नीच पॉलिटिक्स

मैं इस सब्जेक्ट को हाथ में लेने से बचता रहा हूं। इसलिए नहीं कि मैं डरता हूं, बल्कि इसलिए कि इस मुद्दे पर लिखना मुझे आत्मप्रशंसा सा लगता रहा है। लेकिन भाईलोग मानते नहीं। मुझे छेड़ते रहते हैं।

मित्रों की टाइमलाइन पर, इधर-उधर कई लोगों से मेरी बहस कई बार हुई है और प्रतिपक्षी हर बार मुंह की खाकर भागा है। अपशब्दों पर उतर कर या तो अनफ्रेंड कर गया या ब्लॉक, लेकिन अपना अस्तित्व मेरे लिए मिटा गया।

सबसे ताज़ा मामला मेरे अग्रज पत्रकार एल.एन. शीतल जी की वाल का है। उनके एक स्टेटस पर एक सेवानिवृत आईएएस अफसर की टिप्पणी थी –

‘आज मोदी ने बहस का स्तर कितना निम्न कर दिया है। देश का दुर्भाग्य। आज अटल जी की आत्मा रो रही होगी। आप मानें या न मानें, मोदी के आने के बाद भाषा की सभी मर्यादाएं खत्म हो गईं। यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।’

मैंने उन्हें संक्षिप्त उत्तर दिया – ‘आपकी बात सही है। मोदी नहीं होता, तो पिछले सोलह साल से ज़हर की खेती, खून का सौदागर, बोटी-बोटी कर देंगे, हत्यारा, पिशाच, बुचर ऑफ़ गुजरात, प्रशांत सागर में फेंक दो, ज़ालिम, भस्मासुर, रावण, नपुंसक, नीच आदमी, कुएं का मेंढक, सांप, बिच्छू, मच्छर, फेंकू कहते हुए कुछ नेताओं को अपनी ज़ुबान खराब क्यों करनी पड़ती? सारी ग़लती इस मोदी की ही है।’

बतौर सबूत, नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र समूह की वेबसाइट की एक रिपोर्ट भी संलग्न कर दी, जो बता रही थी कि मोदी पर हमलों की शुरुआत कब, कैसे और कहां हुई और उन्होंने जवाब देना कब शुरू किया।

वे पलट कर नहीं आए। सोचिए, एक आईएएस अधिकारी समाज की क्रीम माना जाता है। उसका विज़न, इतिहासबोध और व्यतीत का ज्ञान क्या ऐसा होना चाहिए? ज़ाहिर है कि ये चपरासी मार्का अफसर रहे होंगे।

ऐसे ही अफसरों के कारण मैं कई बार कहता रहा हूं कि भारत एक बहुत बड़ी धनराशि कई मूर्खताओं में खर्च कर रहा है, जिसके बिना भी काम आराम से चल सकता है, बल्कि अच्छा चल सकता है। ये हैं – राज्यपाल, आईएएस और आईपीएस।

सोचिए, बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, बड़ी-बड़ी रिहाइशी इमारतों में आवास और सेवकों की बड़ी सी फ़ौज जैसी सुविधाएं हासिल इस वर्ग का समाज को योगदान क्या है? मध्य प्रदेश का आईएएस दंपति जोशी याद है। इनमें से ज्यादातर ऐसे ही हैं, जो सत्ता की चम्पी करते और उसके बल पर धन बनाते हैं। जनता से इन्हें कोई मतलब नहीं होता। मेरा मानना है कि प्रमोटी अफसर इनसे बेहतर सिद्ध होंगे।

खैर, यह एक अलग मुद्दा है। कभी इस पर भी विस्तृत लिखूंगा, फिलहाल मुद्दे पर आएं। कांग्रेस, नरेंद्र मोदी पर 2002 के बाद से निरंतर निम्न स्तरीय हमले करती-कराती रही है। उसकी शह पर उसके तमाम सहयोगी भी उससे पीछे हरगिज़ नहीं रहे हैं। ममता बनर्जी, मुलायम सिंह, मायावती आदि की पार्टियों के नेताओं के बयान याद करें।

यह भी याद करें कि मोदी ने इन्हें जवाब देना कब शुरू किया। 2013 में बीजेपी की तरफ से पीएम प्रत्याशी घोषित होने के बाद के चुनाव प्रचार के दौरान। इससे पहले का ऐसा एक उदाहरण आपको कहीं नहीं मिलेगा, जिसमें मोदी ने किसी विपक्षी नेता पर कोई इस तरह का हमला किया हो। इससे पहले बरसों तक वे लगातार खामोश रहे। सब कुछ सहते रहे। बीच में इशारा भी किया – ‘लोग मेरे ऊपर पत्थर उछालते हैं, मैं उनसे सीढ़ी बना लेता हूं।’ लेकिन ‘बोटी-बोटी’ ब्रिगेड को कभी समझ नहीं आया।

ग़ज़ब की बात यह भी है कि तमाम विपक्ष इतना मूढ़ सिद्ध होता है कि मोदी से मुंहतोड़ जवाब पाने के बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आता। ज़हर की खेती, खून की दलाली आदि का क्या हश्र हुआ, यह सभी को स्मरण होगा, इसलिए एक अपेक्षाकृत कम चर्चित हुआ किस्सा स्मरण कराता हूं –

उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव के दौरान की घटना है। तत्कालीन मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कटाक्ष करते हुए कहा – ‘महानायक गुजराती गधों का विज्ञापन कर रहे हैं।’

दरअसल गुजरात के कच्छ में विलुप्त होने के कगार पर पहुंचे जंगली गधों की एक प्रजाति है, जिसे देखने के लिए दुनिया भर के पर्यटक आते हैं और अमिताभ बच्चन गुजरात टूरिज़्म के ब्रांड एंबेस्डर हैं। अखिलेश ने उस विज्ञापन की बात करते हुए निशाना कहीं और साधा, जिसे मोदी फौरन समझ गए।

मोदी ने अपनी अगली चुनावी जनसभा में अखिलेश के व्यंग्य का जवाब इस तरह दिया – ‘आप गधे से भी घबराते हैं, अखिलेश जी ! वह बेचारा तो बहुत दूर है। अगर मन साफ हो, तो प्रेरणा गधे से भी ली जा सकती है। गधा वफादार होता है और थके होने पर मालिक के काम को कभी न नहीं करता। मैं सवा सौ करोड़ भारतीयों को अपना मालिक मानता हूं।’

मेरा मानना है कि इससे सबक लेकर विपक्ष को मोदी का लोहा मान लेना चाहिए था और मुंह पर कम अज़ कम इस सन्दर्भ में ताला लगा लेना चाहिए था। लेकिन जो मूर्खता नहीं करे, वह मोदी का विपक्ष क्या? ये लगातार चालू रहे। अब तक चालू हैं।

कांग्रेस के अनुपम साथी ‘सीपीएम’ महासचिव सीताराम येचुरी को लें। वे ‘पीएम’ का अर्थ ‘पाकेटमार’ बता रहे हैं। मैं अब तक इन्हें पढ़ा-लिखा, सुलझा हुआ और शिष्ट राजनेता कहता-लिखता आया हूं।

कई बार मैंने सोचा कि उन्हें एक पत्र लिखूं – अगर वामपंथी दलों को भारत में अपना उत्थान करना है, तो चाहिए कि वे सोशल मीडिया पर विचरण करने वाले उन छद्म वामियों से अपना कोई संबंध नहीं होने की बाक़ायदा घोषणा करें, जो मोदी के अंधविरोध में पागलपन की हद तक पहुंच गए हैं और तमाम मनगढंत, असत्य, तथ्यहीन और ऊंट-पटांग लिखते रहते हैं। इससे वाम-पक्ष को जितनी हानि हुई है, उतनी किसी और से नहीं हुई।

अच्छा हुआ कि नहीं लिखा, क्योंकि हमाम में झांकने तक की आवश्यकता नहीं पड़ी, ये तो स्वयं ही नग्नावस्था में बाहर आ गए। लेकिन येचुरी की हरकत कांग्रेसियों से भी गिरी हुई है। इसलिए कि उन्होंने मोदी पर नहीं, पीएम पद पर ओछा हमला किया है। संवैधानिक संस्थाओं और पदों की एक गरिमा, मर्यादा तथा प्रतिष्ठा होती है, सभी को इन्हें बनाए रखना चाहिए। हो सकता है, कभी इस पद को आप भी शोभायमान करें, तब आपका वक्तव्य पलट कर क्या आपको मुंह नहीं चिढ़ाएगा।

और कुछ नहीं, यह प्रकरण सिद्ध करता है कि हमारे बुजुर्ग जो कुछ कह गए हैं, वह ऐसे ही नहीं है। उन्होंने गहन अनुभव के आधार पर ही कहा था – संगत का असर होता ही है। येचुरी वर्तमान में इसके सटीक उदाहरण हैं।

एक अद्भुत चीज़ यह भी है कि हरकतें ये स्वयं करते हैं और उसका दोषारोपण मोदी पर करते हैं। उदाहरणार्थ –

कांग्रेस के नेता राज बब्बर मोदी की मां तक पहुंचे।

उसके ही विलास राव मुत्तेमवार पिता तक पहुंच गए।

उसके ही सी पी जोशी जाति तलाशने लगे।

जब एक जनसभा में मोदी ने उत्तर दिया, तो अध्यक्ष जी रोने लगे – इनके पास मां है, हमारे पास मुद्दे हैं।

और तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ ने बिना सोचे-विचारे इसे अपने प्रकाशनों में बैनर बना दिया।

किंतु कांग्रेसियों का यह स्वभाव नया नहीं है। वे आदत से लाचार हैं। उनके निशाने पर मोदी ही पहली बार नहीं हैं। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी ऎसी ही एक हरकत कर मुंह की खा चुकी हैं।

सोनिया गांधी राजनीति में नई-नई दाखिल हुई थीं। अपनी पहली रैली में उन्होंने स्व. राजीव गांधी की शहादत और अपने महिला होने पर बहुत कुछ कहा और अटल जी की तुलना विधवा से कर दी।

अटल जी ने इसका जवाब यह दिया – वे कहती हैं, मैं एक महिला हूं और विधवा हूं। अब मैं क्या कहूं कि मैं एक पुरुष हूं और कुंवारा हूं।

स्पष्ट है कि कांग्रेसी परम्परा यही है और वे कभी सुधरने वाले नहीं हैं।

सुषमा स्वराज की घोषणा के निहितार्थ

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