आज जब छोटी छोटी गिलहरियाँ भी प्रभु के काम में लगी है, तुम लंका में जाकर सो गए!

indian-flag-crowd-politics-making-india

सपूत का मान होता है। ये स्वाभिमान क्या होता है? जिस जाति के ठेकेदार बन कर एक दल विशेष की चौखट पर नाक रगड़ने वाले, जिस के ननिहाल की कोई जात ही नहीं, जो अपना मूत्र पिलाकर चमचों का सम्मोहन करते हैं, उनके सामने अपने पूरे समाज को थाली में परोस कर बोटी बोटी नुचवाने वाले तुम होते कौन हो भई?

तुम्हारे पापा को टिकट नहीं मिली, तो भैया, ऐसे लाडले पापा को राजनीति में लाये ही क्यों?
पापा तुम्हारे ही हैं, बाकी सब बिना पापा के हैं?

तुम अपना खाओ पीओ, दिक्कत नहीं पर जिस जाति की आड़ में अपना व्यक्तिगत स्वार्थ साधने चले हो तब, कहने का हक हमारा भी बनता है, क्योंकि उस जाति का मैं भी हूँ।

जाति के नाम पर रो रहे हो, जाति की भलाई का ढोंग करके, चूंकि वह जाति तुम्हारी अकेले की नहीं, मेरी भी है, उसे उनके सामने पेश कर रहे हो, जिन्होंने इस जाति पर सबसे ज्यादा अत्याचार किये।

हम भूले नहीं है उन जौहर और अमानुषिक कृत्यों को, जब सारे कुटुंब इनकी तलवार से कट गए, एकाध कोई बच गया था तो वह भी या तो ननिहाल में माँ के गर्भ में था या जिसे तुम दलित पिछड़ा कहते हो उसकी कुटिया में।

उम्र भर हमारी जाति के कोटे से मलाई खाई, माल कूटा, अपना नाम यश कमाया, आज उसी पार्टी को पिछवाड़ा दिखा, दूसरे खूंटे बंधने जा रहे हो, पूछा था हमसे?

जो इतना कृतघ्न है वह कल को अपने घर से डोला भी भेज सकता है उनके हरम में। वहाँ का रिवाज ही हरम है।
इसे तुम स्वाभिमान कहते हो?
दुनिया थू थू करेगी हम पर।
हमारी बेइज्जती तुम जैसे लोटे करते हैं!!
तुम महलों से उतरते नहीं, सुनना हमें पड़ता है।
जिन लोगों ने भी अपना जमीर बेचा है, पहले जाकर उनके घर देख लो।
कोठड़ियाँ श्मशान हो गई।
हवेलियों में भूत नाचते हैं।
खेतों में गधे लोटते हैं।

अपने ईष्ट, आराध्य और सनातन परंपरा का ध्यान धरो। ये जो चारों तरफ सफेद टोपियां दिखती हैं, इनके पूर्वज भी कभी ऐसे ही झूठी मृगतृष्णा में फंसकर भटक गए थे। आज इतने दूर चले गए हैं कि आवाज देकर बुलाने पर भी सुन नहीं सकते। देख नहीं सकते।

तुम्हें कोई तकलीफ हुई है, पी लेते। दुख हुआ सहन कर लेते। किसी अपने ने ही अपमान किया है, कहीं एकांत में चार आंसू बहा लेते, क्या जरूरत थी कुलद्रोही, जातिद्रोही, धर्मद्रोही बनने की?
दुनिया में तकलीफ किसे नहीं हुई?

मगर, इतना समझ लो… त्याग करने वालों के देवरे पूजे जाते हैं। धर्म पर मरने वालों के थान थापे जाते हैं। तकलीफ सहन करके भी सनातन का संरक्षण करने वालों के गीत गाये जाते हैं।
लोक में कोई जगह खाली नहीं रहती।

तुम गये, तो भी जगह भर जाएगी। तुम नहीं होंगे, कोई दूसरा आ जाएगा। पर दुनिया जरूर पूछेगी, “आखिर तुम चले क्यों गये?”

आज जब छोटी छोटी गिलहरियाँ भी प्रभु के काम में लगी है, तुम लंका में जाकर सो गए!! आज जब मातृमंदिर की भग्न प्रतिमा का जीर्णोद्धार हो रहा है, जरूरत छैनी की थी, तुम दुश्मनों को हथौड़ा पकड़ा गए?

मैंने भूतकाल से सीखा है। धर्मद्रोहियों की दुर्गति देखी है। उन्हें ईश्वर ने धर्मध्वंसकों से भी बड़ी सजा दी। सुनकर रूह कांप जाती है। सबको दिख रहा है, तुझे क्यों नहीं दिख रहा? तुम्हारे घर मे भी बच्चे होंगे। परिजन होंगे। ईश्वर उनका कल्याण करे, यही मेरी संस्कृति मुझे सिखाती है।

कल भी सूरज निकलेगा। कल भी शहनाइयां बजेंगी। पर तुम नहीं होंगे। तुम्हारे जैसा वैभव विलास और तौर तरीका तो न होगा, पर अपने कांपते जीर्ण हाथों से माँ की पवित्र चुनरी को सिलने की कोशिश मैं जरुर करूंगा।

जो बन सका वह करूंगा।

नैतिक जानवरों के साथ पशुवत व्यवहार के लिए वोटर की महज एक उंगली काफी है

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY