इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार – 8

कैंटीन में काम करने वाले ज़्यादातर लड़के भी उसी मार्च में हिस्सा लेने गांव गए हैं ये तो वाकई अच्छी बात थी और पहाड़ के लोगों की एकता और जागरूकता दर्शाती थी!

कुछ दिनों बाद कॉलेज की कैंटीन अचानक बन्द रही कुछ दिनों तक किसी को कोई आईडिया नहीं था कि कैंटीन क्यों बन्द है, कैंटीन में कोई था भी नहीं बताने को!

कुछ दिनों बाद जब कैंटीन दुबारा खुली तो पुराने लड़को में से चार पाँच गायब थे और उनकी जगह अपेक्षाकृत छोटी उम्र के नए लड़के थे।

कैंटीन चलाने वाले “मामा” से कैंटीन बन्द रहने और पुराने लड़कों के बारे में जब पूछा तो उसने बताया…

अलग उत्तरांचल राज्य की मांग के समर्थन में पहाड़ के तमाम बड़े-बड़े नेताओं के आह्वान पर देश के कोने कोने से पहाड़ के लोग दिल्ली जाने के लिये पहाड़ो में पहुंच गए थे। दो सौ से भी ज़्यादा बसें दिल्ली जाने के लिए रामपुर तिराहे पर पहुंचीं।

वहाँ मुलायम सिंह यादव ने उनको दिल्ली जाने से रोकने के लिए जबरदस्त नाके बन्दी करवा रखी थी जितने जवान वर्दी में मौजूद थे, उससे कहीं ज़्यादा लोग उनकी तरफ से सादे कपड़ो में मौजूद थे। लोग फौज से छुट्टी लेकर आए थे, ट्रेड यूनियनों के पूरे जत्थे आए थे। महिलाएं साथ में थीं। जब आगे जाने से रोका गया तो पब्लिक भड़की और पत्थरबाजी शुरू हुई।

दूसरी तरफ से लाठीचार्ज हुआ और गोलियां चलीं. महिलाओं के साथ जो अभद्रता आप सोच सकते हैं, वो सब हुई. हमारी माताएं-बहनें उस भीड़ में थीं, तो इससे ज्यादा कुछ न बुलवाइये। भैया जी.. और वो फुट फुट कर रोने लगा था आगे पता लगा कि रात में पुलिस उस तरफ जाने वाली गाड़ियों पर गोलियां और लाठियां बरसा रही थी। गाड़ियां जला दी गईं। वहां के लोगों ने हमारी मदद की, रहने को जगह और खाना दिया। मुज़फ्फरनगर के लोग अगर मदद नहीं करते तो मरने वालों की गिनती और ज़्यादा होती।”
हत्याएं और बलात्कार हुए, पर किए किसी ने नहीं!

FIR दर्ज हुई कि आंदोलनकारियों ने दुकानें और गाड़ियां जला दीं। जिसके बाद वहां मौजूद अधिकारियों को फायरिंग का आदेश देना पड़ा। 6 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।

1995 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच का आदेश दिया। 28 पुलिसवालों पर बलात्कार, डकैती, महिलाओं से बदसलूकी, हिंसा और महिलाओं के साथ सार्वजनिक रूप से अभद्रता के केस दर्ज हुए।

तात्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने रिटायर्ड जस्टिस ज़हीर हसन से इसकी जांच करवाई। जांच में कहा गया कि मौके की नज़ाकत को देखते हुए बल प्रयोग किया, जो बिल्कुल सही था। ‘रबर बुलेट’ फायर किए गए, जिससे अनावश्यक रूप से कुछ प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई।

2000 में उत्तराखंड एक अलग राज्य बन गया, लोगों को लगा कि इसके बाद राज्य की सरकार दोषी पुलिसवालों पर सख्ती से कार्रवाई करेगी।

2003 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 1994 के मुज़फ्फरनगर डीएम अनंत कुमार सिंह को नामजद किया। जनता पर गोली चलाने का दोषी मानते हुए एक पुलिसवाले को सात साल और दो पुलिसवालों को दो साल की सज़ा सुनाई।

2007 में सीबीआई कोर्ट ने एसपी राजेंद्रपाल सिंह को बरी कर दिया। सिंह को उत्तर प्रदेश सरकार का पूरा सहयोग मिला।

2007 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी रामपुर तिराहा गए। वहां घोषणा की, सभी पेंडिंग केस पूरी शिद्दत से लड़े जाएंगे। इस घोषणा के बाद कुछ खास बदलाव हुआ हो, इसकी कोई जानकारी पब्लिक में तो उपलब्ध नहीं है।

खंडूरी, बहुगुणा और रावत सब इस कांड का नाम लेकर मुख्यमंत्री बन गए। 15 साल में 8 मुख्यमंत्री देख-देख कर उत्तराखंड 20 साल और पीछे चला गया। जितने पुलिस वाले दोषी थे, उन्हें सज़ा तो दूर उल्टा प्रमोशन दिए गए।

बीजेपी राज्य बनाने का श्रेय ले लेती है आरोपी डीएम को एनडीए की सरकार ने ही निजी सचिव बनाया। एसपी से लेकर हवलदार का कुछ नहीं बिगड़ा। ऊपर से आंदोलनकारियों में से कई को अभी तक शहीद का दर्जा नहीं मिला है। पुरानी पीढ़ी अभी भी गुस्सा है। नए लोगों के लिए तो ये एक बोरिंग रस्म अदायगी बनकर रह गई है। अभी भी सुकून की बात ये है कि सपा उत्तराखंड में कोई ज़मीन नहीं बना पाई। मुलायम का लड़का उनसे समझदार लगता है, ऊपर से उसने इन लोगों को भी राजनीति से रिटायर कर दिया।”

कैंटीन में काम करने वाले दो कम उम्र लड़के भी रामपुर तिराहा गोली काण्ड में मारे गए थे, पर उन्हें भी मारा किसी ने नहीं था और वो ही वो पल था जब मुझे लगा कि मुझे पुलिस बनना है इसी “किसी नहीं” को ढूँढने के लिये तब लड़कपन था पता नहीं था कि “किसी नहीं” तक पहुंचना असम्भव काम है।

देश में आडवाणी जी रथ यात्रा निकाल रहे थे अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण के लिये जनसमर्थन जुट रहा था। हिन्दू पहली बार संगठित होकर सामने आया था ये ही वो साल था जब मैं भी BJP से जुड़ा था और बकायदा उसकी सदस्यता ली थी, तभी एक बार फिर मुल्लायम ने अपनी आसुरी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए अयोध्या में निहथते कारसेवकों को गोलियों से भून डाला था।
यहाँ भी दोषी “कोई नहीं” ही था।

हिन्दू एक जुट हुए BJP को भारी मात्रा में वोट दिए और केंद्र में कई दलों को मिलाकर स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में सरकार बनी…

फिर एक बार “वक्त सबसे बड़ा महरम है” वाली बात लागू हुई वक्त आगे सरका कॉलेज पूरा हुआ “कोई नहीं” को पकड़ने के जोश के साथ हम भी सरकारी नौकरी में भर्ती हुए।

अब देश में मोबाईल फोन आ चुका था फासले कम हुए थे लोगों के, स्कूल का दोस्त रईस मियां समेत काफी नए पुराने मित्र संपर्क में रहने लगे।

क्रमश:
– इकबाल सिंह पटवारी

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