…और फिर जनकवि नागार्जुन के लिए नफ़रत में बदल गया, मेरा सारा सम्मान

“रोता हूँ लिखता जाता हूँ, कवि को बेकाबू पाता हूँ!” ये जनकवि नागार्जुन की पंक्तियाँ हैं।

मैं जब सिविल सर्विसेज का मेन्स दे रहा था तो मेरा एक विषय हिन्दी साहित्य था और मैंने परीक्षा में अपने उत्तर लिखने की शुरुआत नागार्जुन की इन्हीं पंक्तियों से की थी।

वो एक दौर था जब मैं नागार्जुन का बहुत बड़ा फैन था। वे बिहार से थे और उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। वो अपने साहित्य लेखन में दलित, दमित व वंचित तबके के लिए हमेशा मुखर रहे, इसी कारण उन्हें जनकवि कहा गया।

इस विषय में ‘हरिजन गाथा’ उनकी कालजयी रचना है। बिहार के मगह क्षेत्र के बेल्छी नामक स्थान पर सन 1977 में तेरह दलितों को सामूहिक रूप से गाँव के दबंग ऊँची जाति के लोगों ने जला दिया था।

इस घटना को अंजाम देने के लिए कई दिनों तक तैयारी करके विशाल गड्ढा खोदा गया, लकड़ी, केरोसिन तेल आदि का इंतजाम किया गया।

दलितों ने होनेवाली अनहोनी को रोकने के लिए बार-बार पास के ही थाने में प्रार्थना की। पर इन सबका कोई फायदा नहीं हुआ और नियत समय पर उस विशाल गड्ढे में आग लगाई गई और तेरह दलितों को उसमें जिंदा झोंक दिया गया।

इस घटना के बाद देश में कोहराम मच गया। उस समय मामला इतना संवेदनशील बन गया था कि इंदिरा गांधी वहाँ पहुँचने का कोई साधन नहीं होने पर हाथी पर ही चढ़कर पीड़ितों को सांत्वना देने बेल्छी पहुँच गयीं।

इस घटना से क्षुब्ध होकर नागार्जुन ने ‘हरिजन गाथा’ नामक कविता लिखी है। कविता में ऐसी कल्पना की गई है कि अग्निदाह में मृत एक दलित पिता की पाँच महीने बाद एक तेजस्वी संतान होती है।

उन हरिजनों के गुरु गरीबदास जो कि रैदासी मठ से संबंधित हैं, को इस बालक के हाथ देखकर भविष्य जानने के लिए बुलाया गया। गुरु महाराज ने बताया कि ये अवतारी बालक है। ये बड़ा होकर अपने दलित समाज पर हुए अत्याचार के लिए सशस्त्र क्रांति करेगा और बदला लेगा। बड़े-बड़े नेता इसके आगे-पीछे घूमेंगे। इसके पास खूब धन बल और जन बल होगा, जिसके बल पर इसे कभी लड़ने के लिए हथियारों की कमी नहीं होगी। ये नई वेद और ऋचाओं का गाता बनेगा। उनकी कविता की कुछ पंक्तियाँ –

जनबल-धनबल सभी जुटेगा
हथियारों की कमी न होगी

अरे देखना इसके डर से
थर-थर कांपेंगे हत्यारे
चोर-उचक्के-गुंडे-डाकू
सभी फिरेंगे मारे-मारे

इसकी अपनी पार्टी होगी
इसका अपना ही दल होगा
अजी देखना, इसके लेखे
जंगल में ही मंगल होगा

आड़ी-तिरछी रेखाओं में
हथियारों के ही निशान हैं
खुखरी है, बम है, असि भी है
गंडासा-भाला प्रधान हैं

दिल ने कहा – दलित माँओं के
सब बच्चे अब बागी होंगे
अग्निपुत्र होंगे वे अन्तिम
विप्लव में सहभागी होंगे

दिल ने कहा – अरे यह बच्चा
सचमुच अवतारी वराह है
इसकी भावी लीलाओं की
सारी धरती चरागाह है

दिल ने कहा – अरे यह बालक
निम्न वर्ग का नायक होगा
नई ऋचाओं का निर्माता
नए वेद का गायक होगा

दिल ने कहा – अरे इस शिशु को
दुनिया भर में कीर्ति मिलेगी
इस कलुए की तदबीरों से
शोषण की बुनियाद हिलेगी

