भारत के स्वर्णिम अतीत और धूसर वर्तमान का सच

चाहे राफ़ेल आयात मुद्दे पर भारत का मौन हो या बोफ़ोर्स के धमाके में सत्ता का नाश, हल्दी के पेटेण्ट के लिये लड़ा जाने वाला कानूनी पचड़ा हो कि बासमती चावल की सौतेली बहनों के मार्केट में आने से असली बासमती चावल की खुशबू का दर्दनाक अन्त… हर हाल में हम मजबूर, लाचार, पिछड़े और परमुखापेक्षी दीखते हैं तो अनायास अपने अतीत पर कोफ़्त होने लगती है।

बस एक शेर याद आता है कि –

एक वो हम थे कि रोते को हँसा देते थे
आज ये हम हैं कि थमता नहीं आँसू अपना॥

वह भारत जो ब्रह्मास्त्र, अग्निबाण, वरुणास्त्र, नारायणास्त्र, आचार्य द्रोण की खोज ईषीकास्त्र, राजर्षि विश्वामित्र की बला अतिबला शक्ति, राजा दशरथ के और आधुनिक युग में पृथ्वीराज चौहान के शब्दवेधी बाण चलाने की क्षमता से लबरेज़ था…

ज्ञान के आगे धन की वो दयनीय स्थिति थी कि आज भी सदैव दरिद्र रहकर ब्राह्मण कर्म दक्षिणा अपने पैरों पर ही रखवाता है और अपने पारिवारिक बँटवारे में संपत्ति के हिस्सों में थोड़ी भूल चूक मान भी ले पर पुश्तैनी पुस्तकों का विभाजन आधा आधा ही करता है…

चिकित्सा की सफलता का आलम यह था कि संजीवनी बूटी से मृत लक्ष्मण के प्राण वापस आ गये, असुर गुरु कवि शुक्राचार्य ने दैत्यों के लिये अमृत से भरा एक कुण्ड बना दिया था जिसमें मृत देह डालने से मृतक की जान वापस लौट आती थी, चरक, जीवक सुश्रुत जैसे वैद्यों ने अंग प्रत्यारोपण, प्लास्टिक सर्जरी और शल्य चिकित्सा में उस समय सफलता के कीर्तिमान स्थापित कर लिये थे जब पाश्चात्य जगत के होमो-इरेक्ट्स होमो-सेपियन्स बने थे या नहीं, ये भी निश्चित नहीं है।

धन की महिमा थी पर उसकी महत्ता इतनी कम थी कि कौत्स ने महाराज रघु से एक सहस्र स्वर्ण मुद्रा से अधिक लेने से इनकार कर दिया था और बची हुई राशि रघु यह सोचकर अपने राज कोष में डालने तैयार नहीं थे कि यह धन तो कुबेर से हमने ब्राह्मण को देने के लिये अर्जित किया था। वह धन शायद कुबेर को ही वापस लेना पड़ा।

एक छोटा सा उपग्रह छोड़ कर हम फूले नहीं समाते जबकि त्रिशंकु महाराज सत्यव्रत के लिये ऋषि विश्वामित्र ने एक नयी दुनिया और एक नये स्वर्ग की सृष्टि आरंभ कर दी थी। ब्रह्मा के हस्तक्षेप से यह कार्य रुका था। आज भी नारियल चढ़ाने को बलि की सत्ता प्राप्त है और उसकी तीन आँखें विश्वामित्र की नयी मानवी सृष्टि के अजेय अभियान के प्रमाण रूप में आज भी हमारे सामने है।

ऐसे आर्यावर्त को जब अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी के आगे जीवन रक्षक दवाओं के पेटेण्ट खरीदने को, अपनी सीमारक्षा हेतु युद्धक विमान और अन्यान्य आयुध क्रय हेतु नतमस्तक देखना पड़ता है और भारतीय छात्रों को भारतीय प्राचीन ज्ञान पर शोध करने के लिये विदेशी विश्वविद्यालयों में जाते देखता हूँ तो सचमुच व्यथा से हृदय आकंठ भर आता है…

व्यथा से हृदय आकंठ भर आता है कि आह! अगर हमारे पूर्वज अगर थोड़े और प्रैक्टिकल होते तो आज हम अस्त्रों के बेमिसाल निर्यातक होते, संजीवनी बूटी का जूस घृतकुमारी और गेहूँ के ज्वारे के जूस की तरह बेच कर हेल्थ टाइकून बन चुके होते। क्यों हमारी खोज शून्य से शुरू होकर आज भी शून्य ही है तो बहुत खिन्न हो उठता है हम भारतीयों का मन कि क्या इतने दैदीप्यमान अतीत वाले आर्यावर्त का ऐसा धूसर वर्तमान; लानत है।

पर ऐसा नहीं है। हमारा आर्य मन आज भी इसमें थोड़ी सकारात्मकता ही ढूँढना चाहता है। दरअसल हमारे पूर्वज वैज्ञानिक नहीं, दार्शनिक थे; धनवान न होते हुए भी मानसिक ऐश्वर्य से परिपूर्ण थे, प्रकृति के औषधीय गुण का उपयोग करना जानते थे न कि उनका दोहन।

याद करें कि सुषेण ने लक्ष्मण को संजीवनी बूटी से जिलाया पर ऐसा उसने रावण के पुत्रों या बान्धवों के लिये नहीं किया, आखिर क्यों? उत्तर है कि कवि सुषेण को पता था कि अगर ये विद्या असुर प्रवृत्ति को ज्ञात हो गयी तो मृत्यु, धन और आसुरी प्रवृत्ति के आगे हार जायेगी और सृष्टि का नियम ध्वस्त हो जायेगा।

आज तुलसी जैसा दिव्य पौधा बाज़ारवाद के अधीन होकर गोभी बैंगन की तरह खेतों में उपजाया जा रहा है और पारिजात और कल्प वृक्ष से भी उच्च गरिमा प्राप्त यह महौषधि पुआल से भी बदतर हाल में मिल रही है।

कस्तूरी के औषधीय गुणों के कारण कृष्ण मृग तो लुप्तप्राय ही हो गये हैं जबकि बाघ के मांस में वाजीकरण संबंधी गुण पाकर चीन इस लुप्तप्राय जीव की फ़ार्मिंग करने के लिये विश्वनेतृत्व के आगे जुगाड़ में लगा हुआ है।

हमारा भारतीय मन आज भी एड्स के पीछे एक नये टीके की संभावना तलाशने वाले अमरीका और पाश्चात्य देशों की बाज़ारू-पने को ताड़ रहा है। रक्त शर्करा और मधुमेह के संग रक्तचाप के मनमर्जी लिमिट फिक्सेशन ने इनकी दवाओं का मार्केट अरबों डॉलर का बना दिया हैं।

कैंसर की भयावहता का दोहन कर आज आसन्न मृत्यु की गति धीमी करने का बाज़ार भी करोड़ों का बना दिया गया है और उसी डर का सहारा लेकर चिकित्सा बीमा का मार्केट भी आसमान को छू रहा है।

तो इतना तो आप मानेंगे कि अपने चिकित्सकीय धरोहर को कुपात्र से बचाकर हमारे पूर्वजों ने मानवीय करुणा का दोहन होने को रोका तो ज़रूर। हमारा च्यवनप्राश अश्विनी कुमारों के द्वारा ऋषि च्यवन के कायाकल्प का सबूत बना हुआ आज भी सर्वश्रेष्ठ त्रिदोष नाशक बन कर बाजार में बिक रहा है।

यही बात अस्त्र अनुसंधानों की भी थी। कुपात्र के हाथ में जाने से रोकने के लिये ऋषियों ने सदैव प्रयास जारी रखा। ध्यान के माध्यम से अस्त्रविद्या का ज्ञान पाने वाले एकलव्य का अंगूठा लेना द्रोण की सजगता का एक प्रमाण है कि धनुर्वेद का प्रयोग अशिक्षितों और चिड़ीमारों के द्वारा चिड़िया मारने में ना हो, वहीं कर्ण को परशुराम के द्वारा दिया गया समय पर ब्रह्मास्त्र भूलने का शाप शौर्य के उतावलेपन से विश्व को दिव्यास्त्रों द्वारा नष्ट होने से बचाने की एक कोशिश भर थी।

अस्त्र विद्या, धनुर्वेद, आयुर्वेद, स्थापत्य कला, ज्योतिष, नक्षत्रशास्त्र, शल्यक्रिया, तन्त्र और मन्त्र विद्या आदि के ज्ञान को क्लिष्ट भाषा संस्कृत में व्याकरण और कूट पद्धति द्वारा गोप्य रखा गया ताकि ज्ञान का समापन भले हो जाये पर उस विद्या को किसी कुपात्र द्वारा दुरुपयोग होने से पूरी तरह बची रहे।

शायद यही वज़ह है कि कुबेर से रावण ने पुष्पक विमान छीन तो लिया पर एक दूसरा समतुल्य विमान कभी बना नहीं पाया जबकि अमरीकी रडारों को धता बता कर कुछ सरफिरों ने उन्हीं के वायुयान से टक्कर मार कर उनकी ही गगनचुम्बी अट्टालिका जमींदोज़ कर दी। सबूत में आज भी ९११ (911) पूरे अमरीका में एसओएस नम्बर के रूप में प्रचलित है।

एके सैंतालिस और एके छप्पन रायफ़लें दुनिया में गरीब और ज़रूरतमन्द संप्रभु सरकारें खरीद नहीं पा रही हैं और आतंकी इसे खरीदकर इसका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। पूरी कोशिश करके भी विश्व की सर्वश्रेष्ठ गुप्तचर संस्थाएँ ये बताने में असफल हैं कि इस्लामिक परमाणु बम आज कल आतंकी कब्ज़े में है या नहीं।

पर हमारी आर्य संस्कृति साक्षी है कि आज तक ब्रह्मास्त्र की चोरी संभव नहीं हुई, न ही ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से किसी योद्धा की मृत्यु की चर्चा भी हुई हो जबकि एक गलतफ़हमी की वज़ह से अमेरिकी उतावलेपन का परिणाम हिरोशिमा और नागासाकी को भुगतना पड़ा।

तो इतना मान लीजिये कि हमारे पूर्वज दूरदर्शी थे इसीलिये ज्ञान को चमत्कार का जामा पहनाकर पार्थिव ऐश्वर्य प्राप्त करने का ज़रिया कभी नहीं बनने दिया और कुछ विद्याएँ लुप्त ज़रूर हो गईं पर उनका दुरुपयोग कभी संभव नहीं होने दिया।

आज विज्ञान की हर शाखा में नोबेल पुरस्कार हथियाने वाला अमरीका, ब्रिटेन, रूस और फ़्रांस जैसे देश उसी विज्ञान की खोजों का दुरुपयोग से खुद को बचाने में समर्थ नहीं हैं और जिस अतिथि को हम ‘अतिथि देवो भव’ कहकर पलक पाँवड़े बिछाते हैं उन अतिथियों को ये ताकतवर देश नंगा करके तलाशी लेने पर मज़बूर हैं, अगर यकीन न हो तो अपने हिन्दुस्तान में असहिष्णुता को महसूस करने वाले बंबइया बादशाहों से पूछकर देखिये।

सनातन धर्मियों का आत्मघाती विवेक

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