नौसेना दिवस विशेष

एडमिरल सरदारीलाल मथरादास नंदा (परम विशिष्ट सेवा मेडल, अतिविशिष्ट सेवा मेडल, पद्म विभूषण) 1970 से 73 तक भारतीय नौसेना के चीफ ऑफ़ स्टाफ थे. उनके नेतृत्त्व में ही भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन ट्रिडेंट के अंतर्गत 4 दिसंबर 1971 की रात पाकिस्तान का कराची पोर्ट तबाह कर दिया था. इस सफलता की स्मृति में भारतीय नौसेना प्रतिवर्ष 4 दिसंबर को नौसेना दिवस मनाती है.

दस वर्ष पूर्व 2007 में दिए एक साक्षात्कार में एडमिरल नंदा कराची पर वार करने की रणनीति बताते हैं. उस जमाने में पाकिस्तान के पास छः इंच की तोपें थीं जबकि हमारे पास केवल चार इंच की. ऐसी परिस्थिति में यदि कराची पर हमला किया जाता तो हमारी मिसाइल बोट हमला करने से पहले ही पाकिस्तान की मारक सीमा में होती।

भारतीय नौसेना के पास ओसा क्लास की रूस निर्मित मिसाइल बोट थी जिसपर स्टायिक्स मिसाइल हुआ करती थीं. किन्तु उनकी क्षमता भी कराची पोर्ट पर हमला कर लौटने की नहीं थी. परन्तु एडमिरल नंदा कराची को भली भांति जानते थे क्योंकि कराची पोर्ट के पास ही मनोरा द्वीप पर उनका बचपन गुजरा था. उन्होंने नौसैनिकों से कहा कि हमारा लक्ष्य कराची पोर्ट पर एक मील की परिधि में स्थित तेल के टैंकर होंगे.

अब मिसाइलों को इस कार्य के लिए परीक्षण से गुजरना था जिसके लिए एडमिरल नंदा ने रूसियों से पूछा कि वे किस वस्तु पर मिसाइल का टेस्ट करते हैं. रूसी नौसेना ने बताया कि वे एक स्थाई मॉडल रखते हैं जिस पर बार-बार परीक्षण करते हैं किन्तु वह डूबता नहीं है. यह एडमिरल नंदा के लिए चुनौती की घड़ी थी क्योंकि ऐसी किसी परीक्षण प्रणाली के निर्माण में ही दो वर्ष लगते.

तब एडमिरल नंदा ने अभ्यास के लिए उपयोग में लाये जाने वाला ब्रिटेन निर्मित एक लक्ष्य चुना और उस पर एल्युमीनियम के गोले रखे गए. उसे तीस मील दूर समुद्र में खींच कर रखा गया. एडमिरल स्वयं हेलीकाप्टर पर सवार हुए और मिसाइल बोट से लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेदा गया. परीक्षण ने नौसेना में उत्साह का संचार किया. दिसम्बर 4, 1971 की रात मिसाइल बोटों को खींच कर आधी दूरी लाया गया फिर कराची पर आक्रमण हुआ. उसके बाद भी कई हमले किये गये थे. कराची पोर्ट सात दिनों तक जला था.

नौसेना से रिटायरमेंट के उपरांत एडमिरल नंदा ने अपने संस्मरण अपनी पुस्तक The man who Bombed Karachi में लिखे हैं. वे बताते हैं कि किस प्रकार फरवरी 26, 1946 को रॉयल इंडियन नेवी में विद्रोह आरंभ हो गया था. सरदार पटेल ने नौसैनिकों को समझाया कि अब वे स्वतंत्र भारत के नौसैनिक हैं तब मामला शांत हुआ.

एडमिरल नंदा अपनी पुस्तक में भारतीय नौसेना का इतिहास बताते हैं कि विभाजन के पश्चात नौसेना का कैसे ‘demobilization’ हुआ और किस प्रकार एक छोटी सी फ़ोर्स का साठ सत्तर हजार नौसैनिकों के एक महत्वपूर्ण बल के रूप में उद्भव और विकास संभव हुआ. नौसेना को आरंभ से ही रक्षा बजट में उल्लेखनीय हिस्सा नहीं दिया जाता रहा है. नौसेना, रक्षा मंत्रालय और रक्षा क्षेत्र में विदेशी सहायता के मध्य किस प्रकार खींचतान होती है इसका सजीव चित्रण एडमिरल नंदा अपनी पुस्तक में निडर होकर करते हैं. सन 62 के युद्ध में मिली हार के पश्चात भारतीय सशस्त्र सेनाओं को अत्याधुनिक बनाने पर विचार किया गया तो अमेरिका से सहायता मांगी गयी. डिफेंस सेक्रेटरी रोबर्ट मैकनामारा से नंदा ने नौसेना को भी उचित महत्व देने की बात कही तो मैकनामारा का उत्तर था कि “आपकी नौसेना तो पूरी तरह ब्रिटिश उपकरण प्रयोग करती है, आप ब्रिटेन से सहायता क्यों नहीं मांगते? नौसेना हमारी प्राथमिकता नहीं.”

