फैज़ अहमद फैज़ के बहाने : मुस्लिम कभी वामपंथी नहीं होता!

भारत से अलग हुए पाकिस्तान में एक फैज़ अहमद फैज़ बहुत बड़े उर्दू के शायर रहे हैं. वामपंथीयों का नैशनल एंथम इन्होंने ही गाया है.

“हम देखेंगे वह दिन की जिसका वादा है” …

यह वाला …. जरूर सुनिये।

वैसे यह गजल मुझे भी बहुत पसंद है… बहुत ही ज्यादा क्रांतिकारी है… जिसका कुल मिलाकर आशय यह है कि एक रोज हम वह दिन ज़रूर देखेंगे जिस दिन दुनिया पर दबे, कुचले, कमज़ोरों और मजदूर टाइप लोगों का राज होगा, यह जितने भी नामदार लोग ताज पहन बैठ हैं सबको गद्दी से हटाकर अब तक शोषण भुगत रहे लोगों का राज लाया जायेगा.

बेहद ही उम्दा लाइनें…

जैसे……

“हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे”…..

मुझे इस गाने से कोई दिक्कत नहीं है… ना ही फैज़ साहेब से, दिक्कत तो है केवल और केवल इनके दोगलापंती से…

फैज़ अहमद फैज़ साहब पाकिस्तान के वामपंथी संगठन से जुड़े थे, वामी थे…

चौंकिये मत कि एक इस्लामीक देश में वामपंथी संगठन कैसे है? वैसे आपका चौंकना लाज़मी है. कारण एक बात तय है कि एक वाम शासित राष्ट्र में इस्लाम को नहीं पनपने दिया जाता… और ना ही इस्लामिक राष्ट्र में वामपंथ को.

वामपंथीयों के राष्ट्र में तो लोकतंत्र नाम की चीज़ होती नहीं… तो दूसरा कोई राजनैतिक विकल्प देने वाला संगठन होगा ही नहीं. इस्लामिक संगठन की तो बात ही दूर है… वहीं किसी इस्लामिक राष्ट्र में वामपंथ संगठन हो तो ढूँढ लीजिये, नहीं मिलेगा. मिलेगा भी तो उसकी औकात चेक करो.

हाँ जहाँ पर लोकतंत्र नामक चिड़िया होगी वहाँ जरूर यह दोनों साँप और नेवला एकजुट हो जायेंगे … वहाँ उन्हें बराबर धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी बकैतीयाँ सुझेगी … लेकिन जहाँ इनका एकछत्र राज है वहाँ मजाल है आप इनके खिलाफ आवाज उठा दें… वामपंथी राष्ट्रों चीन और रूस में मुसलमानों को कितनी आज़ादी है पता कीजिये… ठीक उसी तरह पाकिस्तान जैसे राष्ट्रों से कैसे वामपंथ खत्म किया गया वह भी देखिए..

क्या किसी इस्लामिक राष्ट्र में खड़े हो कर यह धर्म को अफीम कह सकते हैं? .. इशनिंदा न लग जाये इनपर …

खैर बात फैज़ साहेब, उनकी इस गजल तथा उनके दोगलेपंथी की…

पाकिस्तान में किसी दौर में “पाकिस्तानी वामपंथी संगठन” बना था… यह महाशय उसी से जुड़े थे… कार्ल मार्क्स और लेनिन जैसे उच्च कोटी के वाम विचारों से प्रेरित पार्टी थी यह… लेकिन मार्क्स बाबा तो कह गये थे कि धर्म अफीम है… लेनिन ने तो कितने ही चर्च ढा दिये… स्टालिन ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी धर्म स्थलों को तोड़ने में…

वामपंथी जिस प्रकार का शासन चाहते हैं उसका समर्थन कभी एक धार्मिक व्यक्ति कर ही नहीं सकता… कारण एक धार्मिक व्यक्ति अपने अन्नदाता को भगवानस्वरूप मानता है… लेकिन वामपंथी तो अन्नदाता को मार कर स्वयं मालिक बनने की शिक्षा देते हैं… जिसमें धार्मिक व्यक्ति रोड़ा बनता है… कारण धर्म चाहे जो भी हो वह अपने मालिक की इज्जत करना सीखाता है… ना कि क्रांति के नाम पर उसका गला रेतना…

इसलिये पहले वह धर्म खतम करते हैं… यही पहली सीढी है…

लेकिन अब जब फैज़ साहेब एक सच्चे वामपंथी थे… तो फिर वह अपने इसी गजल में ऐसा क्यूँ लिखते हैं? …

” बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो”….

अरे भाई जब केवल और केवल अल्लाह मियाँ का नाम रहेगा ही तो वामपंथ कैसे साकार होगा? … बिना धर्म को खतम किये कैसे आयेगी क्रांति? … वैसे वहाँ अल्लाह की जगह किसी हिन्दू देवी देवता का नाम भी आया होता… येशू मसीहा का नाम भी आया होता तो मेरा सवाल नहीं बदलता… एक वामपंथी का पहला कर्तव्य ही यही है कि धर्म का नाश करो… जो ऐसा नहीं करता वह कैसा वामपंथी? …

सच्चे वामपंथी की गज़ल तो ऐसी होनी चाहिये … ” बस नाम रहेगा मजदूरों और किसानों का ..”…

अल्लाह के नाम के साथ वामपंथ कैसे?

तो भाई साहब इसका जवाब कुछ यूँ है कि एक हिन्दू वामपंथी भले ही अपने देवी देवताओं का उपहास उड़ा ले, बीफ पार्टी का आयोजन करे लेकिन एक मुस्लिम वामपंथी उमर खालिद इंशा अल्लाह के नारे ही लगायेगा, वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ता पाँच टाइम की नमाज ज़रूर पढेंगे … अर्थात एक मुस्लिम कभी दिल से वामपंथी हो ही नहीं सकता…. उसके लिये उसका मज़हब सदैव सर्वोपरि होता है …

फैज़ साहेब भी वैसे ही मुस्लिम वामपंथी थे….

उनका भी अंतिम मकसद यही था कि – ” बस नाम रहेगा अल्लाह का”…

– अभिनव पाण्डेय

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