पुरुष होने का भाव क्यों भूलते जा रहे हैं हम हिन्दू?

युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता है। वो सदा सत्य बोलते थे और धर्म के मार्ग पर चलते थे।

मगर क्या सत्यवादी धर्मराज महाभारत अकेले जीत सकते थे?… नहीं।

क्या कुरुक्षेत्र को जीते बिना वे महाराज बन सकते थे?… नहीं।

और जब दुष्ट दुर्योधन और कपटी शकुनि, योगेश्वर श्रीकृष्ण का निवेदन स्वीकार नहीं कर रहे थे, तो दोनों मामा-भांजे के रहते अंधा बाप धृतराष्ट्र कभी न्याय भी नहीं करता।

कटु सत्य है कि भ्राताश्री युधिष्ठिर, अनुज भीम और अर्जुन के बिना युद्ध में एक दिन भी नहीं टिक पाते। अर्थात धर्म की स्थापना बिना कर्म और पुरुषार्थ के संभव नहीं।

पुरुषार्थ, पुरुष होने का अर्थ है। पुरुष होने के अर्थ में ही पुरुष धर्म भी है। अब क्या पुरुष होने के अर्थ को भी यहां इस युग में विस्तार देना होगा?

पुरुषार्थ का ना होना एक अर्थ में नपुंसक होना भी कहलाता है। शायद पुरुष के लिए इससे बड़ी गाली कोई नहीं। इससे अधिक लज्जा की बात दूसरी नहीं।

लेकिन यहां तनिक ठहरिये, यह नपुंसकता सिर्फ संतान उत्पत्ति से संबंधित नहीं है। जंगल में कौन सा जानवर सबसे अधिक बच्चे पैदा करता है? वो शेर नहीं है, मगर फिर भी राजा वही कहलाता है। सबसे अधिक तो मच्छर पैदा होते हैं, मगर मच्छर मारने की कहावत उसे पुरुषार्थ के विपरीत अर्थ से जोड़ती है।

बच्चे तो भीष्म के भी नहीं हुए थे, मगर उनके पुरुष होने में कभी कोई शंका नहीं रही। यह दीगर बात है कि उनका पुरुषार्थ अधर्म के साथ होने के कारण प्रभावहीन और अर्थहीन हुआ था।

यहां पुरुष होने के अर्थ को पौरुष कह सकते हैं। यह पौरुष पुरुष होने का प्रतीक है। इसके मायने समझने हो तो किसी स्त्री से पूछिए कि वो अपने पुरुष से क्या क्या अपेक्षा करती है।

सनातन संस्कृति के नाम पर आजकल हम धर्म को लेकर बहुत बात करते हैं। जहां भी नजर दौड़ाओ भगवाधारी धर्मगुरुओं की कमी नहीं। मगर सवाल उठता है कि हम हिन्दू, पुरुष होने का भाव क्यों भूलते जा रहे हैं।

माना बाहुबल से मानसिक बल श्रेष्ठ है, किन्तु बिना बाहुबल के मानसिक बल की रक्षा नहीं हो सकती। अगर भीम और अर्जुन ना होते तो दुर्योधन ने युधिष्ठिर को पहले दिन ही दबोच लिया होता।

इसलिए मानव जीवन में शारीरिक बल की अवहेलना नहीं की जा सकती। अगर करोगे तो कोई दुष्ट आकर तुम्हारे ज्ञान के भंडार नालंदा को जला देगा। क्या कर पाए थे हम? कुछ नहीं। इसी पुरुषार्थ की कमी थी जो कोई आतंकी बाबर हमारी अयोध्या में प्रवेश तक कर पाया था।

अयोध्या, अर्थात जिसे जीता ना सके। उसी श्रीराम की अयोध्या, जो पुरुषोत्तम हुए। कैसे? अपने पुरुषार्थ के कारण। वनवास और रावण वध, दोनों में ही उनका पुरुषार्थ है। इसी पुरुषार्थ ने उन्हें प्रभु श्रीराम बनाया। यह उनका पुरुषार्थ ही था जो उन्होंने रामराज्य की स्थापना की। यह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पौरुष का प्रताप ही था जो अयोध्या अपने नाम को चरितार्थ करती आई है।

हैरानी होती है कि उसी अयोध्या को हमने एक बार गंवाया था। शुद्ध शब्दों में हमने अपने पुरुष होने का अर्थ खोया था। आज 6 दिसम्बर, उसी पुरुषार्थ की वापसी का प्रतीक है। हमारे शौर्य का प्रमाण है। यह सिर्फ एक तारीख नहीं, हमारा पुरुषार्थ है। अयोध्या के गौरव वापसी का दिवस है।

ऐसे में, आज के दिन को लेकर अनेक हिन्दुओं को कुतर्क के साथ जब किन्तु-परन्तु करते हुए देखता हूँ तो अटपटा लगता है। कुछ एक संबंधित पुस्तकों और लेखों को पढता हूँ तो उनकी बौद्धिकता से अधिक उनकी मानसिकता पर सवाल खड़ा हो जाता है, जब यह पाता हूँ कि उनके मन-मस्तिष्क में आज जो कुछ घटा था उसको लेकर अपराध बोध है।

यह अपराध बोध क्यों?

क्या हमने किसी और का हक़ छीना? नहीं।

क्या हमने किसी के अधिकारों का हनन किया? नहीं।

क्या हमने किसी के धर्मस्थल पर कब्जा किया? नहीं।

क्या हमने किसी और राज्य, देश पर आक्रमण किया? नहीं।

उलटे हमने अपने आस्था के केंद्र को एक अनैतिक कब्जे से छुड़वाया था, अंत में यह हमारे पांच सौ साल के संघर्ष का विजय दिवस है।

जो ऐसा नहीं मानते, वे दुर्योधन की सत्ता कबूल करते हैं। वे अधर्म के साथ हैं। वे पाप के पक्ष में खड़े हैं। वे रावण का सीता हरण स्वीकार करते हैं। वे द्रोपदी का चीरहरण को देख कर अनदेखा करते हैं। वे हर दुष्ट के अत्याचार के साथ हैं। वो बलात्कारी हत्यारे और लुटेरों के पक्ष में हैं।

तो क्या यह मान लिया जाए कि वे अपने परिवार समाज और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं हैं? ऐसे में क्या वे पुरुष कहलाने के लायक हैं? उन्हें जवाब किसी और को नहीं, उनको देना है जो उनसे पुरुष होने की अपेक्षा रखते हैं।

किसी भी उपवन के सौंदर्य का कोई औचित्य नहीं, अगर उसका माली उसकी सुरक्षा जंगली जानवरों से कर ना पाए और जबरन घुस आये को बाहर खदेड़ ना पाए।

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