यह हो सकता है मुद्रा लोन से

यह लेख इस वर्ष जून में लिखा था। उस समय भी कारण यह था कि मुद्रा योजना के खिलाफ काँग्रेसी प्रवक्ता पवन खेड़ा बहुत अनर्गल विलाप-प्रलाप कर रहे थे। लेकिन किन्हीं कारणों से प्रकाशित करना टल गया था। लेकिन कल उन्हीं पवन खेड़ा को मुद्रा योजना के खिलाफ ज़हर उगलते, बौराते हुए देखा तो आज इसे साझा करना प्रासंगिक समझा।

काँग्रेसी चीफ नेता से लेकर काँग्रेसी चीप नेता तक मुद्रा योजना का मज़ाक हर समय यही कहकर उड़ाते रहते हैं कि 15-20 हज़ार रूपये में क्या हो सकता है। अतः आज यह लेख उसी का जवाब है।

लखनऊ के महात्मा गांधी मार्ग स्थित राजभवन से लगभग 200 मीटर आगे चौराहा पार करते ही राजधानी के मुख्य डाकघर GPO की चहारदीवारी प्रारम्भ हो जाती है।

इस चहारदीवारी के सहारे वहां लगभग डेढ़ दर्जन चाय पान नाश्ते आदि की छोटी छोटी अस्थायी दुकानें कुछ घण्टों के लिए ज़मीन पर लगती हैं। जो शाम होने से पहले सिमट जाती हैं।

उन्हीं दुकानों के बीच 3-4 लोग साइकिलों पर पूड़ी सब्ज़ी भी बेचते हैं। उनकी घर की बनी पूड़ी और काले मिर्च के आलू की सब्ज़ी इतनी स्वादिष्ट होती है कि उधर से जब भी गुजरना होता है और समय होता है तो मैं वहां रुक कर 10 रूपये की 2 पूड़ी खा ही लेता हूं।

मेरे कई मित्र भी अक्सर ऐसा करते हैं। उन्हीं पूड़ी बेचने वालों में से एक के पास से मैं अधिकतर पूड़ी लेता था उसकी बातचीत का लहजा मुझे कुछ खटकता था। अतः एक दिन उससे पूछ ही लिया कि कितना पढ़े हो?

उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था भाई साहब BA, BEd हूं। उसकी शैक्षिक योग्यता सुनकर मैं चौंका था। उसने बताया कि 2007-08 के सत्र में पढ़ाई पूरी कर ली थी। सरकारी नौकरी के लिए बहुत भटका लेकिन नहीं मिली।

मैंने पूछा कि प्राइवेट स्कूल में भी तो पढ़ा सकते थे? उसका जवाब था कि भाई साहब दिखावे से ज़िंदगी नहीं गुज़रती, प्रयास किया था नौकरी भी मिल गयी थी लेकिन जितना पैसा वो स्कूल वाले देते थे उससे जीवन नहीं गुज़र सकता था। 7 साल हो गए यह काम करते हुए। अब उससे बहुत ज्यादा अब कमा लेता हूं।

दिन में कितनी पूड़ी बेच लेते हो? मेरे इस सवाल पर उसने कहा था 400 के करीब बिक जाती हैं।

इस बातचीत के बाद मैंने अपने उन कुछ मित्रों से बात की जिनका खानपान का व्यवसाय है तो उनका कहना था कि इस आदमी की रोज की लागत 6-7 सौ रुपये से अधिक नहीं होगी।

अर्थात प्रतिदिन न्यूनतम 12-13 सौ रूपये की आय। जिस दिन डाकखाना बन्द रहता है उस दिन यह दुकानें भी बन्द रहती हैं। अतः महीने में औसतन 24 दिन लगती हैं यह दुकानें। मासिक आय का अनुमान स्वयं लगा लीजिये। एक साइकिल, एक गैस सिलेंडर/ चूल्हा और पूड़ी सब्ज़ी के बनाने के बर्तन खरीदने की लागत क्या 20 हज़ार रुपये से ज्यादा होगी?

आज उपरोक्त प्रसंग का उल्लेख इसलिए क्योंकि कल राजस्थान में काँग्रेसी प्रवक्ता पवन खेड़ा चीख रहे थे कि “मुद्रा लोन के 91% लाभार्थियों को औसतन मात्र 23,000 रूपये कर्ज़ मिला है, इतने कर्ज़ में कोई क्या कमाएगा, क्या खाएगा, पकौड़े भी नहीं बेच पाएगा।”

हालांकि काँग्रेसी प्रवक्ता का उपरोक्त आंकड़ा ही गलत था, वो सफेद झूठ बोल रहे थे लेकिन उसके इस आंकड़े को ही सही मानकर मैंने जवाब लिखा है।

वैसे भी पवन खेड़ा को यह याद दिलाना भी जरूरी है कि… 2014 में 11.6 करोड़ बेरोज़गारों में 3.5 करोड़ अनपढ़ व 4.1 करोड़ नॉन मैट्रिक बेरोज़गारों की जो 63% फौज काँग्रेसी UPA छोड़कर गयी थी उसको गो पालन, पकौड़े की दुकान या 20-25 हज़ार के मुद्रा लोन से लघु स्वरोजगार की सलाह सहायता ना देकर क्या भूखा रहने की सलाह दी जाए?

अब इस कथा का दूसरा पहलू। मैंने उससे उसका नाम भी पूछा था। उसने बताया था दिनेश कुमार वर्मा। यहां स्पष्ट कर दूं कि उत्तरप्रदेश में वर्मा समुदाय मण्डल कमीशन के तहत 27% आरक्षित कोटे वाली पिछड़ी जातियों में शामिल हैं। दलित वर्ग में भी कुछ जातियां वर्मा लिखती हैं।

अतः उपरोक्त प्रकरण यह भी बताता है कि आरक्षण की एक सच्चाई अब यह भी है कि आरक्षित श्रेणी की नौकरियां भी सहज सुलभ उपलब्ध नहीं हैं। वहां भी ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा होने लगी है।

सोशल मीडिया के दौर में लद चुके काँग्रेसी फौज के झूठ फ़रेब के दिन

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