वत्स, जड़मति करते हैं बिना परखे विवाद

भाजपा के स्टार प्रचारक और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान को लेकर घमासान मचा है। जिसे देखो, अपना मुंह फाड़ कर चिंघाड़ रहा है। कोई आर्तनाद कर रहा है, तो कोई स्पष्टीकरण में तरह-तरह के तर्क प्रस्तुत कर रहा है कि हनुमान जी तो यह हैं, वह हैं।

ब्राह्मणों के किसी मसले पर मुंह नहीं खोलने वाले राजस्थान के एक ‘ब्राह्मण संगठन’ ने योगी जी को कानूनी नोटिस भेज दिया है – आपने बजरंगबली का अपमान किया है? फ़ौरन माफी मांगो, वरना कानूनी कार्यवाही की जाएगी।

मैं पूछना चाहता हूं – आप कौन? मैं तो आपका सदस्य नहीं। मेरे अनेकानेक ब्राह्मण मित्र आपके सदस्य नहीं। फिर आप कैसे ब्राह्मण संगठन? आपका अध्यक्ष हर बार एक दल विशेष के टिकट के लिए उसकी चौखट पर नाक रगड़ता है, फिर भी नंबर नहीं आता, तो औकात क्या है? लेकिन छोड़िए, आगे बढ़ते हैं।

विदूषकीय वाणी कौशल के पुरोधा चचा आज़म खान की मौज हो गई। उन्हें लगा – अहा, हलाल के लिए बकरी दिख गई। बोले – ‘यही हाल रहा, तो बीजेपी वाले अगले साल तक रावण को मुसलमान घोषित कर देंगे।’

सोचिए तो, चचा किस कदर भ्रम में हैं। अब भी उन्हें घोषित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। किसी को पता हो, तो ज़रा बताए कि चचा आज़म के समधी के खिलाफ उसकी बड़ी बहू द्वारा दर्ज़ कराई गई बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्य (सरल शब्दों में गुदा मैथुन) की एफआईआर की वर्तमान स्थिति क्या है?

ताक में कैसे-कैसे गिद्ध हैं, यह भी देखिए। मुरादाबाद जिले में एक एडवोकेट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में परिवाद दायर किया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सीएम ने भगवान हनुमान को दलित बता कर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाया है। कोर्ट ने अर्जी मंजूर करते हुए दस दिसंबर की तारीख सुनवाई के लिए मुकर्रर की है। अब सोचिए कि यह वकील और कोर्ट क्या हैं? एक मूढ़ ने अपील उस पर दायर की, जो कहा ही नहीं गया और कोर्ट तो है ही हिन्दू के खिलाफ आधी रात खुलने के लिए।

ग़ज़ब यह भी है कि इसके बाद एसटी आयोग ने अपना यह दावा ठोक दिया है कि बजरंगबली दलित नहीं, जनजाति के थे।

अखबारों में बड़ी-बड़ी ख़बरें हैं और उनमें योगी जी की निंदा करने वाले धर्माचार्यों के बयान बॉक्स बना कर छापे गए हैं। सबसे ज्यादा पीड़ित ये पीठाधीश्वर ही करते हैं। सेक्यूलर सिद्ध होने को ये तथाकथित स्वयंभू पीठाधीश्वर इस कदर आकुल रहते हैं कि अपने माथे पर जतन से लगाए गए त्रिपुंड तक को भूल जाते हैं।

जयपुर के एक गणेश मंदिर के पुजारी जी को एक वीडियो में बल्लियों उछलते देख कर हैरानी हुई। सोचा, कहूं – वत्स ! तुम दुकानदार हो। तुम कब से धर्म के ठेकेदार हो गए। मैं जानता हूं कि तुम हर वर्ष पौष बड़ा उत्सव के नाम पर बरसों से मंदिर के पिछवाड़े पत्रकारों का जीमण करते हो और उसके बाद उन्हें महंगी-महंगी गिफ्ट भी देते हो। इसकी बदौलत तुम्हारी खबरें बड़ी-बड़ी छपती हैं। और यही तुम्हारी तथा तुम्हारे मंदिर की लोकप्रियता का रहस्य है।

तुम भूल गए हो कि एक बार तुमने मुझे अपने दरबार में आमंत्रित करने की भारी भूल कर दी थी। मैं नहीं आया, लेकिन तुम्हारी सारी कुंडली मेरे पास आ गई। कुछ और उगलवाने से बचो। पतली गली से निकलो। और ध्यान रखो, अगली बार बिना सोचे-समझे मुंह खोला, तो मैं तुम्हारी धोती तक खोल दूंगा।

धर्माचार्य का कर्तव्य क्या है?

