विषैला वामपंथ : कल्चरल रेवोल्यूशन – 2

माओ ने ग्रेट लीप फॉरवर्ड की त्रासदी पर पार्टी के अंदर विरोध को सूँघना शुरू किया। रक्षा मंत्री जिसने मुँह खोलने की जुर्रत की थी, उसे कुचल दिया गया।

पर पार्टी के अंदर का माहौल माओ की पसंद का नहीं था। कंम्यूनिज़्म पूरी तरह से वैचारिक सरेंडर माँगता है। बिल्कुल इस्लाम के ‘सबमिशन’ की तरह।

आगे माओ को विरोध तो नहीं मिला लेकिन वैसा वैचारिक सबमिशन भी नहीं मिला जिसकी उसे अपेक्षा थी। लोगों के मन के अंदर की बात निकालने के लिए माओ ने कुछ वैसी ही तरकीब निकाली जैसा वह एक बार पहले भी कर चुका था।

1956 में चीन में ‘हंड्रेड फ्लावर्स कैंपेन’ चलाया गया था। माओ ने कहा कि जैसे बगीचे में सैकड़ों फूल खिलते हैं, वैसे ही चीन में सैकड़ों विचार सामने आने चाहिए। उसने लोगों को सामने आने और कम्युनिस्ट पार्टी की आलोचना करने का आह्वान किया जिससे कि पार्टी अपने आप में सुधार कर सके।

लोगों ने इसे चीन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णिम अवसर समझा और खुल कर पार्टी की आलोचना करने लगे। इंटेलेक्चुअल, विद्वान, लेखक… सभी ने बढ़ चढ़ कर पार्टी की ‘सकारात्मक आलोचना’ का अपना कर्तव्य पूरा किया। यह आज़ादी कुछ महीने चली।

पर यह एक ट्रैप था। माओ ने ढूंढ निकाला कि किन लोगों के अंदर कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव नहीं था। उसके बाद उन सारे लोगों को प्रतिक्रिया वादी, क्रांतिविरोधी और दक्षिणपंथी घोषित कर दिया गया और खोज खोज कर कुचल दिया गया।

खैर, वह 1956 था। अभी, 1962 में ग्रेट लीप की आलोचना के संदर्भ में भी माओ ने वही आजमाया हुआ तरीका फिर से अपनाया। उसने खुद अपनी आलोचना की और इसमें होने वाली गलतियों का ज़िक्र किया। उसने यह भी आह्वान किया कि लोग मिंग राजा के साहसी और ईमानदार मंत्री हाई-रुए की तरह सामने आकर साहस के साथ आलोचना करें।

पर लोग इस बार इस ट्रैप में नहीं पड़े। सभी रक्षा मंत्री पेंग दे-व्हाई का हाल देख चुके थे। सिर्फ बीजिंग के वाइस मेयर वू-हान इस ट्रैप में फंसे। उसने भी खुल कर विरोध या आलोचना करने के बदले हाई-रुए के जीवन पर एक नाटक लिख दिया, जिसकी रक्षामंत्री पेंग दे-व्हाई से समानता स्पष्ट थी।

माओ इस नाटक से नाराज़ हुआ पर उसका मकसद पूरा नहीं हुआ। उसे एक व्यक्ति को नहीं, अपने विरुद्ध विद्रोह की हर संभावना को कुचलना था। वह चीन में पल रही रिविज़निस्ट प्रवृतियों से नाराज़ था और क्रांतिकारी विचारों को कमज़ोर किये जाने से चिंतित था।

पर वह मूल रूप से चिंतित था कि किस तरह कम्युनिस्ट रूस में पहले ख्रुश्चेव ने स्टालिन को अपमानित किया और फिर ब्रेज़्नेव ने ख्रुश्चेव के प्रति विद्रोह करके उसे हटा दिया। वह लोगों के मन में पल रहे विद्रोह या विरोध की किसी भी संभावना से चिंतित था।

उसने इस हाई-रुए वाले नाटक को मुद्दा बनाया। पार्टी का बॉस और कम्युनिस्ट पार्टी का हैवीवेट पेंग चान उस नाटक के लेखक वू हान का करीबी था। उसकी अध्यक्षता में उसने एक कमिटी बनाई और उस नाटक पर रिपोर्ट माँगी। पेंग चान ने माओ के मनमुताबिक रिपोर्ट नहीं दी, और नाटक को एक एकेडमिक एक्सरसाइज़ कह कर टाल दिया।

माओ के लिए इतनी असहमति काफी थी। उसकी आज्ञा ही नहीं, इसकी इच्छा को भी पूर्ण समर्पण चाहिए था।

इस नाटक के बहाने से माओ ने उन लोगों की पहचान की जो पार्टी के अंदर माओ के प्रति पूर्ण समर्पित नहीं थे। उन्हें भी आने वाले तूफान की आहट मिलने लगी थी। पार्टी के अंदर ही वे सारे लोग एक दूसरे का साथ छोड़ने लगे।

कुछ महीने बाद जब माओ ने पूरी ताकत से कल्चरल रेवोल्यूशन का तूफान खड़ा किया तो उसमें ये सारे लोग बह गए। आने वाले कुछ वर्षों में माओ ने अपनी शक्ति के प्रदर्शन के लिए चीन के नेताओं की पूरी पीढ़ी को, जिन्होंने चीन की स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा था, अपमानित और प्रताड़ित किया, जेल में डलवा दिया या मरवा दिया। वहीं अगली पूरी पीढ़ी को पाशविकता और अमानवीय क्रूरता की ओर धकेल दिया।

क्रमशः..

विषैला वामपंथ : कल्चरल रेवोल्यूशन – 1

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