‘भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे’ को सिद्ध करता ‘बुद्धि-पिशाचों’ का कूद-कूद कर भागना

हनुमान जी के नाम पर पिछली बार हंगामा तब मचा था जब किसी एक पर-गतिशील, अस्वस्थ मानसिकता के जीव को भगवा रंग के हनुमान की एक पेंटिंग से दिक्कत हो गई थी।

हनुमान जी की मूर्तियों पर अक्सर इतना सिन्दूर लगा दिखता है कि मूर्ति ही भगवा रंग की हो जाती है। इसमें आश्चर्य की क्या बात थी पता नहीं।

कथावाचक इसके पीछे की एक कहानी भी सुनाते हैं जिसमें हनुमान जी सीता से पूछ बैठते हैं कि वो ये सिन्दूर क्यों लगाती हैं? माता सीता कहती हैं कि उन्हें श्री राम से प्रेम है, उनके लिए वो सिन्दूर लगाती हैं। थोड़ी ही देर में हनुमान जी अपने पूरे शरीर में सिन्दूर पोते प्रकट होते हैं। उनका तर्क था कि उन्हें भी श्री राम से प्रेम है, इसलिए उन्होंने पूरे शरीर में ही सिन्दूर पोत लिया है!

किस्से कहानियों और भाव प्रधान भक्ति रस की बात हटा दें तो सोचना पड़ता है कि आखिर हनुमान जी से हमलावरों को इतनी दिक्कत क्यों है?

एक तस्वीर से उनकी भावना बेन आहत हो जाए या एक बयान को तोड़ मरोड़ कर सनसनी फैलानी पड़े ऐसा क्यों होता है? सनातनी करीब 1970-80 के दौर से सेक्युलर हो चले हैं, ज्यादा पूजा पाठ नहीं करते।

इसके बाद भी हनुमान चालीसा सबने सुनी होती है। छंद में लिखी होने के कारण ये आसानी से याद भी हो जाती है। यहाँ वहां एंटर मार कर, वाक्य अलग कर देने से बनी बेतुकी तथाकथित ‘कविता’ की तरह उसे याद रखना मुश्किल नहीं होता। हनुमान चालीसा का एक वाक्य ‘काँधे मूंज जनेऊ साजे’ भी सबको आसानी से याद आ जाएगा।

मूर्ति, तस्वीर या कोई भी प्रतीक देखते ही ये आसानी से दिख जाता है कि हनुमान जी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य तो क्या, मानव स्वरुप में ही नहीं दिखते। ऐसे में अगर वो जनेऊ पहनते हैं तो ये ‘लिबटार्ड’ जमात के तर्क कि ‘जनेऊ सिर्फ ऊँची जातियों का अधिकार था’ की धज्जियाँ उड़ा देता है। उनके तमाम कार्टून जो जनेऊधारियों के लिए पिछले 100 साल में बने हैं, सभी बेकार हो जाते हैं।

सनातनी समाज में जबरन कोई ‘फाल्ट लाइन’ (कोई कमी) ढूंढकर उसके जरिये वैमनस्य को बढ़ावा देना मुश्किल हो जाता है। अगर सभी जनेऊ पहन सकते थे ये पता चल जाए तो कितने ही भाषण, कितने तर्क बर्बाद हो जायेंगे। देवी काली (तारा) के कई रूपों पर सर्प के यज्ञोपवीत का ज़िक्र भी आता है। मेरे ख़याल से उनके ज़िक्र पर भी इनकी भावना बेन आहत हो जाएगी।

बिहार के बक्सर में कन्या के यज्ञोपवीत की परम्परा अभी भी ज़िंदा ही है। इसके अलावा स्त्री पुरोहित होती है। हमलावर मज़हब या रिलिजन की तरह स्त्रियों से पूजा-पाठ या कर्मकाण्ड के अधिकार सनातनी छीनते ही नहीं। जिसे लिखे हुए से, मुख्य धारा की पेड मीडिया से इतनी मेहनत से दशकों में हटाया गया, सब हनुमान जी के नाम से बेकार हो जाता है।

बाकी ‘भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे’ वाली एक लाइन भी याद आ रही है। हनुमान जी के नाम से ‘बुद्धि-पिशाचों’ का कूद-कूद कर भागना दिख तो रहा ही है!

लेकिन अभी काम बहुत सा बाकी ही है, और प्रतीक्षारत हैं राम

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