समाज को सत्य बताना। उसे सही दिशा देना।

आप क्या कर रहे हैं?

मुद्दे को समझे बिना, उसके सत्य को जांचे-परखे बिना किसी के भी उकसावे पर मूर्खतापूर्ण बयान दे रहे हैं।

तात्पर्य यह कि सारा विमर्श, सारी बहस उस पर हो रही है, जो योगी जी ने कहा ही नहीं।

इस विषय पर मुंह खोलने से पहले एक बार योगी जी के उस भाषण का वीडियो सुन लें। यूट्यूब पर उपलब्ध है।

उसमें योगी जी कह रहे हैं – बजरंगबली हमारी भारतीय परम्परा में ऐसे लोकदेवता हैं, जो स्वयं वनवासी हैं। गिरिवासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं, उन सबको लेकर के, सभी भारतीय समुदाय को उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक सबको जोड़ने का काम बजरंगबली करते हैं।

वैसे तो मैं रुद्रावतार को वंचित-दलित तबके का प्रतिनिधि घोषित करने में भी कोई झिझक महसूस नहीं करता; इसलिए कि आपके भोलेनाथ को अनेकानेक वामी किताबें आदिवासी, कबीलों का सरदार तथा लोकदेव घोषित करती आई हैं और आप सदा की भांति सोते रहे हैं।

आपकी दुर्गा और काली को कैसी-कैसी गलीज़ उपमाएं दी गई हैं और आपका रक्त शीतकाल की मानिंद रजाई में दुबका रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में राम का चरित्र क्या पढ़ाया जा रहा था और जेएनयू में कैसे-कैसे शोध होते रहे हैं, बल्कि हो रहे हैं। लघु पत्रिकाओं में आपके देवी-देवताओं पर क्या-क्या छप रहा है, आपको कोई ज्ञान नहीं है। इसलिए ज्यादा उबलो मत, तनिक विवेक से काम लो।

फिर भी तनिक सोचें, इस भाषण में ग़लत क्या है? योगी जी को ऎसी उपमाएं हनुमान जी को देने का दोषी ठहराया जा रहा है, जो उन्होंने उन्हें दी ही नहीं, बल्कि उन्हें ऐसे समस्त समाज के मध्य का सेतु बताया। लेकिन टुकड़ों पर पलने वाले दलाल कॉमा-फुलस्टॉप हटा कर वक्तव्य को ले उड़े और उसे विवादित घोषित कर दिया।

गौर करें। भाषण में आदमी बताता नहीं कि यहां कॉमा है, यहां फुलस्टॉप है, यहां प्रश्नवाचक है और यहां विस्मयादिबोधक है। वह बस, ध्वनि के उतार-चढ़ाव और ठहराव से समझा जा सकता है। यह श्रोता को स्वविवेक से निर्धारित करना होता है। और यह ईमानदारी से निर्धारित वही कर सकता है, जो सत्यनिष्ठ हो। जिसकी दृष्टि पहले से बाधित है, जिसका पक्ष पहले से तय है, उससे आप अगर न्याय की आशा करते हैं, तो निहायत बुद्धिहीन हैं और अगर उसका निर्णय सरमाथे रखते हैं, तो यह आपके बुद्धिहीनों में सर्वश्रेष्ठ होने का सुसमाचार ही है।

तो भक्तों। जड़मति, महामूर्ख; किंतु स्व स्वार्थ के लिए कोई भी शिखर क्षण भर में पार कर लेने वाले इस वर्ग का शातिरपन समझें और उसके जाल में निरीह मछलियों की तरह फंसना बंद करें। तर्क करें। उत्तर दें। इनका आवश्यकता से बड़ा मुंह बंद करें।

शुभ हो।

नीच पॉलिटिक्स

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