शासन चलाने और जनता को सुख-समृद्धि देने में अक्षम है विषैला वामपंथ

गतांक से आगे…

इतिहासकारों को बीसवीं सदी का इतिहास लिखते समय यह दुविधा बहुत सताएगी कि देंग सियाओ पिंग और ली कुआन यू में महानतम राष्ट्रनायक किसे चुनें।

दोनों ने एक पूर्वी परंपरागत समाज में पाश्चात्य पूंजीवाद के सफल प्रयोग किये। दोनों ने अपना अपना जीवन वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में शुरू किया पर आगे चलकर प्रागमेटिज़्म को चुना।

दोनों ने परिणामों को सिद्धांतों के ऊपर महत्व दिया। ली ने जहाँ अपने प्रयोग एक डेमोक्रेटिक व्यवस्था के अंदर किये, वहीं देंग ने एक घोर कम्युनिस्ट समाज में। सिर्फ आर्थिक नीतियों में ही नहीं, सामाजिक व्यवस्था में भी ली ने सिंगापुर को घोषित रूप से और देंग ने चीन को अघोषित रूप से परंपरागत कंफ्यूशियन सिद्धांतों पर चलाया।

वहीं एक विरोधाभास यह भी है कि डेमोक्रेटिक व्यवस्था के बावजूद जहाँ ली ने अपनी लोकप्रियता और सर्वमान्यता से एक डिक्टेटर का रुतबा हासिल कर लिया था, वहीं एक कम्युनिस्ट व्यवस्था का प्रमुख होते हुए भी देंग को अपने प्रयोगों और विचारों के लिए काफी प्रतिरोध झेलना पड़ा। उन्हें अपने निर्णय धीरे धीरे, सावधानी से लोगों के गले से नीचे उतारने पड़े।

धीरे धीरे उन्होंने अपने विरोधियों को हाशिये पर धकेल दिया था। वे स्वयं सर्वोच्च पद पर नहीं थे, पर उनका प्रभाव सर्वोपरि था। फिर भी उनके ये प्रयोग कम्युनिस्ट विचारधारा के इतने विपरीत थे कि उनके विरोधी हमेशा बहुत मुखर रहे पर समर्थक थोड़े सहमे सकुचाये रहे।

स्पेशल इकनोमिक ज़ोन्स ने देश में उन्नति का रास्ता खोल दिया और जो भी प्रान्त इस ज़ोन्स में पड़े वे दूसरे क्षेत्रों की ईर्ष्या का केंद्र थे। यही नहीं, आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप भी खूब लगे, जो कि स्वाभाविक था। पर देंग की व्यक्तिगत इंटीग्रिटी पर कोई प्रश्न नहीं था।

देंग ने कई प्रभावशाली व्यक्तियों को चुना और उनके सहारे अपने आर्थिक सुधार लागू किये। वे अपने जीवन के आठवें दशक में थे और उनकी सुनने को शक्ति लगभग समाप्त हो गई थी। हर बात को माइक्रो-मैनेज करना संभव नहीं था। उनकी टीम में कई प्रभावशाली भविष्य के नेता उभरे। उनके आर्थिक सुधारों के प्रैक्टिकल कार्यान्वयन में मुख्य भूमिका रही शी जोंग्शुन की, जो वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पिता थे।

इस बीच पूरी दुनिया में यह कम्युनिस्ट सरकारों के पतन का काल था। बर्लिन वॉल गिरी, रोमानिया के तानाशाह को हटाया गया और रूस के टुकड़े टुकड़े हो गए। चीन में भी एक लहर तिनामेन स्क्वायर में छात्रों के विद्रोह के रूप में आयी थी, जिसे कुचल दिया गया था।

पर चीन का नेतृत्व इन परिवर्तनों को लेकर बहुत नर्वस था। हालाँकि राष्ट्रपति जियान ज़े मिन देंग की टीम में थे, पर परिवर्तन की गति को लेकर वे भी बहुत चिंतित थे। सभी को लग रहा था कि जिस गति से परिवर्तन हो रहे हैं, उसे नियंत्रित नहीं किया गया तो चीन का भी वही होगा जो रूस का हुआ।

पर देंग की पकड़ जनता की नब्ज़ पर ज्यादा अच्छी थी। उनका आंकलन था कि जन-विद्रोह से बचने का सबसे अच्छा रास्ता यह है सुधारों की गति घटाई नहीं, तेज़ की जाए। हालाँकि 1989 में वे सक्रिय राजनीति से रिटायर हो चुके थे, पर इस परिवर्तन के दौर में चीनी नेतृत्व की इस दुविधा को वे ध्यान से देख रहे थे।

1992 में, 88 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी आखिरी पारी खेली। वे अपने पूरे परिवार, पत्नी, बेटे बहू, नाती-पोतों के साथ छुट्टी मनाने पूरे चीन की यात्रा पर निकले। उनका सिर्फ एक बेटा उनके साथ नहीं गया जो कल्चरल रेवोल्यूशन के समय से पैरालाइज्ड था।