युद्धपोत का स्वेदश में निर्माण एक चुनौती थी. हमने ब्रिटेन की सहायता से लीएंडर फ्रिगेट बनाये. भारतीय नौसेना को रूस की सहायता के लिए पहले तो लाल बहादुर शास्त्री जी ने मना कर दिया फिर यशवंत राव चव्हान और नंदा के प्रयासों से हमें लीज़ पर पनडुब्बियाँ मिलने लगीं. नेहरु की मृत्यु के पश्चात जब नंदा मझगांव डॉक्स के एमडी बने तो वहाँ फ्रिगेट बनाने की जगह नहीं थी. बगल में ही महिंद्रा जीप का कारखाना था. नंदा ने वह कारखाना हटवाया. यहाँ बताते चलें कि आरम्भ में पश्चिमी तट पर केवल दो नौसैनिक बन्दरगाह थे. तीसरा नेवल पोर्ट गोवा में नंदा ने रेलवे वालों से चालाकी से जमीन छीन कर बनवाया था अन्यथा वहाँ रेलवे लाइन बिछी होती.

सन 1958 में एक बार नंदा चीन गए थे. वहाँ उन्होंने देखा कि कारखाने में चार्ट लगे हुए थे जिनपर यह लिखा होता था कि अमरीकी और ब्रिटिश मजदूर किसी कार्य को निबटाने में कितने महीने और दिन लेते थे. इस चार्ट से प्रेरित होकर चीनी मजदूर अमरीकी और ब्रिटिश से अधिक तेजी से कार्य करते थे. इसका अर्थ यह हुआ कि सामरिक विश्व शक्ति बनने के लिए रक्षा क्षेत्र में ढेर सारी धनराशि का आवंटन कर देना ही सब कुछ नहीं. आज जहाँ भारतीय थलसेना और वायुसेना विदेशी उपकरणों पर आश्रित हैं वहीँ नौसेना धीरे-धीरे चुपचाप पूर्णतः स्वदेशी और अत्याधुनिक बनती जा रही है.

सन 1971 में मिली विजय के पश्चात जब यूनियन वॉर बुक लिखी जा रही थी तब एडमिरल नंदा ने उसमें उन मछुआरों का नाम भी लिखवाया जिन्होंने पी०एन०एस० गाज़ी पनडुब्बी को डूबते हुए देखा था. इस तरह वे साधारण मछुआरे भी युद्ध में योगदान देने वाले सैनिकों के साथ अमर हो गये. एडमिरल सरदारीलाल मथरादास नंदा के बारे में वाईस एडमिरल मिहिर रॉय ने एक स्थान पर लिखा है कि “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय नौसेना के शिखर पुरुष एडमिरल नंदा को एडमिरल ऑफ़ दि फ्लीट की फाइव स्टार रैंक नहीं दी गयी.”

एडमिरल नंदा ने मई 11, 2009 को देह त्याग दी. हमारे राजनेताओं को युद्ध के नायकों को सम्मान देना आता तो एडमिरल नंदा के कंधों पर भी पाँच सितारे उसी प्रकार जगमगाते और देश में उतना ही सम्मान मिलता जितना फील्ड मार्शल मानेकशा (MC) और मार्शल ऑफ़ दि एयर फ़ोर्स अर्जन सिंह (DFC) को मिला था.

