गौरैया को दुश्मन घोषित करता और टिड्डियों को पालता है विषैला वामपंथ

वामपंथ के पक्ष में जो सबसे बड़ा तर्क आता है वह है कम्युनिस्ट चीन की आर्थिक सफलता।

पर चीन की सफलता में कितना योगदान कम्युनिज़्म का है और कितना उसी कम्युनिज़्म के विरुद्ध चीन के आंतरिक संघर्ष का? चीन कम्युनिज़्म के कारण सफल हुआ या कम्युनिज़्म के बावजूद?

चीन का कम्युनिज़्म के स्वर्ण काल में क्या अनुभव रहा यह जानने लायक बात है।

चीन ने माओत्से तुंग के नेतृत्व में एक बड़ी लड़ाई जीती थी और 1949 में स्वतंत्रता प्राप्त की थी। चेयरमैन माओ चीन के महामानव गिने जाते थे। उधर चीन के बड़े भाई की भूमिका में पड़ोसी कम्युनिस्ट रूस था।

पर स्टॅलिन की मृत्यु के बाद माओ की रूसी राष्ट्रपति ख्रुशचेव से नहीं बनी। जिस तरह ख्रुशचेव ने स्टॅलिन की मृत्यु के बाद स्टॅलिन की आलोचना की और उसे अपमानित किया, वह माओ को अपने लिए भविष्य के खतरे की घंटी लगा।

ख्रुशचेव का कम्युनिस्ट नीतियों और सिद्धांतों से समझौता भी माओ को पसंद नहीं आया। अपने देश के अंदर भी ऐसी प्रवृति वाले प्रगमटिक नेताओं को माओ पसंद नहीं करता था और उन्हें संशोधनवादी (रिविज़निस्ट) कहता था।

चीन को विशुद्ध साम्यवादी सिद्धातों के आधार पर गढ़ने को तत्पर माओ को देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास का एक बड़ा ही शुद्ध कम्युनिस्ट आईडिया आया जिसे उसने अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘द ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ के साथ लॉन्च किया।

उसने कम्युनिस्ट सिद्धांतों पर पूरे देश की विशाल जनशक्ति के मास मोबिलाइज़ेशन का प्लान बनाया। उसने पूरे देश में लोगों को हज़ारों कम्यून के अंदर इकट्ठा किया। लोगों को सामूहिक कृषि और सामूहिक औद्योगिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में लगा दिया गया।

लोगों को पकड़ पकड़ के और घरों से खींच कर इन कम्यून में ठूंस दिया गया और सामूहिक खेती के प्रयोग किये गए। उन्हें बड़े बड़े डैम बनाने की योजनाओं में लगा दिया गया… हालांकि किसी के दिमाग में कोई स्पष्ट योजना नहीं थी कि ये डैम बन क्यों रहे हैं और इनका किया क्या जाना है। ये सब जनशक्ति के इस्तेमाल के शुद्ध कम्युनिस्ट प्रयोग थे।

साथ ही माओ के दिमाग में यह बात घुस गई कि किसी भी देश की तरक्की और विकास का मानक उसका स्टील का उत्पादन है। उसने लोगों को बड़े पैमाने पर अपने अपने घरों में स्टील बनाने के काम में लगा दिया। लोगों ने अपने अपने घर के पिछवाड़े में स्टील की भट्टियाँ लगा लीं। जिसे जहाँ कहीं लोहे का जो कुछ भी मिला उसे पिघला कर स्टील बनाने में लग गए।

पार्टी के पदाधिकारियों को अपने अपने क्षेत्र में टारगेट पूरे करने का काम मिला और उन्होंने सबको इसमें झोंक दिया। लोगों ने अपने घर के बर्तन, दरवाजे के हैंडल, खिड़कियों की छड़ें, खेती के औज़ार… सबकुछ पिघला डाले और पिघले लोहे के बेडौल लोथड़ों को स्टील कह कर दिखाया जाने लगा।

पार्टी का हर पदाधिकारी अपने अपने क्षेत्र से स्टील के उत्पादन के आंकड़े बढ़ा चढ़ा कर देने लगा। पूरा देश इस अजीब से अनुपयोगी और अर्थहीन पागलपन में जुट गया।

किसानों को उनके खेतों से निकाल कर कम्यूनों में डाल दिया गया और ‘स्टील’ बनाने के काम में लगा दिया गया। उधर उनके खेतों की फसल खड़ी खड़ी सड़ गई। ज्यादातर लोगों के पास खेती करने के औज़ार, फसल काटने को हँसिया तक नहीं था। सबकुछ स्टील बनाने के लिए पिघलाया जा चुका था। नतीजा यह हुआ कि चीन में भयानक अकाल पड़ गया।

