क्या जनता ने मोदी की झोली में डाल दिया मध्यप्रदेश!

अभी तक जो आंकड़े आये हैं उनसे पता चलता है कि मध्यप्रदेश में 75% से कुछ ज़्यादा मतदान हुआ है।

ये अपने आप में एक कीर्तिमान है।

मुझे वो समय भी याद है जब देश में आमतौर पे 42-45 % या फिर अधिकतम 55% मतदान हुआ करता था।

आजकल 65% से ऊपर और 75-80% तक मतदान होना आम बात है। ऐसी सूचना है कि मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में तो कई जगह 85% से भी ज़्यादा मतदान हुआ है।

आखिर वोटिंग प्रतिशत में ये अभूतपूर्व वृद्धि क्यों दर्ज हो रही है?

मुझे इसका कारण सिर्फ और सिर्फ समाज में सोशल मीडिया का प्रभाव लगता है।

आज देश के हर सक्रिय व्यक्ति के हाथ में एक स्मार्टफोन है और वो अपने इर्द गिर्द घट रहे घटनाक्रम से जुड़ा हुआ है। उसे बखूबी मालूम है कि उसके इर्द गिर्द क्या घट रहा है।

अब उसे मालूम है कि उसके प्रदेश-देश में चुनाव है और उसे वोट देना है। अब उसे लालच दे के, उठा के, धकेल के मतदान केंद्र तक नहीं ले जाना है। वो खुद जानता है कि उसे वोट देना है।

मेरा ये मानना है कि जो 25% लोग वोट देने नहीं आये वो सब मध्यप्रदेश से बाहर थे, अप्रवासी लोग… मौके पर मौजूद वोटर का वोटिंग प्रतिशत तो आजकल शायद 90% से ऊपर होगा।

अब सवाल है कि इतनी भारी संख्या में लोग वोट देने निकले, तो क्या ये सकारात्मक (Positive) वोट था या नकारात्मक (Negative) वोट?

मोटे तौर पर शिवराज सिंह से ऐसी कोई नाराजगी जनता में नहीं थी। 15 साल की सत्ता-विरोधी भावना (Anti Incumbency) ज़रूर है पर कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। ऐसे में सवाल ये है कि इतने सारे लोग शिवराज सिंह चौहान को हराने निकले या जिताने निकले?

3 दिन पहले भीलवाड़ा – राजस्थान में प्रधानमंत्री मोदी की रैली हुई। उसमें जो जनसैलाब उमड़ा उससे लोग अचंभित हैं। मेरी कुछ स्थानीय मित्रों से बात हुई है। वो कहते हैं कि भीड़ शहरी नहीं थी। लोगबाग गांवों से आये।

जी हाँ… भाजपा का विस्तार हुआ है।

भाजपा अब बनियों-सवर्णों की शहरी पार्टी नहीं रही… अब ये गांवों कस्बों की पार्टी है जिसे दलितों-पिछड़ों का भरपूर समर्थन प्राप्त है।

2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में मैंने अनुभव किया था कि भाजपा ने ओबीसी को अपने साथ जोड़ा है और 2017 की उप्र विजय ओबीसी की विजय थी…

2018 में मप्र और राजस्थान में अब तक के रुझानों से मुझे ऐसा लग रहा है कि भाजपा ने अपना जनाधार गांवों कस्बों में और अति पिछड़ों (EBCs) और दलितों में बढ़ाया है।

ऐसा शायद मोदी सरकार की आयुष्मान, उज्जवला, आवास योजना, शौचालय, बिजली, पानी, सड़क, मुद्रा योजना, पेंशन जैसी गरीबों की कल्याणकारी योजनाओं के कारण हुआ है।

8.5 करोड़ परिवारों को उज्जवला, डेढ़ करोड़ आवास, 10 करोड़ से ज़्यादा शौचालय, करोड़ों गरीब घरों में बिजली, डेढ़ करोड़ से ज़्यादा आयुष्मान कार्ड ऐसी मूलभूत योजनाएं जो सीधे सीधे देश के गरीब आदमी के जीवन को प्रभावित करती हैं, इसका असर है ये जो उस दिन भीलवाड़ा में देखने को मिला।

आज तक भाजपा ने 20 से ज़्यादा राज्यों में चुनाव जीते हैं या बहुत बेहतर प्रदर्शन किया है। पर इनमें से ज़्यादातर राज्य वो थे जहां काँग्रेस या विपक्षी क्षेत्रीय दल की सरकार Anti Incumbency झेल रही थी जिसका लाभ भाजपा को मिला।

पर गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान वो राज्य हैं जहां भाजपा क्रमशः 20, 15 और 5 साल की Anti Incumbency के बोझ तले मैदान में उतरी।

गुजरात तो किसी तरह भाजपा ने जीत लिया।

अब अगर वो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान भी बचा ले जाती है (जिसकी पूरी पूरी सम्भावना है) तो मैं ये मान लूँगा कि मोदी जी की विकास की राजनीति सफल है।

राजस्थान में जब भाजपा मैदान में उतरी थी तो स्थिति 50 – 150 थी। आज जो संकेत मिल रहे हैं उनसे लगता है कि मुक़ाबला बराबरी पर आ चुका है। अगले एक हफ्ते में ये 120 – 80 पर चला जाए तो मुझे आश्चर्य नही होगा।

कल मध्यप्रदेश तो वहां की जनता ने मोदी की झोली में डाल दिया है, ऐसा मेरा विश्वास है… राजस्थान भी आएगा।

शुक्र है कि इस युद्ध में मोदी हैं हमारे सेनापति

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