बढ़ आया बुद्धू अपने छ्प्पर की तरफ़
नाचते रहे लेकिन माथे के अन्दर
गुरु महाराज के मुंह से निकले हुए
हथियारों के नाम और आकार-प्रकार
खुखरी, भाला, गंडासा, बम तलवार…
तलवार, बम, गंडासा, भाला, खुखरी…

नागार्जुन ने यहाँ ऊँची जातियों के लिए ऊँची जाति, भूमिधर जाति, प्रबल जाति आदि शब्दों का प्रयोग किया है। यहाँ कविता में स्पष्ट नहीं हो पाता कि किस दबंग जाति की बात हो रही है।

मेरा जन्म शिक्षा-दीक्षा सब कोलकाता में हुआ। वहाँ पूर्वांचल के बस कुछ ही मित्र थे। तीन अभिन्न दोस्त थे उनमें एक भूमिहार, एक ब्राह्मण और एक यादव था। बाकी बंगाली और राजस्थानी मित्र थे।

ऐसे माहौल में परवरिश होने के कारण जातीय सेंटीमेंट जग ही नहीं पाया। जातीय सेंटीमेंट के लिए ग्रामीण पृष्ठभूमि अधिक अनुकूल होती है जहाँ हमारे आसपास अपनी जाति के अधिकांश लोग होते हैं और हमारे सुख-दुख उन्हीं के साथ जुड़े होते हैं। लेकिन शहरों में, वो भी बंगाल के शहरों में ऐसी परिस्थिति का नितांत अभाव होता है, इसलिए सामूहिक जातीय सेंटीमेंट विकसित नहीं हो पाता।

मैं जब दिल्ली नया-नया आया था तो किसी उत्तर प्रदेश के मित्र ने ठाकुर साहब कहते हुए संबोधित किया। मैंने उसे समझाया कि नहीं, मैं ठाकुर नहीं हूँ। मुझे ये तक पता नहीं था कि राजपूतों को ही ठाकुर कहते हैं।

इससे पहले मैं ठाकुर के दो ही अर्थ जानता था। एक, बंगाल में भगवान को ठाकुर कहते हैं। दूसरा, फिल्मों में अमरीश पुरी ठाकुर बनता था जो कि एक ज़ुल्मी ज़मींदार होता था और अमिताभ बच्चन उससे बोलता है – “चिल्लाओ मत ठाकुर! जबसे होश सम्भाला है तबसे तुम बोलते आये हो और मैं सुनता आया हूँ, लेकिन आज मैं बोलूँगा और तुम सुनोगे”। इसके बाद अमिताभ ठाकुर को लतियाता है, गरियाता है, जमीन पर घसीटता है और अंत में जान से मार देता है।

मेरी जैसा व्यक्ति जिसे ठाकुर का मतलब नहीं पता था, वो भी नागार्जुन की कविता पढ़कर गिल्टी फीलिंग में जीने लगा। मुझे लगता था कि ये दलितों को जीवित जलाने का काम ज़रूर दबंग भूमिहार, राजपूत या ब्राह्मण जाति का है।

नागार्जुन का मैं इसीलिए सम्मान करता था कि वे सवर्ण होकर भी सवर्णों की कमी पर चोट कर रहे हैं। अंत में नागार्जुन ने हिन्दू धर्म को निकृष्ट मानते हुए और इसमें सुधार की संभावनाओं से इनकार करते हुए बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया।

बिहार सरकार में नितीश कुमार के सचेतक और नालंदा के दबंग श्रवण कुमार जी के एक रिश्तेदार मेरे छोटे भाई जैसे हैं। वो दिल्ली में सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करते हैं और बहुत होनहार हैं। लेकिन उनकी पर्सनैलिटी की सबसे बड़ी खासियत है कि बहुत दबंग हैं और किसी से भी भिड़ जाते हैं।

वे जाति से कुर्मी हैं और विधानसभा में नितीश कुमार के समर्थक हैं। पर वो कट्टर हिन्दुवादी हैं, अपने गाँव में सैकड़ों समविचारी लोगों की टीम बना रखी है। मुझे बहुत मानते हैं, मुझमें उनका प्राण बसता है।

एक दिन मेरे पास बैठे थे और बताने लगे कि हमारे गाँव के पास बेल्छी में जब दलितों का मन बहुत बढ़ गया था और हमारी बहन-बेटियों को छेड़ने लगे थे तो हमारे बाप-दादाओं ने उन्हें ज़िंदा जला दिया और तब के बाद बिलकुल शांति स्थापित हो गई।

