कांग्रेस का हिंदुत्व स्वांग और करपात्री का श्राप

देश में चुनावी मौसम चल रहा है, 5 राज्यों के चुनाव आज संपन्न हुए। मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव हुए। चुनावी समय में सभी राजनीतिक पार्टियां जनता को लुभाने के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा रही हैं, इसके लिए राज्य में सियासी माहौल गर्म है।

कांग्रेस ने हाल ही में अपना घोषणापत्र जिसे इस बार वचनपत्र नाम दिया गया है। इसमें कांग्रेस ने तमाम लोकलुभावन वादे किये हैं। कई वादें तो ऐसे है जिसपर विश्वास कर पाना भी मुश्किल है। खैर, इन वादों में एक वादा है कि सूबे में कांग्रेस सरकार बनने पर वे राज्य के हर ग्राम पंचायत में गौशाला का निर्माण करेंगे।

कांग्रेस के इसी घोषणापत्र पर बीजेपी ने अब तीखा हमला बोला है क्योंकि कांग्रेस की यह घोषणा उनके करनी और कथनी में फर्क को उजागर करता है। बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि जो लोग कल तक कसाई की तरह व्यवहार करते थे वे अब वोट के लिए गायों के प्रति प्रेम दिखा रहे हैं।

पिछले 2-3 वर्षों में बीजेपी के राज्य दर राज्य विजय रथ को देखकर कांग्रेस देर से ही सही यह समझ चुकी है देश के सबसे बड़े समाज को नाराज कर, उसकी आस्था के साथ खिलवाड़ कांग्रेस को महंगा पड़ सकता है और देश की जनता अब भली भांति यह समझ रही है जिसका खामियाजा उसे हर प्रदेश के चुनाव में देखने को मिला है। ऐसे में कांग्रेस ने खुद को सॉफ्ट हिंदुत्व के तरफ मोड़ लिया है यही कारण है चुनाव दर चुनाव राहुल समेत पूरी कांग्रेस कभी खुद को शिवभक्त तो कभी रामभक्त कभी जनेउधारी ब्राह्मण घोषित करते पाए जा रहे है।

कांग्रेस वर्षों से गौ हत्या समर्थक रही है, देश के समक्ष ऐसे कई मौके आये जब कांग्रेस का गौहत्या बंदी विरोध और गौहत्या समर्थन उजागर हुआ है। देश के इतिहास के कुछ बड़े उदहारण जो कांग्रेस के गौरक्षक बनने के दावे की पोल खोलते हैं।

1955 में जब नेहरू ने कहा था वे गौहत्या बंदी के विरोधी है

स्वाधीन भारत में विनोबाजी ने पूर्ण गोवधबंदी की मांग रखी थी। उसके लिए कानून बनाने का आग्रह तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से किया था। इसी बीच 1955 में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष निर्मलचन्द्र चटर्जी (लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के पिता) ने संसद में गौहत्या बंदी पर एक विधेयक प्रस्तुत किया था। उस पर जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा में घोषणा की कि “मैं गोवधबंदी के विरुद्ध हूं। सदन इस विधेयक को रद्द कर दे। राज्य सरकारों से मेरा अनुरोध है कि ऐसे विधेयक पर न तो विचार करे और न कोई कार्यवाही।“

1966 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी ने निहत्थे गौरक्षकों पर चलवाई थी गोलियां

1965 में भारत के लाखों संतों ने गोहत्याबंदी और गोरक्षा पर कानून बनाने के लिए एक बहुत बड़ा आंदोलन चलाया गया था। 1966 में अपनी इसी मांग को लेकर सभी संतों ने दिल्ली में एक बहुत बड़ी रैली निकाली। उस वक्त देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। इंदिरा गांधी ने करपात्री महाराज से वादा किया था कि चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्लखाने बंद हो जाएंगे, जो अंग्रेजों के समय से चल रहे हैं। इंदिरा गांधी चुनाव जीत गईं लेकिन उनकी इस बात को टालती रहीं। ऐसे में करपात्रीजी को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।