हालाँकि यह एक पारिवारिक छुट्टी थी, पर यह मूलतः एक राजनीतिक पीआर एक्सरसाइज थी। देंग जहाँ जहाँ रुके, बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आने लगे। वे हर जगह, हर रोज़ सामान्य जनता से मिलते… व्यवसायियों, कारीगरों, उद्योगपतियों और किसानों से मिलते… उनसे बातें करते। और हर जगह एक ही थीम थी… लोग और ज्यादा सुधार, और अधिक आर्थिक स्वतंत्रता चाहते थे। और उन सबको देंग का संदेश भी स्पष्ट था… और अधिक मेहनत करो, अधिक रिस्क लो… अपना व्यवसाय और उद्योग बढ़ाओ…

यह मैसेज जनता के साथ साथ शासन को भी स्पष्ट शब्दों में गया। उनकी यात्रा पर उमड़ती भीड़ और इसको मिलने वाले कवरेज को नज़रंदाज़ करना आसान नहीं रह गया था। बीजिंग में बैठे नेतृत्व ने अवसर को पहचाना कि हवा किधर बह रही है। और देखते देखते सारा पार्टी नेतृत्व आइडियोलॉजी से जुड़े अपने आग्रह और संकोच को छोड़ कर आर्थिक सुधारों की गति बढ़ाने के समर्थन में आ गया।

उसके बाद देंग ने और किसी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लिया। उनका अपना परिवार राजनीति से हमेशा दूर ही रहा। 1997 में, 93 वर्ष के देंग का अपने घर में देहांत हो गया।

हालाँकि वे काफी समय से बीमार और पार्किंसोनिज़्म से पीड़ित थे, और उनके परिवार के अलावा किसी ने उन्हें वर्षों से नहीं देखा था। उनकी मृत्यु अपेक्षित थी पर उनके जाने के दुख में पूरा देश रो पड़ा। अगर आपने अटल बिहारी वाजपेयी जी की मृत्यु पर आँखें गीली की हों, या अकेले में फूट फूट कर रोये हों तो इस राष्ट्रनायक के जाने के क्षण को खुद महसूस कर सकते हैं।

माओ और देंग के बीच का यह अंतर कम्युनिज़्म के दो पहलुओं को बहुत स्पष्टता से दिखाता है। लोग कहते हैं, माओ एक महान वॉर-टाइम लीडर था, पर एक खराब पीस-टाइम लीडर था। पर इसे सिर्फ दो व्यक्तियों के व्यक्तित्व का अंतर समझना इतिहास के इस सबक के साथ न्याय नहीं होगा।

माओ की अपनी नेतृत्वक्षमता संदेह से परे है। माओ के रहते दूसरा कोई भी व्यक्तित्व उसके सामने कहीं भी खड़ा नहीं हो सकता था। पर माओ की बहुत बड़ी कमज़ोरी थी कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता। उसे जो कुछ भी करना था, कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों की सीमाओं के भीतर ही करना था।

सत्ता पर माओ की पकड़ परफेक्ट थी। माओ ने दिखाया कि वामपंथ सत्ता पर कब्जा करने का बेहतरीन हथियार है। पर शासन चलाना और जनता को सुख-समृद्धि देना वामपंथ के बस में नहीं है, यह लक्ष्य भी नहीं है।

माओ जैसे सक्षम नेतृत्व में भी चीन जैसी विराट जनशक्ति कोई भी सकारात्मक परिणाम नहीं दे सकी। माओ के काल में कुछ मिला तो सिर्फ अंतहीन और अर्थहीन यंत्रणा और त्रासदी। यह वामपंथ का बेस्ट परफॉर्मेंस था… उससे बेहतर परिणाम वामपंथ दे ही नहीं सकता।

वहीं देंग ने किसी भी किस्म की सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से स्वयं को नहीं बाँधा। कम्युनिस्ट विचारधारा से जीवन प्रारंभ करने के बावजूद उन्होंने इसकी विफलता को पहचानने में कोई गलती नहीं की।

उनका अपना चरित्र भी वामपंथ के एक बड़े चरित्र-दोष से अछूता रहा। व्यक्तिगत रूप से माओ के हाथ से असीम यंत्रणा झेल कर भी उन्होंने अपने लोकव्यवहार में कोई कटुता नहीं आने दी। सत्ता में सर्वोपरि होकर भी माओ को चीनी इतिहास से मिटाने और प्रतिशोध लेने की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की।

वहीं वे मृत्युशैया तक सत्ता से चिपके भी नहीं रहे और अपना लक्ष्य पूरा करके स्वेच्छा से सत्ता छोड़ दी, जो एक कम्युनिस्ट के लक्षण नहीं हैं। लेनिन, स्टॅलिन, माओ, कास्त्रो… हर सच्चा कम्युनिस्ट आखिरी साँस तक सत्ता से जोंक की तरह चिपका रहता है।

सच तो यह है चीन की कहानी वामपंथ की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह वामपंथ की विफलता और त्रासदी की ही कहानी है। वामपंथ सिर्फ सत्ता पर कब्जा करने का साधन मात्र हो सकता है, यह कभी कोई अर्थपूर्ण समाधान और सुख-समृद्धि दे ही नहीं सकता।

देंग की नई सोच से थमा, माओ का विषैला वामपंथ

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