शुरू हो चुका एक और भिंडरावाले तैयार करने का काँग्रेसी खेल

इसी वर्ष सितम्बर में एक वीडियो वायरल हुआ था। उस वीडियो में पाकिस्तानी आतंकवादी गोपाल सिंह चावला एक हाथ में AK-47 राइफल तथा दूसरे हाथ में पाकिस्तानी झंडा थाम कर हिन्दूस्तान का नामोनिशान मिटा देने की धमकी दे रहा था।

उसी गोपाल सिंह चावला को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने कल करतारपुर में हुए सरकारी समारोह में राजकीय अतिथि का दर्जा देकर पहली पंक्ति में बैठाया था।

लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा था।

कल उसी समारोह में इमरान खान और पाकिस्तानी आर्मी चीफ बाज़वा की मुक्त कंठ से चरण वंदना के साथ ही साथ सिद्धू ने उस गोपाल सिंह चावला से लाहौर के गवर्नर हाऊस में लम्बी मुलाकात की, फिर कमरे से बाहर आकर उसके साथ शान से फोटो भी खिंचवाई।

गोपाल सिंह चावला ने भी सिद्धू को अपना भाई बताया। पाकिस्तानी आर्मी चीफ बाज़वा का खुला समर्थन/ आशीर्वाद सिद्धू पहले ही ले चुके हैं।

ध्यान रहे कि 1980 में भी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को भी तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति/ आर्मी चीफ जिया उल हक ने खुलकर समर्थन और सहयोग दिया था।

सिद्धू के इस देशघाती कुकर्म के ख़िलाफ़ केवल पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की चीखें देश सुन रहा है, लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू के इस देशघाती देशद्रोही कुकर्म पर राहुल गांधी/ सोनिया गांधी की जोड़ी शातिर मौन साधे है। ऐसे मौन को ही मौन समर्थन कहा जाता है।

यह परिस्थितियां संकेत रही हैं कि… काँग्रेस ने एकबार फिर अपने उस खतरनाक खेल की शुरुआत कर दी है जो खतरनाक खेल उसने आज से लगभग 38 बरस पहले खेला था और उसके उस खेल की आग में डेढ़ दशक तक देश और पंजाब बुरी तरह जला था। खुद इंदिरा गांधी भी उसी आग में जलकर खत्म हुईं थीं।

परम चरम सेक्युलर और कट्टर भाजपा विरोधी, नामी गिरामी पत्रकार रहे कुलदीप नैयर की किताब पढ़िए या दशकों तक भारत में BBC के ब्यूरो चीफ रहे मार्क टुली/ सतीश जैकब की किताब पढ़िये या फिर खुशवंत सिंह समेत दर्जन भर और पत्रकारों की किताबें पढ़िए।

80 व 90 के दशक में लिखी इन किताबों में बहुत साफ शब्दों में बहुत विस्तार से वह पूरा घटनाक्रम लिखा गया है कि काँग्रेस हाईकमान ने किस तरह कुख्यात आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया, पाला पोसा और बढ़ाया था।

इन किताबों में इसके दो मुख्य कारण बताए गए हैं।

पहला यह कि पंजाब में तेज़ी से लोकप्रिय एवं राजनीतिक रूप से सशक्त हो रहे अपनी ही सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह के लिए मुसीबतें खड़ी कर के उन्हें कमजोर करना था।

दूसरा कारण अपने राजनीतिक विरोधी अकाली दल का प्रतिद्वंदी खड़ा करना था। काँग्रेसी आस्तीन में पले उस सांप ने देश के साथ ही साथ इंदिरा गांधी को भी डसा था।

आज भी परिस्थितियां कुछ उसी मोड़ पर खड़ी हैं। पंजाब में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की स्वाभिमानी भावभंगिमाएं राजनीतिक गुलाम पालने की लती मां-बेटे की जोड़ी को रास नहीं आ रही। अकाली-भाजपा का खात्मा तो इस जोड़ी का मुख्य उद्देश्य है ही।

कहीं पाकिस्तान में खालिस्तानी अलगाववादियों का नया पोस्टर बॉय तो नहीं बन रहे सिद्धू

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