इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार – 6

10 मई 1988 को केंद्र की इजाज़त का इंतजार करने की बजाय पुलिस और सुरक्षा बलों ने आतंकवादियों की गोलियों का जवाब गोलियों से देना शुरू कर दिया था। यह दरअसल दिल्ली से सटे मानेसर से NSG कमांडोज़ के वहाँ पहुंचने से पहले की वार्म अप एक्सरसाइज थी।

एक सोची समझी और बहुत ही उम्दा रणनीति के तहत स्वर्ण मंदिर परिसर का बिजली पानी और सीवर लाइन काट दी गयी थी मई की भयंकर गर्मी का मौसम था, अमृतसर की गर्मी वैसे भी खतरनाक होती है।

खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के स्वयंभू लेफ्टिनेंट जनरल मलकियत सिंह ने धमकी जारी की थी कि स्वर्णमंदिर में घुसने के पहले भारतीय सैनिकों को भूनकर रख दिया जाएगा। विमानों से एन एस जी के लगभग 1000 ब्लैक कैट कमांडोज़ को मानेसर से अमृतसर पहुंचाया गया।

सबसे पहले मोर्चे पर डटे छिपकर गोलियां दागने वाले स्नाइपर निशानेबाज़। इनका एक जोड़ा गुरु रामदास सराय के पीछे बनी 300 फीट ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ गया। वहां से वो हरमिंदर साहिब की मीनारों पर बैठे आतंकवादियों से भी ज़्यादा बेहतर पोजीशन में आ गए।

उनको हल्के में लेने का खामियाज़ा पंथक कमिटी के प्रवक्ता जागीर सिंह को भुगतना पड़ा। वो प्यास से बेहाल हो पानी पीने के लिए कमरे से बाहर निकला तो जवानों ने उसका भेजा उड़ा दिया। उसे अंदर खींचने के लिए एक और आतंकवादी ने बाहर झांका, तो उसका भी वही हश्र हुआ। उसके बाद किसी की हिम्मत नहीं हुई बाहर निकलने की।

इस शुरुआती प्रहार ने ही आतंकवादियों की आधी हिम्मत पस्त कर दी। जागीर सिंह को मार गिराने के बाद निशानेबाजों ने दबाव बनाए रखा और तीन दिनों में बीस से ज़्यादा आतंकवादी मार गिराए। वो मंदिर परिसर में होने वाली किसी भी हरकत पर गोली चला देते।

कुछ आतंकवादी मंदिर की मीनारों पर जमे बैठे थे। एनएसजी ने उनसे निपटने के लिए अलग रणनीति अपनाई। भारी मशीनगनों से मीनारों पर हज़ारों गोलियां बरसाई गईं। इस दौरान तेज़ रोशनी की गई। इस गोलीबारी से जगह-जगह पर मीटर भर के गोल घेरे उभर आए। इसके बाद कमांडो 84 मिमी व्यास के गोले फेंकनेवाली ‘कार्ल गुस्ताव’ राइफल ले के आए। उनसे उन गोल घेरों पर टैंक निरोधक गोले बरसाए गए। इससे मीनारों पर बड़े-बड़े छेद हो गए। इन छेदों में से आंसू गैस के गोले अंदर फेंके गए। जब धुआं बाहर निकलने लगा तो कमांडो घात लगा कर बैठ गए कि अब आतंकवादी बाहर की ओर निकलेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि वो पहले ही भाग चुके थे।

15 मई को सर्बजीत सिंह ने एक बार फिर माइक पर कहा कि दरबार साहिब के किला बनने से मर्यादा भंग हो रही है, यह सिंहों को शोभा नहीं देता। हम कुछ समय तक गोली चलाना बंद कर रहे हैं, इसलिए आप अपने आप को कानून के हवाले कर दें और परिक्रमा से निकल कर गुरु रामदास सराय में जाएं। काफी समय तक इस अपील का कोई असर दिखाई नहीं दिया, फिर अचानक एक के बाद एक कमरों के दरवाजे खुले और उनमें से लोग बाहर आने लगे। थोड़े ही समय में गुरु रामदास सराय का बरामदा आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादियों और उनके परिवारों के सदस्यों से भर गया।

सीआरपीएफ के डॉक्टरों को जख्मियों और बीमारों का इलाज करने के लिए कहा गया और उन्हें खाने के लिए केले दिए गए। तभी एक पुलिस अफसर ने एक चादर ओढ़े बैठे सिख की और इशारा किया कि वह सुरजीत सिंह पेंटा बैठा है, जैसे ही केपीएस गिल ने उसकी तरफ देखा, उसने उसी वक्त जेब से साइनाइड का कैप्सूल निकाल कर निगल लिया। उसके मुंह से हलकी सी झाग निकली और वह वहीं लुढ़क गया। पुलिस मुलाजिम उसे उठाकर अस्पताल ले गए लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वहीं पर पेंटा की पत्नी अपने दो छोटे छोटे बच्चों के साथ बैठी थी, लेकिन काफी समय तक अपने आंसुओं को रोके रखा था उन्होंने उफ्फ !!

इधर ये कार्रवाई चल ही रही थी कि उधर स्पेशल एक्शन ग्रुप के छापामार सदस्यों ने अपनी ख़ास काली पोशाक पहन कर मंजी साहब और नए लंगर की इमारतों पर कब्ज़ा करना शुरू किया। एक और जनसमूह जो सरेंडर की अपील सुनकर परिक्रमा के कमरों से बाहर निकला था, तेज़ी से हरमिंदर साहिब में घुस गया।

तत्काल उनसे निपटने की नई रणनीति बनने लगी। कुछ लोग तुरंत कार्रवाई के पक्ष में थे लेकिन गिल ने इंतज़ार करने का फैसला किया। इस बीच लगातार मानसिक दबाव बनाया गया। हरमंदिर साहिब की बिजली पानी की सप्लाई बंद कर दी गई। अब वहां सैकड़ो आतंकवादी और उनके समर्थक बिना पानी और बिजली के थे ऊपर से अमृतसर की भयंकर गर्मी का मौसम, हालात ये थे कि हगना मूतना तक इन तथाकथित धर्मप्रेमियों ने पवित्र हरमिंदर साहिब में ही कर कर के भर दिया था क्योंकि जिसने बाहर कदम भी रखा उसे NSG के स्नाइपर ने उड़ा दिया… पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया अब मध्यक्षता करने को प्रसिद्ध सिख संत बाबा उत्तम सिंह को लाया गया, जिन्होंने आतंकवादियों से लगातार समर्पण की अपीलें की।

आखिरकार 18 मई की डेडलाइन निर्धारित की गई. वो ख़त्म होने से पहले ही बचे हुए 46 आतंकवादी बाहर आ गए. इस तरह से ये ऑपरेशन ख़त्म हुआ जिसमें आतंकवादियों द्वारा हरमिंदर साहिब को अपवित्र करने की बड़ी तीखी आलोचना हुई थी। 9 दिन तक चला ये ऑपरेशन अत्यंत कामयाब रहा था एक भी सुरक्षा कर्मी हताहत नहीं हुआ था।

क्रमशः
– इकबाल सिंह पटवारी

इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार – 5

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