भारतीय नौसेना आज के समय में एक बहुआयामी बल है। बेहद तेज़ MARCOS हमारे विशेष कमांडो बल हैं जो जल, थल और नभ हर परिस्थिति में काम कर सकते हैं। पारंपरिक युद्ध के अलावा निगरानी, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) और तटीय सुरक्षा, अंतराष्ट्रीय मित्रवत राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने से ले कर आज हम Blue Water Navy बनने की ओर अग्रसर हैं। किसी देश की नौसेना की शक्ति का आंकलन करने के लिये अंतराष्ट्रीय शब्दावली में Brown Water Navy और Green Water Navy की संज्ञा दी जाती है जिसका मतलब होता है की उस देश की नौसेना तट से लगभग 300-400 किमी तक प्रभाव रखती है। Blue Water Navy का अर्थ है गहरे समंदर तक प्रभावशाली नौसेना। जैसे शीत युद्ध के समय रुसी पनडुब्बियां महीनों प्रशांत महासागर और अटलांटिक में छुप कर अमरीका को डराये रहती थीं।

हम और मेरा मित्र बचपन में Navy में जाने के सपने देखते थे। उसी ने सिखाया था कि, “देख… Navy में सैल्यूट करते समय हथेली नहीं दिखाते। जहाज़ पे काम करते हुए हाथ गन्दा हो जाता है न इसलिये।” लेकिन मुझे ये नहीं समझ में आया की तब नौसेना में सफेद यूनिफार्म क्यों पहनते हैं। क्या वो गन्दी नहीं होती? खैर, आज से सोलह सत्रह वर्ष पहले ‘आरोहण’ नामक एक सीरियल आता था जिसमें एक लड़की नेवल अकादमी में ट्रेनिंग के लिये जाती है। पल्लवी जोशी और शेफाली छाया ने उसमें बेहतरीन रोल अदा किया था। अब वैसे प्रेरक सीरियल नहीं आते। अच्छी बात ये है कि अब आरोहण के सभी एपिसोड यूट्यूब पर उपलब्ध हैं।

आज नौसेना को विज्ञान तकनीकी में दक्ष युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है। इसका कारण ये है कि नौसेना जल में काम करने वाला बल है जहां आप चल नहीं सकते। उन्नत तकनीक की सहायता से ही समंदर को जीता जा सकता है। वैसे भी विज्ञान और सेना का पुराना सम्बन्ध है। उदाहरण के लिए अमरीका की US Naval Observatory में उन्नीसवीं सदी में Astronomical Unit की खोज हुई थी। वहीं काम करते हुए Michelson-Morley ने प्रकाश की गति बताई थी। क्या आप जानते हैं कि विमान वाहक युद्धपोत दुनिया की कुछ सबसे जटिल मशीनों में से एक हैं! यहां भौतिकी और गणित की अच्छी जानकारी के बिना कुछ भी सम्भव नहीं। जरा सोचिये एक ऐसा तैरता हुआ छोटा सा शहर जिसमें हज़ारों लोग काम करते हों जिसके ऊपर से लड़ाकू विमान उड़ान भरते हों, और उस विशालकाय vessel को निरन्तर ऊर्जा की ज़रूरत हो। अब तो परमाणु ऊर्जा युद्धपोत और पनडुब्बियों की जरूरत बन चुकी है। दुर्घटनाएं विवाद होते हैं, होते रहेंगे लेकिन हमें ही देश की रक्षा का भार उठाना है कोई बाहरी नहीं आयेगा। अपने बच्चों को गणित विज्ञान पढ़ाइये। Naval Architecture और Marine Engineering कोर्स दिलाइये।

बहुत कम लोगों को ये पता होगा कि नौसेना का ध्वज कई बार बदला है। हमारे बचपन में जो नेवी का फ्लैग था उसमें लाल पट्टी के बीच में अशोक स्तंभ नहीं था। सफेद बैकग्राउंड पर लाल पट्टियां दरसअल इंग्लैंड का फ्लैग है। इसीलिए इंडियन नेवी ने इसे बदला था। लाल पट्टियां हटा दी गयीं थीं और नेवी का emblem लगाया गया था जिस पर शं नो वरुणः लिखा होता था। इस झंडे को फिर बदला गया क्योंकि ये दूर के जहाज से दीखता नहीं था। Naval emblem का नीला रंग समुद्र के रंग में खो जाता था। तो फिर से चटख लाल रंग की पट्टियां लगाई गयीं और इंग्लैंड की दासता के प्रतीक को मिटाने के लिए लाल पट्टियों के बीच स्वर्ण अशोक स्तंभ लगाया गया।

नेवी में झंडे का महत्व है। क्योंकि पुराने जमाने में दूर से आते जहाज अपनी पहचान झंडे के माध्यम से ज़ाहिर करते थे। टेलिस्कोप में जहाज का नाम नहीं बल्कि झण्डा दिख जाता था इसलिए आज भी एडमिरल रैंक के अधिकारियों को ‘Flag officer commanding’ FOC कहा जाता है।

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