क्या कहते हो राजस्थान?

चुनाव आयोग से कार्यक्रम घोषित होने के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी राजस्थान आए और कहा –

“कांग्रेस महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा देती है और टिकट वितरण में उनका पूरा ध्यान रखेगी। उन्हें उचित संख्या में टिकट मिलेंगे। हम पैराशूटर्स को टिकट नहीं देंगे। मैं कैंची से उनकी रस्सी काट दूंगा।”

टिकट वितरण हुआ, तो सब कुछ उलटा-पुलटा था। महिलाएं पहले की तरह ही ग़ायब थीं और सारे पैराशूटर्स हाथों में टिकट लहराते हुए मुदित थे। इससे पार्टी में भारी हंगामा शुरू हो गया; ऐसा कि अब भी चल रहा है।

टिकट वितरण के बाद दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन जयपुर आए और पिंकसिटी प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्रांतिकारी विचार सरिता प्रवाहित की।

एक पत्रकार ने पूछा – राहुल जी ने कहा था कि पैराशूटर्स को टिकट नहीं दिया जाएगा। फिर यह क्या हुआ? कहां गई वह कैंची?

उनका उत्तर था – वे राहुल जी के निजी विचार हैं।

मेरा मन-मयूर तत्क्षण नृत्यरत हो गया। अब तक हम सुनते आए थे कि आलाकमान ने किसी नेता के बयान को निजी विचार बताया, लेकिन यहां तो … । अहा, कितनी लोकतांत्रिक पार्टी है यह, जिसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष निजी विचार अभिव्यक्त करता है और मीडिया को यह अपूर्व जानकारी बिना किसी भय के एक छोटे से अर्द्ध प्रदेश की इकाई का अध्यक्ष तक दे सकता है।

मीडिया ने जनता को यह बात बताई, तो वह हंस-हंस कर दोहरी हो गई।

हाल ही कांग्रेसी राजनीति में राजीव-सोनिया युग के महा पुरोधा अहमद पटेल जयपुर आए। उन्होंने श्रीमुख से उचारा – मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जनता में नाराज़गी तो है ही, लेकिन उससे अधिक आक्रोश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है।

मेरे मन में आया, पूछूं – आप अब तक अपने मूल प्रदेश गुजरात को नहीं समझ पाए, सारे देश को समझ लेने का दावा इतनी सहजता से कैसे कर लेते हैं?

अगर पीएम नरेंद्र मोदी की बांसवाड़ा में हुई सभा में उमड़ी भीड़ पर एक नज़र डाल ली होती, तो अनुमान खरा होता। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि नेता वही है, जिसके मन में कुछ और हो और जुबां पे कुछ और। लेकिन घाघ नेता वह, जो यह खरा आकलन कर सके कि मैं जो कुछ जुबां पर लाने जा रहा हूं, वह मेरे हित से ज्यादा जनता के गले उतरने वाला तो है न! और पटेल साहब इसी में विफल रहे।

ध्यान दें उस भीड़ पर, जो पीएम की सभा में आई थी या अन्य सभाओं में उमड़ रही है। इन चेहरों को गौर से देखें। इनके पहनावे पर भरपूर दृष्टि डालें। यह समाज का वह तबका है, जो ग़रीब है। जिसे अब तक लुभाने के लिए दलित-वंचित कहा गया। बहुत सारे नारे उसे दिए गए। तरह-तरह के दावों से लाद दिया गया। लेकिन उसके लिए किया कुछ नहीं गया। पीएम की उज्जवला, आयुष्मान, आवास योजना, शौचालय, बिजली, पानी, सड़क, मुद्रा योजना, पेंशन आदि योजनाओं से इसके जीवन में वह सुधार हुआ है, जो पहले कभी नहीं था।

यह बदलाव की वह बयार है, जिसका प्रवाह 2014 में शुरू हुआ था और अब वह पूरे जोर से बहने लगी है। अर्थात एक बड़ी संख्या में भाजपा और कांग्रेस का वोट परस्पर शिफ्ट हुआ है।

जो भाजपा कभी सवर्णों अथवा कहें कि ब्राह्मण-बनियों की पार्टी कही जाती थी, अब नहीं रही है। अब वह केवल शहरी पार्टी भी नहीं है। उसका विस्तार तेज़ी से कस्बों से होते हुए गांव-ढाणी तक हुआ है और कई ऐसे वर्गों को अपनी तरफ खींचा है, जो अब तक कांग्रेस का पारम्परिक वोट बैंक रहा था।

निश्चय ही इस बीच उसके हाथ से उसके एक-दो कट्टर समर्थक रहे वर्ग खिसक कर कांग्रेस के पाले में गए भी हैं, लेकिन यह हानि मेरे हिसाब से बहुत कम है। इस तरह अब बीजेपी पहले की कांग्रेस की स्थिति पा चुकी है और कांग्रेस पहले की बीजेपी की।

