काँग्रेस और गो-वध बंदी का पाखंड

इतिहासकार राम चन्द्र गुहा ने गोवा में अपनी बीफ खाती हुई फोटो पोस्ट की और ये ट्वीट किया कि वो गोवा में बीफ खाने का मज़ा इसलिए ले रहे हैं कि गोवा में बीजेपी सरकार है।

उन्होंने कहा, ”ओल्ड गोवा में एक शानदार सुबह के बाद हमने पणजी में लंच किया, जहां बीजेपी शासन में है, और मैंने जश्न में बीफ खाना डिसाइड किया।”

साफ़ इरादा बीजेपी का मज़ाक उड़ाने का था, क्योंकि इस देश में बीजेपी गो-वध बंदी से जुडी पार्टी मानी जाती है।

मै इसे शुद्ध रूप से गुहा की धूर्तता मानता हूँ क्योंकि वे खुद इतिहासकार हैं और उन्हें भली प्रकार से पता होना चाहिए कि देश में गो-वध बंदी लागू करने वाली पार्टी बीजेपी नहीं, काँग्रेस है।

गोवा, केरल, और कुछ नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में छोड़ कर सारे देश में नेहरू के ज़माने से गो-वध बंदी लागू है (भले ही कागज़ पर)। यहाँ तक कि जम्मू और कश्मीर में भी। केरल और गोवा में गो-वध बंदी कभी थी ही नहीं। बीजेपी ने ना तो किसी राज्य में गो-वध बंदी हटाई और ना ही लगाई। जो कुछ किया, गुहा की पार्टी काँग्रेस ने किया।

और काँग्रेस ने गो-वध बंदी के नाम पर शुद्ध पाखंड किया। गांधी से लेकर नेहरु तक हर काँग्रेसी नेता ने। काँग्रेस ने सिर्फ गाय के नाम पर गन्दी राजनीति की और आज भी कर रही है। हिन्दुओं से कहते हैं गो-वध बंदी कर दी (कागज़ पर), मुसलमानों से कहते हैं काटो और खाओ, कौन मना करता है। आज भी काँग्रेस केरल में बीफ फेस्टिवल करती है और मध्यप्रदेश में गौ शाला बनवाने की बात करती है।

गो वध बंदी के दो पहलू हैं। पहला धार्मिक है और बहुत गहरा है। हिन्दू भूख से मर जाएगा लेकिन गाय का मांस नहीं खायेगा। बंगाल के अकाल के दौरान अंग्रेज़ों को बड़ा अचम्भा था कि आदमी भूख से मर रहा है लेकिन लावारिस घूमती गाय को मार कर नहीं खा रहा। नतीजा दोनों भूख से मर गए, गाय भी और भी आदमी भी। इतना गहरा है हिन्दू का बीफ के प्रति संवेदन।

हिन्दू इस देश में बहुमत में है और बहुमत के इस संवेदन का सम्मान होना चाहिए। कोई बिना बीफ खाए मर नहीं जाता। इसलिए पूरे देश में (उन राज्यों जैसे केरल, गोवा जहाँ हिन्दू खुद बीफ पर बैन ना चाहे, उनको छोड़ कर) गो-वध बंदी होनी चाहिए और ऐसा हुआ भी। देश के अधिकांश राज्यों में गो-वध बंदी 1947 से है।

फिर समस्या क्या है?

समस्या है काँग्रेसी पाखंड।

जी हां, काँग्रेस ने गो-वध बंदी लागू की और साथ में अवैध बूचड़खानों में गाय कटवाना भी जारी रखा। जिन राज्यों में गो-वध बंदी नहीं थी, वहां के लिए गाय की तस्करी भी चालू रखी। सब खुश, हिन्दू खुश कि गो वध बंदी हो गई, मुसलमान खुश कि बीफ की कोई कमी नहीं।

गौ तस्कर खुश की धंधा अच्छा चल रहा है, पुलिस खुश कि उपर की अच्छी आमदनी (वैसे उसकी हिम्मत भी नहीं रोकने की क्योंकि ये काम मुस्लिम करते हैं जो काँग्रेस का वोट बैंक हैं)। विनोबा जैसे गाँधीवादी, सरकारी संत खुश जो गाहे बगाहे पूर्ण गो-वध बंदी की मांग लेकर आमरण अनशन करते अपनी राजनीतिक दूकान चमकाते। सब तरह से पूर्ण शांति और सहिष्णुता।

समस्या होती है जब बीजेपी शासन में आती है और गो-वध बंदी कानून को कड़ाई से लागू करती है, अवैध बूचड़-खानों को बंद करवाती है, गौ तस्करी को रोकती है (जो कानून के हिसाब से होना चाहिए) और जब गौ रक्षक तस्कतों को रोकते है और फिर कोई अख़लाक़ मारा जाता है, कोई बुलंदशहर जैसा काण्ड होता है और फिर ये काँग्रेसी और उनके पालतू गुहा जैसे बुद्धिजीवी रुदाली शुरू कर देते हैं।

दरअसल गो-वध बंदी का एक दूसरा पहलू भी है और वो है आर्थिक। आखिर आप गाय को काटेंगे नहीं तो गाय के बूढी होने पर क्या करेंगे? बैल का क्या करेंगे? कितने हिन्दू गाय के बूढी होने पर उसको मरने तक खाना देने को तैयार हैं और फिर क्या हमारी डेरी इंडस्ट्री ये बोझ उठा सकती है?

ये सच है कि मुसलमान तो सिर्फ गाय काटता है उसको गाय बेचता तो हिन्दू ही है। दूध बेचने का धंधा हिन्दू करते है और एक आध अपवाद को छोड़ कर मुसलमान गाय को इसलिए काटता है या तस्करी करता है क्योंकि ये उसका धंधा है ना कि हिन्दू की धार्मिक भावना को आहत करने के लिए।

कायदे से इस अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस कर एक नीति 1947 में ही बन जानी चाहिए थी कि हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को बिना आहत किये हुए, कैसे बूढी गायों की समस्या को हल किया जाय, और इसका हल भी निकल आता अगर ईमानदारी से प्रयास किया जाता।

लेकिन काँग्रेस ने ऐसा कभी नहीं किया क्योंकि वो करना नहीं चाहती थी। वो गाय के नाम पर गन्दी राजनीति करती है और कर रही है। अगर गौ तस्कर तस्करी कर रहा है तो ठीक और कभी कोई अख़लाक़ जैसा काण्ड हो जाय तो और भी अच्छा, सोने पर सुहागा।

और काँग्रेस के पालतू गुहा जैसे बुद्धिजीवी भी यही चाहते हैं कि ये मुद्दा उलझा रहे, अखलाक जैसे काण्ड होते रहें और वो उसकी लाश को नोच नोच कर खाते रहें। गिद्धों का काम भी यही है।

बापू के नाम एक पत्र!

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