सैन्य सेवा के पराक्रमी योद्धाओं पर फिल्में न बनने देना, गिरोहों की साज़िश

‘द लायर’ इत्यादि वस्तुतः गिरोह हैं। गिरोहों में एक ही व्यक्ति नहीं होता बल्कि उसमें ढेर सारे गुर्गे काम करते हैं। गुर्गों को काम करने के लिए माल-पानी की दरकार होती है। जब माल-पानी खतम होने लगता है तब गिरोहों का सरगना गुर्गों को लेक्चर देने लगता है ताकि जोश कम न हो और गुर्गे गिरोह छोड़ कर भागने न लगें।

‘द लायर’ ने उरी पर बनी फिल्म को ‘hyper nationalism’ की जो संज्ञा दी है उससे वह अपने गुर्गों को गिरोह से जोड़े रखना चाहता है।

‘द लायर’ को पता है कि इस प्रकार के लेख पर किसी भी देशभक्त नागरिक की प्रतिक्रिया क्या होगी।

उसे हमारी गालियों से फर्क नहीं पड़ता, वह तो अपना गिरोह बचाने की जुगत में लगा है क्योंकि उसे पता है कि आने वाले सालों में अर्बन माओवादी या नक्सली पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे क्योंकि इनकी पहचान जाहिर हो चुकी है। जनता ने इन्हें पहचान लिया है और अब ये सड़क पर गिरा के मारे जाएंगे।

देश सब कुछ सहन कर सकता है भारतीय सेना का अपमान नहीं सहन कर सकता। देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने में भारतीय सेना का रोल ‘instrumental’ रहा है। अर्थात भारतीय सेना केवल भारत की अखंडता का प्रतीक मात्र नहीं है (जैसे कि खेल अथवा सिनेमा) बल्कि इस अखंडता की रक्षा करने में उसकी महती भूमिका है। हमारे वीरों ने घर-परिवार पत्नी-बच्चा सब छोड़कर, अपने प्राण देकर भारत भूमि की रक्षा की है।

आज के युवाओं को सुनता और पढ़ता हूँ तो उनपर तरस आता है। वे किसी विदेशी यूनिवर्सिटी में डिफेंस साइंस पढ़ते हैं या कुछ तो मोबाइल में वॉर गेम खेलकर अपना परसेप्शन बनाते हैं और कहते हैं कि भारतीय सेना में ये नहीं हो रहा वो नहीं हो रहा, ये तो पुराने जमाने की expeditionary force है इत्यादि। इस प्रकार के कमेंट इंटरनेट पर यदा-कदा Quora आदि पर पढ़ने को मिल जाते हैं।

इन्हें देश की मिलिट्री हिस्ट्री का ज्ञान नहीं होता। किन विकट परिस्थितियों में अच्छे हथियार न होने पर भी मौसम की मार सहता एक सैनिक विगत 70 वर्षों से मातृभूमि की रक्षा करता रहा है यह हम और आप घर बैठकर नहीं समझ सकते।

ऐसे उत्कृष्ट संगठन पर लांछन कोई भी राष्ट्रभक्त सहन नहीं करेगा। ‘द लायर’ इस बात को भली भांति जानता है। उसका टार्गेट राष्ट्रभक्तों की भावनाएं नहीं बल्कि वे लोग हैं जिनके भीतर अभी तक राष्ट्रभक्ति का बीज नहीं पनपा है। ये ऐसे लोग हैं जो यह जानते ही नहीं कि अर्बन नक्सली कौन चिड़िया का नाम है। इन्हें सेना के पराक्रम से अधिक गुरमेहर कौर जैसी किसी ट्विटरीया हस्ती की चिंता होती है। गिरोहों के लिए गुरमेहर कौर जैसों का समर्थन करने वाले मूर्ख लड़के लड़कियां पोटेंशियल टारगेट होते हैं। वे इन्हें झट से अपने कुनबे में सम्मिलित कर लेते हैं।

रही बात सिनेमा की तो यह मास मीडिया का एक अंग है जो किसी भी देश के ‘strategic culture’ का निर्माण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मैंने पहले भी इस विषय पर बहुत कुछ लिखा है।

यह गिरोहों की साज़िश ही रही है कि इन्होंने सैन्य सेवा के पराक्रमी योद्धाओं पर फिल्में नहीं बनने दीं। अमेरिका में 1970 में बनी ‘पैटन’ देख लीजिए लेकिन भारत में सैम बहादुर पर फ़िल्म नहीं बनी। आधुनिक भारत के नायकों को स्थापित करने में यह हमारी विफलता रही है। ‘बॉर्डर’ जैसी फ़िल्म एक ही बनी, उसके आगे पीछे सैन्य परिप्रेक्ष्य में बनी सब फिल्में लक्ष्य से भटकती कूड़ा करकट ही सिद्ध हुईं।

तीन वर्ष पूर्व ‘1971 युद्ध’ पर लिखे अपने आलेख में मैंने एक बात उठाई थी। हम 1962 का युद्ध हारे थे परंतु उस पूरे युद्ध में कुछ लड़ाइयां तो ऐसी होंगी जो हम जीते होंगे। क्या चीन के साथ हुये उस युद्ध में हमारे वीर बलिदान नहीं हुए थे? क्या उस युद्ध में लड़े हमारे सैनिक पराक्रमी नहीं थे?

युद्ध का समग्रता में विश्लेषण तो होता रहा है लेकिन उन वीरों की गाथाएँ सुनाने से हमें किसने रोका था? 1962 के वीरों पर फिल्म क्यों नहीं बन सकती? यह सुखद संकेत है कि अब 1962 युद्ध के नायक जसवंत सिंह रावत पर बॉयोपिक बन रही है। ‘उरी’ जैसी फिल्में जब स्क्रीन पर आयें तब सपरिवार देखने जाइये। ‘द लायर’ और उसके गिरोह को यही ‘असल उत्तर’ होगा।

देशभक्ति यदि ज़हर है तो इसे हवाओं में इतना घोलें कि घुट जाए देशद्रोहियों का दम

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