लोकतंत्र का काला टीका

भारत त्यौहारों का देश है यहां जन्म से लेकर मरण तक हर अवसर एक त्यौहार है। दरअसल हर भारतीय एक उत्सवकर्ता के तौर पर ही जन्म लेता है। अब जिस देश में भीख माँगना भी एक उत्सव हो उसकी उत्सवधर्मिता पर प्रश्नचिन्ह लगाना अपने आप में मूर्खता है, पर भारत के संदर्भ में बाकी देश ये मूर्खता करते रहे हैं।

मज़े की बात तो ये है कि पूरी दुनिया सदियों से इस बात को लेकर परेशान है कि हम इतने सारे त्यौहारों के लिए समय और धन जुटा कैसे पाते हैं? तो जवाब ये है साहब! कि भारत में उत्सव के लिए धन व्यय करना एक सामान्य सी बात है उसके लिए कोई तर्क नहीं है।

हम जब सोने की चिड़िया थे तब भी उत्सव मानते थे, फिर मुगलों के ग़ुलाम हुए तब भी उत्सव मनाते थे, फिर अंग्रेजों के गुलाम हुए तब भी उत्सव मानते थे (अंग्रेजों का घर वापसी के बाद आधा वक़्त तो इसी चिंतन में बीता की हमने भारत में खर्च करने लायक तो कुछ छोड़ा नहीं था फिर ये सारे उत्सव मनाते कैसे हैं) फिर आज़ाद हुए तो भी उत्सव मनाते हैं, साहब हमने तो इमरजेंसी में भी अभिव्यक्ति की मृत्यु का त्यौहार मनाया है। हर साल उसकी बरसी का भी त्यौहार मानते हैं।

अभी दो दिन पहले हमने 26/11 की बरसी का उत्सव किया था। मतलब साफ है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हो हम भारतीय उसमें उत्सव का अवसर ढूंढ ही लेते हैं। अब चूँकि भारत त्यौहारों का देश है तो यहां हर दिन एक नए त्यौहार की आवश्यकता बनी ही रहती है, पर हर त्यौहार वर्ष में एक बार ही आता है और ये समयबद्धता हमारी उत्सवप्रियता के लिए संकट बन जाती है, तो इस समस्या का हल हमने यूँ निकाला कि हमने आज़ादी के बाद लोकतंत्र चुन लिया, जिसमें चुनाव होता है।

तो इस तरह चुनाव भारत का एक मात्र त्यौहार बना जो साल भर चलता है। आज यहां तो कल वहां… हम इसे लोकतंत्र का महापर्व भी कहते हैं। हम लगे रहते हैं चुनने में और जिसे चुनते हैं वो 5 सालों के लिए अदृश्य हो जाते हैं। ख़ैर हम लोग परवाह नहीं करते हम कहीं और जाकर किसी और चुनते लगते हैं और ये चुनने का सिलसिला अनवरत चलता रहता है।

हम पंच और सरपंच चुनते हैं, पार्षद चुनते हैं, महापौर चुनते हैं, विधायक चुनते हैं, सांसद चुनते हैं (बस मी-लार्ड को छोड़कर हम बाकी सबको चुनते हैं ) हम व्यस्त रहते हैं चुनने में… हम जाति चुनते हैं हम धर्म चुनते हैं। हम लाल, हरी, नीली, पीली टोपियाँ चुनते हैं, हम झंडे चुनते हैं हम डंडे चुनते हैं, हम कमल, पंजा, सायकिल, हाथी, लालटेन चुनते हैं, हम फ्री wi-fi चुनते हैं, हम बिजली-पानी और गैस की सब्सिडी चुनते हैं, हम पेट्रोल चुनते हैं प्याज़ के दाम चुनते हैं, हम दो रुपए किलो चावल और दाल चुनते हैं, हम बलात्कार चुनते हैं किसानों की आत्महत्या चुनते हैं। हम गौहत्या चुनते हैं मॉब लिंचिंग चुनते हैं।

हम लोकपाल चुनते हैं हम आरक्षण चुनते है। हम तेजू-टीपू और पप्पू चुनते हैं। हम मंदिर चुनते हैं हम मस्ज़िद चुनते हैं। हम भीम चुनते हैं हम मीम चुनते हैं। हम चुनते रहते हैं पर क्या कभी सोचा है कि क्या हम देश चुनते हैं? इसलिए कहता हूँ किसी को भी चुनिए पर याद रखिए व्यक्ति से देश हमेशा बड़ा होता, कुछ भी हारा जा सकता है पर ये देश जीतना चाहिए उसका लोकतंत्र जीतना चाहिए।

पुनः अटल जी याद आते हैं “परंपरा बनी रहनी चाहिए सत्ता का खेल तो चलेगा, सरकारें आएंगी जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए” लोकतंत्र के उत्सव का आनंद उठाइये पर याद रहे किसी कीमत पर ये देश ना हारने पाए, उसका लोकतंत्र ना हारने पाए… भूलिएगा मत कि उँगली पर लगाया गया ये काला निशान लोकतंत्र का काला टीका है कि कहीं हमारे देश को किसी की बुरी नज़र ना लगे…

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