हमने पानी की तरह खुद को ढाल लिया था काँग्रेसी पात्र में

यह अवलोकन करने के बाद कि ‘पानी पात्र के आकार अनुरूप ढल जाता है’, चीनी दार्शनिक मेन्ग्ज़ी को यह अंतर्ज्ञान हुआ कि मनुष्य भी अपने आप को उस व्यवस्था में समायोजित कर लेते हैं जिसमें वे रहते हैं।

इस चीनी दर्शन को काँग्रेसियो ने भी समझ लिया था। अतः उन्होंने सेकुलरिज़्म और समाजवाद का एक ऐसा टेढ़ा-मेढ़ा कुण्ड बनाया जिसकी परिधि गरीबी, गन्दगी, अभाव, असुविधा, भ्रष्टाचार, और परिवादवाद से निर्धारित थी।

इस कुंड में आम भारतीय रहने को मजबूर था और उसने अपने आप को इस कुंड के आकार में ढाल लिया था।

हम लोगों ने अपने आस-पास होने वाले भ्रष्टाचार को स्वीकार करना सीख लिया था। राजनीतिज्ञों को गाली देते और जिंदगी के संघर्ष में पुनः जुट जाते हैं। उन्हीं गंदी, बदबूदार, भिनभिनाती गलियों, गड्ढों से भरी सड़कों पर चलना और एक-एक पाई के लिए संघर्ष करते रहना।

जबकि अभिजात्य वर्ग विलासिता पूर्ण ज़िंदगी जीते, देश विदेश में छुट्टियां मनाते, और तो और विदेश में बसे अपने परिवार को भी सरकारी खर्चे पर मौज कराते। हम सब देखते और समझते थे, लेकिन बदले में उसी अभिजात्य वर्ग की सरकार को चुनते रहते।

एक तरह से हम भारतीयों की यही नियति होकर रह गई थी।

बिजली गायब है, कोई बात नहीं; ट्रेन 12 घंटे लेट, स्वीकार है; सड़क टूटी फटी है, हमारी नियति है; बैंक अकाउंट खोलने में आनाकानी करता है, यह कौन सी बड़ी बात हो गई; उद्यम लगाना है, लोन नहीं मिलेगा, क्योकि हमारा चेहरा ही ऐसा है; गैस सिलेंडर के लिए लाइन लगानी है, चलो लाइन में लगकर गप्प मार लेंगे।

हर समस्या, हर परेशानी के लिए हम अपने दिल को बहला लेते थे।

मेरा मानना है कि मोटे तौर पर एक राज्य को देश और नागरिकों की सुरक्षा, सभी की मर्यादा का सम्मान (इसके अन्तर्गत स्वास्थ्य, शिक्षा, सर के ऊपर छत, महिलाओं का अधिकार इत्यादि शामिल है), आजीविका के साधन उपलब्ध कराने की जिम्मेवारी होती है।

इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एक स्वच्छ और पारदर्शी प्रशासन, एवं कर व्यवस्था लागू करनी चाहिए। कर व्यवस्था को एक तरह से आय और संसाधनों का समाज में वितरण के रूप में भी देख सकते हैं। ऐसी व्यवस्था काले धन को समाप्त करने में मदद करेगी, जिसके प्रयोग से अभिजात्य वर्ग समाज और राजनैतिक व्यवस्था पर अपनी जकड़ बनाये बैठा है।

लेकिन जिन लोगों के पास गलत तरीके से कमाई गयी अथाह संपत्ति है, क्या वे लोग एक स्वच्छ और पारदर्शी व्यवस्था आसानी से आने देंगे?

क्या किसी भी सरकार के मुखिया के सिर्फ भाषण देने से, अपील करने से लोग काला धन बैंक में जमा कर देंगे या उस पर टैक्स दे देंगे?

आप संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक की आर्थिक विकास के बारे में पिछले 30 वर्षों की कोई भी रिपोर्ट पढ़ लीजिये। सभी में लिखा है कि राष्ट्र के विकास के लिए पारदर्शिता, स्वच्छता, लालफीताशाही का उन्मूलन, प्रतियोगी अर्थव्यवस्था, सुलझे हुए श्रम कानून, बढ़िया इंफ्रास्ट्रक्चर, सरल टैक्स व्यवस्था, अधिक से अधिक उत्पादों और नागरिकों को टैक्स के दायरे में लाना इत्यादि सम्मिलित है।

लेकिन पिछली काँग्रेसी सरकारों ने इन सब के लिए कोई प्रयास नहीं किया क्योंकि एक सुदृढ़ और साफ-सुथरी अर्थव्यवस्था में चोरी करने के अवसर समाप्त हो जाएंगे और अभिजात्य वर्ग अपना साम्राज्य नहीं बनाये रख पाएगा।

हमने पानी की तरह अपने आप को काँग्रेसी पात्र में ढाल लिया था।

अब यह श्रेय तो प्रधानमंत्री मोदी को जाता है कि वह भारतीयों की चेतना को जगा रहे हैं और बतला रहे हैं कि पानी को पात्र के अनुरूप ढले रहने की आवश्यकता नहीं है। पानी अगर पात्र से बाहर निकल आए तो, उसकी उफान से बिजली बन सकती है, कृषि की सिंचाई हो सकती है, राष्ट्र की प्रगति हो सकती है।

पहली बार हम भारतीयों ने पिछले साढ़े चार वर्षों में काँग्रेसी कुंड के दायरे को छोड़कर स्वतंत्र रूप से बहना सीख लिया है।

मोदी द्वारा अभिजात्य वर्ग के रचनात्मक विनाश को समझिये और समर्थन दीजिए

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