मेरा शुरू से विचार रहा है कि जनता थोड़े से तानाशाह शासक को पसंद करती है और वसुंधरा राजे का यह कार्यकाल इस मायने में खरा उतरता है कि उन्होंने आलाकमान से सीधी टक्कर ली और अपनी बातें मनवाई। आपसी संवाद में न जाने कितने लोगों ने मुझ से कहा – कुछ भी हो, रानी है तो दमदार। किसी के सामने झुकती नहीं है। यह उनके हक़ में जा रहा था।

आपने देखा होगा कि अशोक गहलोत समेत कांग्रेस के अनेक नेताओं ने वसुंधरा राजे पर हाल ही हमले शुरू किए थे – ‘वसुंधरा जी उम्र में अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के बराबर हैं, लेकिन उनके सामने झुकती हैं।’

अहमद पटेल आए और इस अभियान पर पानी फेर गए। उन्होंने जनता में स्थापित धारणा के पक्ष में मत दे दिया। साथ ही, जनता ने न तो इस झुकने का बुरा माना, न प्रिंसेस दिया कुमारी के केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह के चरणस्पर्श का। जनता की प्रतिक्रिया है – ‘यही भारतीय संस्कृति है।’

जो मित्र काफी पुराने हैं और मुझे नियमित पढ़ते रहे हैं, उन्हें स्मरण होगा कि वसुंधरा सरकार का ढाई साल पूर्ण होने पर कहा था कि राज्य के अगले चुनाव में बीजेपी की हालत उससे भी बुरी होगी, जो पिछले चुनाव में कांग्रेस की हुई थी।

इसके पीछे बहुत सारे कारण थे, लेकिन मुख्य तौर पर धारणा थी कि वसुंधरा सरकार ने कुछ नहीं किया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने वाकई कुछ भी नहीं किया, वास्तव में वह अपने किए कार्यों की सूचना भी जनता तक पहुंचाने में बुरी तरह विफल रही।

इस अवधारणा के पीछे भी मीडिया है और वह क्यों नाराज़ है, यह मैं अलग से लिखूंगा। लेकिन जैसे-जैसे समय गुज़रा स्थिति बदलती गई। वसुंधरा सरकार के कामकाज में केंद्र की योजनाएं जुड़ीं और उनसे जनता जुड़ती चली गई।

पीएम की अजमेर में हुई सभा तक माहौल बहुत बदल गया था। मैंने भी अपने पूर्व आकलन से पचास प्रतिशत नकारात्मक पॉइंट कम करते हुए कहा कि अब बीजेपी की उतनी बुरी हालत तो नहीं होगी, लेकिन कांग्रेस की सरकार आ रही है।

यह तब की बात है जब, अंदरूनी सूचनाओं के अनुसार, राजस्थान का भाजपाई थिंक टैंक तक यह मान रहा था कि उनकी सीटें साठ आ रही हैं और कांग्रेस सौ से ऊपर जा रही है। हां, कार्यकर्ता तब भी नब्बे सीटों की आस में थे।

अब परिदृश्य यह है कि कांग्रेस अपनी सरकार आना मान कर लहालोट दिखती है, लेकिन उसके नेताओं के क्रियाकलाप इसकी तसदीक़ नहीं करते। एक फिल्मी डायलॉग है – इतना सन्नाटा क्यों है, भाई। इसी तर्ज़ पर पूछा जा सकता है – अगर आप जीत रहे हैं, तो बयानों में इतनी बौखलाहट क्यों है, भाई।

सट्टा बाज़ार कांग्रेस की सरकार बना रहा है।

भाजपाई भी अब तक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। और किसी भी पार्टी का यही रुख उपयुक्त भी होता है। इससे कार्यकर्ता अंतिम क्षण तक जुटे रहते हैं।

सबसे अलग मेरा मानना यह है कि ये सभी आंकलन राजस्थान की लगभग दो-ढाई दशकीय उस परम्परा से प्रेरित हैं, जिसके अनुसार यहां हर बार सत्ता परिवर्तन होता है और यह सब शहरी मतदाता आधारित आंकलन हैं।

मेरा अब भी अनुमान है कि टक्कर बराबरी की है। अंतिम पलों में जो जितने ढुलमुल वोट अपने पाले में खींच लेगा, सत्ता उसी की होगी। इस खेल में कैडर आधारित भाजपा अब तक हमेशा बाज़ी जीतती आई है और इस बार भी वही बाज़ी जीतेगी, यह मेरा मानना है।

फिर भी कहूंगा, राजस्थान इस बार अपनी परम्परा बदलता दिख रहा है।

नीच पॉलिटिक्स

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