संतों ने 7 नवंबर 1966 की कड़कती ठण्ड में संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। करपात्रीजी महाराज के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारका पीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय की सातों पीठों के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, माधव संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज के प्रतिनिधि, सिखों के निहंग व हजारों की संख्या में मौजूद नागा साधुओं समेत हजारों की तादाद में साधू संत शामिल हुए थे।
कहते हैं कि नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था। संसद गेट से लेकर चांदनी चौक तक लाखों लोगों की भीड़ जुटी थी जिसमें 10 से 15 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं। हजारों संत थे और हजारों गोरक्षक थे। सभी संसद की ओर कूच कर संसद भवन का घेराव कर लिया था।

जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह सूचना मिली तो उन्होंने निहत्थे करपात्री महाराज और हजारों साधू-संतों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए। भीड़ और आक्रामक हो गई। इतने में अंदर से गोली चलाने का आदेश हुआ और पुलिस ने संतों और गोरक्षकों की भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।

संसद के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई। लोग मर रहे थे, एक-दूसरे के शरीर पर गिर रहे थे और पुलिस की गोलीबारी जारी थी। माना जाता है कि उस गोलीकांड में सैकड़ों साधु और गोरक्षक मार दिए गए। दिल्ली में कर्फ्यू लगा दिया गया। संचार माध्यमों को सेंसर कर दिया गया और हजारों संतों को तिहाड़ की जेल में ठूंस दिया गया। यह आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे बड़े गोलीकांड में से एक था लेकिन इसकी सूचना किसी भी मीडिया में प्रकाशित होने पर बंदी कर दी गयी थी। देश के इतने बड़े घटनाक्रम को किसी भी राष्ट्रीय अखबार ने छापने की हिम्मत नहीं दिखाई।

इस हत्याकांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने अपना त्यागपत्र दे दिया और इस कांड के लिए खुद एवं सरकार को जिम्मेदार बताया। लेकिन इतने बड़े गोलीकांड के बाद भी इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा नहीं दिया।

कहते है इस घटना के बाद स्वामी करपात्रीजी ने इंदिरा गांधी को श्राप दे दिया कि जिस तरह से इंदिरा गांधी ने संतों और गोरक्षकों पर अंधाधुंध गोलीबारी करवाकर मारा है, उनका भी हश्र यही होगा। कहते हैं कि संसद के सामने साधुओं की लाशें उठाते हुए करपात्री महाराज ने रोते हुए ये श्राप दिया था। इस कांड के बाद विनोबा भावे और करपात्रीजी अवसाद में चले गए।

2017 में यूथ कांग्रेस के सदस्यों का सरेआम कैमरे के सामने गौहत्या करना

कांग्रेस की मध्यप्रदेश में वोट पाने के लिए गौसेवा की बात करना इसीलिए भी संशयास्पद है क्योंकि इसी कांग्रेस केरल की यूथ विंग ने सरेआम रस्ते पर कैमरे के सामने गाय को काटा था और कभी बीफ पार्टी, तो कभी गाय मांस बिरयानी पार्टी करते हिन्दुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ करने में संकोच नहीं किया था।

कांग्रेस हमेशा से मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते गौहत्या समर्थक रही है लेकिन मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले वे अपने आप को गौभक्त बता रहे थे। ऊपर दिए गए इतिहास के यह वो चुनिन्दा उदहारण है जिससे साफ़ होता है कि कांग्रेस हमेशा से गोहत्या बंदी के विरोध में रही है और गोहत्यारों का साथ दिया तो आज गोरक्षक बनने का कांग्रेस का यह दिखावा हिन्दू वोट साधने का जरिया मात्र है। उम्मीद है मध्य प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के सुविधानुसार वोट के खातिर हिन्दू स्वांग रचाने के पीछे के इतिहास को याद कर चुनाव में मतदान किया होगा।

लोकतंत्र का काला टीका

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