ये सुनकर मुझे काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई। मैं बिना कुछ किये वर्षों से गिल्टी फीलिंग में जी रहा हूँ और जिसने इस घटना को अंजाम दिया उन्हें आज भी फक्र है।

ऊपर से ये भाई भूमिहार, राजपूत या ब्राह्मण नहीं हैं। ये जाति के कुर्मी हैं। उस क्षेत्र में इस जाति का दबदबा रहा है। उस दिन से जनकवि नागार्जुन के लिए मेरा सारा सम्मान नफ़रत में बदल गया। उन्हें अपनी कविता में स्पष्ट करना चाहिए था कि वो किस दबंग जाति की बात कर रहे हैं। क्योंकि नब्बे के दशक में मंडल कमीशन ने उस दबंग जाति को पिछड़ा करार दे दिया, और पिछड़े और दलित जातियों पर शोषण करने का पाप बाकी सवर्ण बची जातियों के नसीब में आया।

यही कारण है कि जो जातियाँ आज की तारीख में सवर्ण बची हुई हैं, वो भी आरक्षण के बहाने इससे पल्ला झाड़ लेना चाह रही हैं। इससे बाहर निकलने के सिर्फ फायदे ही फायदे हैं। एक तो आपको आरक्षण का लाभ भी मिलेगा, दूसरा आपको भी पीड़ित मान लिया जायेगा।

इस प्रकार अगर आपने कभी किसी का शोषण किया भी है तो आप उस पाप से बरी हो जायेंगे और आपके पाप के लिए दोषी बाकी बचे सवर्ण जातियों के माथे मढ़ दिया जायेगा। ऐसे ही धीरे-धीरे सारी जातियाँ आज नहीं तो कल शोषक से पीड़ित बन जायेंगी। देखिए न, महाराष्ट्र में सैकड़ों सालों तक राज करनेवाली गौरवमयी मराठा जाति भी अब जनरल कैटेगरी से बाहर निकल गई।

इस देश की विडंबना देखिए कि जो दबंग सवर्ण जाति सच में शोषण करती है वो अपना शक्ति प्रदर्शन करके खुद को पिछड़ा घोषित करवा लेती है और पीड़ितों के साथ खड़ी हो जाती है और दलितों को न्याय दिलाने के लिए ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकना चाहती है। और ऐसी दबंग जातियों को पिछड़ा बताकर वो ‘धूर्त बंगाली वामपंथी’ हम सबको लड़ा रहा है।

हर समाज में मज़बूत, कमज़ोर का शोषण करता ही है। जिस क्षेत्र विशेष में किसी जाति की आबादी ज्यादा होती है तो उसका प्रभाव स्वाभाविक ही बढ़ जाता है। जैसे हरियाणा जाट डोमिनेंट है वैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई क्षेत्र यादव डोमिनेंट हैं, वहाँ किसकी मजाल है कि यादवों का शोषण कर लेगा।

ऐसे ही पूरे देश में अलग-अलग जातियों का वर्चस्व है। सारी राजनीतिक पार्टियों का सारा गणित, सारी कूटनीति, सारी व्यूह रचना इसी सोशल इंजीनियरिंग को साधना ही तो है। इस जटिल समीकरण का वो ‘मक्कार वामपंथी’ जानबूझकर सरलीकरण कर रहा है।

अगर ये इतना ही न्याय का हिमायती है तब ये उस समय मेरे विरोध में क्यों खड़ा हो गया था जब मैंने पश्चिम बंगाल में बंगालियों द्वारा हिन्दी भाषी लोगों के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार करने पर आवाज बुलंद की थी। मेरे लिखने के बाद ये मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया था।

ये वामपंथ से हृदय परिवर्तन कर दक्षिणपंथी बन जाने का दावा करता है पर ये आज भी वामपंथी है। इसने 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सरकार बनने की संभावना के साथ ही दक्षिणपंथी चोला धारण कर लिया था।

ये मायावी हमारे खेमे में घुसकर हम लोगों को लड़ा रहा है। ये वामपंथियों का चिरपरिचित अंदाज़ है कि इनकी निगाह कहीं पर होती है और निशाना कहीं पर लगा रहे होते हैं। हिन्दुओं को तोड़ना ही इन सबका हिडेन एजेंडा है।

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