कहीं पाकिस्तान में खालिस्तानी अलगाववादियों का नया पोस्टर बॉय तो नहीं बन रहे सिद्धू

कल शाम इस बात पर गर्म थी कि भूतपूर्व भारतीय किकेट खिलाड़ी, कॉमेडियन, बीजेपी के पूर्व सांसद, वर्तमान में राहुल गांधी के प्रिय व पंजाब की कांग्रेसी सरकार के मंत्री नवजोत सिद्धू, अपने मुख्यमंत्री कप्तान अमरिंदर सिंह की सलाह को दर किनार करते हुये, एक बार फिर पाकिस्तान चले गए है।

आपको यह अजीब लग रहा है कि नहीं, यह मैं नहीं जानता हूँ लेकिन मुझे अजीब लगा है। आखिर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ समारोह में, भारत की संवेदनशीलता का तिरस्कार करते हुए, सिद्धू क्यों गये थे?

जिस तरह से इमरान खान ने सिद्धू की अनदेखी की थी, उससे तो यही लगा था कि इमरान खान ने किसी मित्र को निमंत्रित नहीं किया था बल्कि अपने किसी पिछलग्गू को न्योता भेज दिया था।

उसके बाद पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष बाजवा के जब वो गले मिले थे, तब यही लग रहा था कि बाजवा उनसे गले नहीं मिल रहे बल्कि सिद्धू उनके गले पड़ रहे थे और इस तरह, सार्वजनिक रूप से आत्मीयता के प्रदर्शन से पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष झेंप रहे थे।

यह सब है क्या?

यह कुछ नहीं है, सिर्फ इतिहास की कुछ अलग ढंग से पुनरावृत्ति हो रही है। जाने अनजाने में, कनाडा में बैठे खालिस्तानियों का नवजोत सिंह सिद्धू, नया पोस्टर बॉय बन गये है। जितना मैं समझ पा रहा हूँ, सिद्धू यह भूमिका, कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी के समर्थन से निभा रहे हैं, जिन्हें विश्वास है कि भारतीय मुस्लिम इसका स्वागत करेगा और चुनाव में एक मुश्त वोट कांग्रेस को देगा।

कांग्रेस के लिए यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि खालिस्तानी राक्षस की उत्पत्ति, आज से 40 साल पूर्व, इस दत्तात्रेय गोत्रीय कैथोलिक जनेऊधारी राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी ने भिंडरवाला के रूप में की थी।

उस वक्त इंदिरा गांधी को अकाली दल को ठिकाने लगा कर, कांग्रेस को पंजाब में सत्ता में लाना था, और इस बार इंदिरा के पोते राहुल को भारत के केंद्र को ही ठिकाने लगा कर, पूर्व की भांति अपनी माँ की वेटिकन की सत्ता को लाना है।

पिछले कुछ समय से पंजाब में खालिस्तान को लेकर जो हलचल हो रही है उसके तार जहां कनाडा में बैठे खालिस्तानियों से जुड़े हुये हैं, वही उनको वेटिकन से आर्थिक व लॉजिस्टिक सहायता मिल रही है।

यह बात इससे समझी जा सकती है कि पंजाब में ईसाई धर्मप्रचारक धड़ल्ले से सिखों का धर्मांतरण करा रहे है लेकिन निरंकारियों और डेरों के विरुद्ध हिंसक होने वाले तथाकथित खालिस्तानी, चर्च की इस गतिविधि पर मौन है और उनका मौन, वेटिकन द्वारा प्राप्त सहायता की कीमत है।

लेकिन इस सब के बाद भी, दिशा किसी और तरफ ही जाएगी क्योंकि राहुल के समय का भारत, इंदिरा के काल का भारत नहीं है। उस वक्त पंजाब में खालिस्तानी विरोधी कांग्रेसी कोई नहीं था। सब इंदिरा गांधी व जैल सिंह के निर्देश पर एक सामान्य से ज्ञानी को संत बनाने में लगे थे लेकिन इस वक्त पंजाब में खालिस्तानियों व उसको हवा दे रहे राहुल गांधी के सहयोगियों के बद-इरादों के बीच जहां केंद्र में मोदी सरकार है, वही पंजाब में कप्तान अमरेंद्र सिंह है।

सिद्धू पाकिस्तान, एक भारतीय की हैसियत से नहीं बल्कि एक पंजाबी की हैसियत से गये है। यह पंजाबियत से भारतीयता को अलग करना, उनका खतरनाक चुनाव है जो खालिस्तानियों के रास्ते, सिद्धू को सिर्फ देशद्रोह के रास्ते पर ले जाता है।

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर पंजाब में पाकिस्तानी सहयोग से खालिस्तानी अलगाववाद की जो बात होने लगी हैं, उसमें पंजाब की आम आदमी पार्टी मुख्य धुरी है तो कांग्रेस को उससे जोड़ने वाली कड़ी नवजोत सिद्धू है।

आप लोग एक बात समझ लीजिए कि 4 दशकों बाद, पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद की शुरुआत, अमृतसर में पाकिस्तानी हैंड ग्रेनेड फेंके जाने से शुरू जो शुरू हो चुकी है और इसमें पाकिस्तान की आईएसआई का सीधा हाथ है, जिसमें दत्तात्रेय गोत्र के सेवक, अपनी राजनीति के लिए पूरा योगदान दे रहे हैं।

पंजाब के मुख्यमंत्री कप्तान अमरेंद्र सिंह ने पाकिस्तान पर पंजाब में हिंसा फैलाने का सीधा आरोप लगाया है और इसी आधार पर करतारपुर कॉरिडोर को लेकर, पाकिस्तान से मिले निमंत्रण को उन्होंने ठुकराया है। उन्होंने यही सलाह सिद्धू को भी दी थी कि उन्हें इस कार्यक्रम में भाग लेने पाकिस्तान नहीं जाना चाहिए लेकिन सिद्धू चले गए है।

वहां पहुंच कर अपने सम्बोधन में राफ़ेल प्रकरण पर बोल कर सिद्धू ने जो हल्कापन दिखाया है, वह इस तरफ इशारा कर रहा है कि शत्रु देश की धरती से भारत के प्रधानमंत्री के विरुद्ध राजनैतिक बयान देना, राहुल गांधी की कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस का शुरू से यह मानना रहा है कि पाकिस्तान की ज़मीन से मोदी सरकार के विरुद्ध बयानबाज़ी, भारतीय मुस्लिमों को कांग्रेस से बांधे रखती है। उसका मुस्लिम वोट बैंक मज़बूत होता है।

आज कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ने नवजोत सिंह सिद्धू को, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के समर्थन से, पाकिस्तानियों के लिए खालिस्तानी मुहिम का एक चेहरा व भारत के विरुद्ध एक कूटनैतिक अस्त्र बना दिया गया है।

मुझको डर इस बात का है कि कहीं सिद्धू की भारतीय राजनैतिक यात्रा का अंत कप्तान अमरेंद्र सिंह जल्दी न कर दे क्योंकि यह अभी हुआ तो सिद्धू की आईएसआई और कनाडा में बैठे खालिस्तानियों के साथ यात्रा, सार्वजनिक रूप से शुरू हो जाएगी, जिसके परिणाम अच्छे नहीं निकलने वाले हैं।

पाकिस्तान में बलूचियों द्वारा चीनी दूतावास पर हमला : एक नई शुरुआत

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY