पुरोहितजी कहिन : हिन्दू अपेक्षाओं के लिए यदि भाजपा बांझ है, तो काँग्रेस ‘डायन’

मित्रों! राजस्थान में परसों दिनाँक 7 दिसम्बर को मतदान दिवस है, जहाँ जनता जनार्दन अपना राजकीय मुख्य लोकसेवक चुनने जा रही है।

जिस धर्म संकट में इस बार राजस्थान का वोटर है वह निश्चित रूप से अपूर्व है। 2014 की अंध मोदीलहर से परे इस बार जहां भाजपा केंद्र एवं राज्य दोनों की एंटी इनकंबेंसी का सामना करने जा रही है, वहीं काँग्रेस के पास खोने को कुछ भी नहीं है क्योंकि ‘नंगा नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या’?

यही वजह है जिसके चलते हैं चुनाव घोषणा के पूर्व से यह माना जाता रहा है कि इस बार काँग्रेस के जीतने की संभावनाए बहुत ही प्रबल एवं सकारात्मक है, किंतु मित्रों! जैसा कि लोकतंत्र में सर्वविदित ही है मतदान के 1 घंटे पहले तक किसी को निश्चित अनुमान नहीं लग पाता कि जनता जनार्दन क्या निर्णय लेने वाली है।

अब तक इस राजस्थान चुनाव में भी यही देखने को मिल रहा है जहां भाजपा शुरुआत में पिछड़ी हुई थी या मैं कहूं रेस से बाहर ही थी, वही भाजपा अब सुरक्षित रूप से भी कहें तो टक्कर दे रही है ठीक से।

उसके पीछे जो नियम है वह यह है कि निश्चित रूप से चुनाव जो है वह युद्ध के समान है जिसमें योद्धा, उनकी युद्ध कुशलता, सेना, रणनीति एवं भाग्य सभी का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है।

भाजपा के योद्धाओं ने, चाहे वे केंद्र के रहे हो अथवा राज्य के, सत्ता के हो अथवा संगठन के, उन्होंने प्रारंभिक पिछड़ेपन को कवर करके भाजपा को आज मुख्य मुकाबले में ला खड़ा किया है।

मित्रों! आलाकमान ने टिकट वितरण में अत्यंत समझदारी से वसुंधरा राजे को बांधने का प्रयास किया है, उनके प्रभाव को सीमित करने का प्रयास किया है। यह निश्चित ही प्रशंसा योग्य है।

मित्रों! पिछले एक वर्ष से यह माना जा रहा है कि राजस्थान में स्वयं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ही जनता के कोप की मुख्य कारक है और यह बात सिरे से खारिज करने योग्य भी नहीं है, इसमें सत्य भी समाहित ही है।

हिंदू बाहुल्य इस राज्य में जहां सीधे-सीधे धार्मिक ध्रुवीकरण की कोई संभावना नहीं है वहीं इस 21वीं सदी में अपने ‘राजनीतिक हितों को लेकर सजग हिंदू युवा वोटरों’ का मन टटोलना भी अब हर राजनीतिक पार्टी के लिए आवश्यक हो गया है।

यह बिंदु अब अत्यंत ही महत्वपूर्ण है कि हमेशा की तरह अंततोगत्वा हिंदू वोटर निश्चित रूप से भाजपा के साथ हैं, उन्हें अच्छे से पता है कि 60 साल की छद्म धर्मनिरपेक्षता नामक तुष्टिकरण मे लिप्त पार्टी जो सत्ता पर स्थाई रूप से काबिज़ रही है उसे उखाड़ने में अभी कुछ समय लगेगा और वह समय भाजपा को दिया जाना चाहिए।

साथ ही जिस धर्म संकट का वर्णन में शुरुआत में कर रहा था वह भी यही है कि क्या वसुंधरा राजे से अपनी नाराज़गी निकालने के लिए काँग्रेस को सत्ता में लाकर हिंदुत्व के दीर्घगामी एजेंडे को क्षति पहुंचाने का दोष राजस्थान के वोटर अपने सिर लेंगे?

आइए! मामले को शुरू से समझते हैं। आलाकमान को अच्छी तरह से पता था कि मुख्यमंत्री राजे के प्रति जनता में नाराजगी भाजपा को राजस्थान में महंगी पड़ सकती है और उस पर संभावित सभी विकल्पों पर विचार किया जा रहा था।

किंतु इसमें उन्हें स्वयं मुख्यमंत्री राजे का सहयोग नहीं मिला क्योंकि वे यह मानने को तैयार ही नहीं थीं कि उनका कार्यकाल किसी अति विशिष्ट उपलब्धि के साथ नहीं है जिसके चलते 2013 में उन्हें मिले अपूर्व जनसमर्थन को तौला जा सके।

सच कहा जाए तो वस्तुस्थिति यह है कि 2013 में भी वसुंधरा जी को मिला जनसमर्थन मूलतः मोदी लहर ही थी जो कि 2014 में मोदीजी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए बिल्कुल उग्र जनता की आंशिक अभिव्यक्ति थी, वसुंधरा राजे जी ने बड़ी चतुराई से उस व्यापक जनसमर्थन को राजनीतिक रूप से स्वयं के पक्ष में भुना लिया।

तब उन्होंने आलाकमान को ब्लैकमेल किया था किंतु अब ऐसा संभव नही हैं, आलाकमान एवं संघ के नेतृत्व में संगठन ने उन्हें अपनी सीमा का एहसास करवा दिया है।

चूंकि वह समय लोकसभा चुनाव से ठीक 6 महीने पहले का था जिसका उन्होंने जमकर लाभ उठाया। विधानसभा के टिकट वितरण से लेकर लोकसभा के उम्मीदवार चयन एवं उसके बाद 5 साल तक वसुंधरा जी ने अपने उस कथित जनादेश को जमकर भुनाया, तानाशाही की, केंद्र की अवहेलना भी की।

मित्रों! इस बार भी आज से 6 महीने बाद लोकसभा के चुनाव है किंतु इस बार वसुंधरा जी एंटी इनकंबेंसी एवं संघ सहित संगठन के नाराज़ होने से उत्पन्न प्रभाव को उपचुनावो में आंक चुकी है और उन्हें अच्छे से पता है कि वे बिना संगठन, संघ, आलाकमान के सहयोग के राजस्थान की चुनावी वैतरणी पार नहीं कर पाएंगी।

अतः वे भी अब समझौते को तैयार दिख रही हैं, 2013 और 2018 यही अंतर जनता को समझना चाहिए!

आलाकमान भी स्थिति को अच्छे से समझ चुका है इसीलिए उसने भी इस बार टिकट वितरण में जमकर उठापटक की एवं कई मंत्रियों सहित राजे के खास विधायकों के टिकट काटे।

मित्रों! भाजपा आलाकमान ने बहुत ही समझदारी से राजस्थान चुनाव के टिकट वितरण एवं चुनाव अभियान को अब तक संभाला है और अब यह जनता पर है कि वह संगठन के इस संकेत को समझ सके कि जनता की नाराज़गी दूर करने के सभी विकल्प खुले हैं पार्टी आलाकमान की तरफ से, किंतु पार्टी को जिताकर।

क्योंकि काँग्रेस को जिता कर हम अपनी नाराजगी व्यक्त तो कर देंगे किन्तु इस तरह से साँप मारने में हमारी लाठी भी टूट जाएगी! ऐसे में श्रेष्ठ यही है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे! उसके लिए आवश्यक है कि राजस्थान में भाजपा एवं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को अलग अलग करके देखा जाए! भाजपा को चुना जाए लेकिन यह विश्वास रखा जाए कि आलाकमान शीघ्र ही वसुंधरा जी को राजस्थान से दूर करने में सफल होगा।

जहां तक संभावनाएं हैं सीटों का परिणाम टैली कुछ इसी प्रकार का बैठने वाला है जिसमें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के महत्वपूर्ण रोल की आवश्यकता पड़ेगी जिसमें कई ‘डार्क हॉर्स’ काम आएंगे!!!

मित्रों! नि:संदेह भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार से हमारी कई शिकायत रही हैं लेकिन फिर भी दीर्घकालिक रणनीति के अंतर्गत हमें इस बार भी भाजपा को फिर से सत्ता दिलाना अपरिहार्य है।

मित्रों! एक उदाहरण है, जो मैं समझाना चाहता हूं वहीं तक समझें (नारी सम्मान की अपरिहार्य श्रेष्ठता को शिरोधार्य रखते हुए),

भाजपा एवं काँग्रेस में यही अंतर है कि हिन्दू अपेक्षाओं के लिए भाजपा बांझ है तो काँग्रेस ‘डायन’ है!!!

चयन आपका है।

भाजपा से आपकी मुख्य आकांक्षाएं जो अब तक परिणामरहित रही हों किंतु फिर भी संभावनाएं शेष हैं, जबकि काँग्रेस के साथ सर्वनाश स्वत: समाहित ही है इसलिए राजस्थान के मेरे मित्रों! यथासंभव भाजपा को जिताने के लिए अपना सर्वश्रेष्ट प्रयास करें।

स्मरण रखे कि शेर कितना भी भूखा क्यों ना हो कभी घास नही खाता! वसुंधरा जी को नहीं भाजपा को जिताइये।

जहां जहां संगठन ने ‘राजे टीम’ से परे प्रत्याशी दिए हैं, उन्हें जी जान से जितवाईये और देखिये आलाकमान कैसे आपकी नेतृत्व परिवर्तन की इच्छा को भी पूरा करता है।

अपने मताधिकार का उपयोग अवश्य करें, समझदारी से वोट करे, साँप भी मारें और लाठी भी ना टूटने दें!

पराजय के अपमान के बजाय राष्ट्रीय सम्मान की अधिकारी हैं वसुन्धरा राजे

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