कोई मूल सोच नहीं। एक फाइल चलती थी, सब उसमें कुछ ना कुछ अपनी समझ या पुरानी फाइलों की समझ के आधार पर लिख देते थे और निर्णय ले लिए जाते थे। कहीं भी कोई रचनात्मक विचार-विमर्श नहीं।

तभी स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी समस्याएं सुरसा के मुंह की तरह सामने खड़ी रहती थी; समाधान खोजने का कोई ईमानदार प्रयास नहीं किया जाता था क्योंकि उसके लिए आपको रटे-रटाए से अलग हटकर सोचना होगा।

अब मैं अपने पुत्र को पढ़ते हुए देखता हूं। एक दिन भी उसे रटते हुए नहीं देखा। लेकिन किसी भी विषय वस्तु के बारे में पूछिए तो वह उसे खूबसूरती से एक्सप्लेन कर ले जाएगा।

जब पुत्र फ्रांस के प्राइमरी स्कूल में पढ़ कर भारत आया, तो दिल्ली के एक स्कूल में उसका एडमिशन करा दिया। कुछ ही समय बाद उसकी क्लास टीचर ने हमें बुलाया और शिकायत की कि आपका बेटा बहुत प्रश्न पूछता है और बच्चे उसके प्रश्न पूछने पर क्लास में हंसते हैं।

एक बार तो उनकी शिकायत सुनकर मैं अचकचा गया। फिर अपने आप को संभाला और कहा कि बच्चे को प्रश्न पूछने दीजिए। उसके प्रश्नों और उत्सुकता का जवाब देना आपका कार्य है और अगर बच्चे हंसते हैं तो उन्हें समझाइए कि यह उचित नहीं है।

वह मेरे जवाब से संतुष्ट नहीं थीं।

फिर बेटे को पुनः विदेश में पढ़ने का अवसर मिला। कभी भी उसे घर में रटते हुए नहीं देखा। विचारों को वाद विवाद के द्वारा समझाया जाता था और ऐसे ही प्रश्नों के द्वारा परीक्षा ली जाती थी।

अब बेटा कंप्यूटर साइंस पढ़ रहा है और साथ में उसने पूरक विषय के रूप में अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र और इस सेमेस्टर आर्ट ली है। आर्ट के चुनाव पर हमें आश्चर्य हुआ लेकिन ड्राइंग और चित्रकला के बारे में उसकी समझ देखकर प्रसन्नता होती है।

ऐसे विषयों को चुनने का एक कारण यह भी है कि उसे सिविल सर्विस परीक्षा नहीं देनी। नहीं तो शायद वह उन विषयों को चुनता जिससे यूपीएससी के एग्ज़ाम में उसे मदद मिलती। लेकिन ऐसे विषयों को पढ़ने का परिणाम यह भी हुआ उसका व्यक्तित्व निखर रहा है और किसी भी विषय पर वाद-विवाद करने में आनंद आता है।

अब मैं महसूस करता हूं कि हमारा मष्तिस्क 24-25 वर्ष की आयु तक एकदम फ्रेश और क्रिएटिव रहता है। उस समय उसमें कुछ नया कर दिखाने की, कुछ नया सोचने की असीमित क्षमता होती है।

लेकिन भारतीय युवाओं में सरकारी नौकरी का इतना आकर्षण है कि वह यूपीएससी तथा अन्य नौकरियों के लिए एक के बाद एक प्रतियोगी परीक्षाएँ देते चले जाते हैं। आरक्षित वर्ग लगभग 35 से 40 वर्ष की आयु तक परीक्षा देते रहते हैं।

जब युवा इन परीक्षाओं में सफल नहीं होते, तब तक उनके मस्तिष्क की रचनात्मक क्षमता कुंद पड़ जाती है और वह जिंदगी से निराश होने लगते हैं तथा सरकार को दोष देने लगते हैं।

युवा वर्ष के शुरुआती वर्षों में रिस्क लेने की क्षमता होती है, कुछ नया कर दिखाने का माद्दा होता है। लेकिन सरकारी नौकरी ऐसे सभी अरमानों का गला घोट देती है चाहे उसको जॉइन करने में आप सफल हो जाएं या असफल।

समय के साथ बदलिए और उभरते हुए भारत में नए अवसरों का लाभ उठाइए

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