पर पार्टी के पदाधिकारी खूब बढ़चढ़ कर अपने अपने क्षेत्र में ग्रेट लीप की सफलताएं गिनाने में लगे हुए थे। तो औद्योगिक और कृषि उत्पादन के अभूतपूर्व आंकड़े दिए जाने लगे। जो भी फसल हुई थी, सरकार ने उसका अधिग्रहण कर लिया।

उधर इतनी अच्छी फसल के आँकड़े आने लगे तो माओ ने रूस से लिया हुआ कर्ज़ समय से पहले लौटाने का फैसला कर लिया। यह कर्ज़ उस समय अनाज के रूप में लौटाया जाता था। तो जो भी फसल हुई थी उसका बड़ा भाग रूस को चला गया।

और यह पागलपन 1958-62, यानी कुल तीन साल चला। इन तीन सालों में चीन ने मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे भयानक अकाल झेला। इसमें मरने वालों की संख्या का एक कंज़र्वेटिव आंकड़ा कम से कम साढ़े तीन करोड़ का है।

1962 में माओ ह्यूनान प्रान्त में अपने पैतृक गाँव गया और वहाँ उसने अपनी आँखों से इस तबाही का मंज़र देखा तो उसे कुछ कुछ शक हुआ कि सबकुछ सही नहीं चल रहा है। फिर उसने ग्रेट लीप फॉरवर्ड को समेटने के आदेश दिए…

तब तक उसे समझ में ही नहीं आया कि यह छलाँग उसे गड्ढे में ले जा रही है? ऐसा नहीं है कि उसे बताया नहीं गया था। पहले कुछ महीनों में ही यह स्पष्ट हो गया था कि यह एक भारी मूर्खतापूर्ण भूल है। पर यह बात माओ को कहे तो कौन कहे?

जिस किसी ने भी ज़रा भी कम उत्साह दिखलाया उसे क्रांति-विरोधी बुर्जुआ घोषित कर दिया गया। ज़रा सी असहमति को विरोध समझ कर कुचल दिया गया। देंग सियाओ पिंग और जो-एन लाई जैसे समझदार और प्रैक्टिकल नेताओं को भी कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुई।

सिर्फ एक व्यक्ति ने साहस दिखलाया, उसका नाम था पेंग दे-व्हाइ, जो चीन का तत्कालीन रक्षा मंत्री और चीनी सेना का महान नायक था। पेंग दे-व्हाइ ने चीन के स्वतंत्रता युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और कोरियाई युद्ध में अमेरिका जैसी महाशक्ति के विरुद्ध चीनी सेनाओं का सफल नेतृत्व किया था।

वह माओ का निकटतम मित्र था और दोनों ने संघर्ष के दिन साथ साथ और बराबरी के स्तर पर बिताए थे। अगर माओ के सामने मुँह खोलने की किसी की हिम्मत थी तो पेंग दे-व्हाइ की ही हो सकती थी।

पेंग दे-व्हाइ ने माओ को एक लंबा व्यक्तिगत गुप्त पत्र लिखा और ग्रेट लीप की समस्याएँ गिनाई और स्थिति से अवगत कराने का प्रयास किया। पर माओ ने इसे विद्रोह की तरह लिया और पूरी पार्टी को अल्टीमेटम दे दिया कि वे पेंग और माओ में एक को चुन लें। माओ पेंग दे-व्हाइ की यह गुस्ताखी भूला नहीं और उसने आगे कल्चरल रेवोलुशन में इसका बदला भी लिया।

ग्रेट लीप फॉरवर्ड की एक और घटना बहुत ही प्रसिद्ध है। माओ ने घोषित किया कि खेतों में आने वाली गौरैया किसानों की दुश्मन हैं जो किसानों की फसल को खा जाती हैं। तो लोगों को गौरैयाओं को मारने के काम पर लगा दिया गया।

यह काम कम्युनिष्टों ने इतने उत्साह से किया कि चीन से गौरैया विलुप्त हो गईं। उधर इसका नतीजा यह हुआ कि टिड्डियों की संख्या बेहद बढ़ गई और टिड्डियों के झुंड के झुंड ने पूरे पूरे खेतों की फसल खा डाली। चीन के अकाल में यह भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर था।

गौरैया और टिड्डियों का यह प्रसंग ग्रेट लीप फॉरवर्ड की एक घटना मात्र नहीं थी। यह वामपंथ का एक रेकरिंग थीम है – वामपंथ गौरैया को दुश्मन घोषित करता है और टिड्डियों को पालता है। टिड्डियां ही वामपंथियों की फौज हैं।

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