आपका हथियार अब आपको ही चोट देने लगा, तो लगने लगा बुरा!

बात ज़ात की निकल ही आई है तो बता दें कि ज़ात जन्म से होने वाली चीज़ है और ऐसा हम नहीं कहते, ये सुप्रीम कोर्ट का कहना है!

ज़ात के मसले पर अगर समझदारों वाली बात हो तो सुप्रीम कोर्ट के इस मसले पर दिया गया एक क्रान्तिकारी फैसला जरूर उछाला जाता है।

ज़ात के मसले पर कैलाश सोनकर बनाम श्रीमती माया देवी के इस मुक़दमे पर सोलह दिसम्बर 1983 को फैसला सुनाया गया था। आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले आसानी से इन्टरनेट पर मिल जाते हैं इसलिए इसे ढूंढ कर पढ़ने का शौक रखने वाले चाहें तो शौक फरमा भी सकते हैं। न ये इस तरह का पहला फैसला था, न आखिरी।

इस मुक़दमे में हुआ यूँ था कि माया देवी ने अपने चुनाव का नॉमिनेशन दाखिल करते समय मई 1980 के चुनावों में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीट से पर्चा भरा और खुद को अनुसूचित जाति का घोषित किया था।

इसपर कई लोगों ने आपत्ति जताई कि ये तो ईसाई माता-पिता की संतान है! सिर्फ जय प्रकाश शलवर से विवाह के कारण उन्हें अनुसूचित जाति का नहीं माना जा सकता। रिटर्निंग ऑफिसर ने उनकी एक न सुनी और श्रीमती माया देवी को चुनाव लड़ने दिया। वो जब जीत गयीं तो मामला अदालत तक जा पहुंचा और सुनवाई होने लगी।

कहा गया कि रिलिजन से धर्म में ‘घरवापसी’ पर ज़ात क्यों बदलेगी? निचली अदालतों में हारने के बाद लोग सर्वोच्च न्यायलय जा पहुँचे और वहां भी मुकदमा खारिज़ कर के श्रीमती माया देवी की ज़ात को कायम रखा गया।

अदालत ने कहा कि जब उन्होंने पर्चा भरा तो वो अनुसूचित जाति की ही थीं! अदालत ने कहा कि अगर कोई हिन्दू, ईसाई या किसी ऐसे मज़हब में चला जाता है जो ज़ात नहीं मानता तो ज़ात जाएगी। हाँ, अगर नया मज़हब उसे पारिवारिक कायदे या ज़ात की परम्पराएं मानने दे तो और बात है। जब वो ‘घरवापसी’ कर ले, और पुरानी ज़ात के लोग उसे स्वीकार लें, तो उसे उसकी ज़ात वापस मिल जाती है!

अदालत ने आगे अपने फैसले में ये भी कहा था कि बच्चा जब पैदा होता है तो उसका कोई मज़हब या रिलिजन नहीं होता। बचपन में उसे इतनी समझ भी नहीं होती कि वो कोई चुनाव कर सके।

माता-पिता जो स्वयं ईसाई हैं, वो अगर बपतिस्मा का सर्टिफिकेट ले भी लें तो बच्चा ये समझ ही नहीं सकता कि उसके साथ क्या किया जा रहा है। वयस्क होने पर उसे बचपन में लिए गए बपतिस्मा के सर्टिफिकेट से तो नहीं बाँधा जा सकता। ये चुनाव उसके हाथ में होगा कि वो कौन सा धर्म अंगीकार करता है। ऐसे में अगर वो अपना पुराना ‘धर्म’ चुनता है तो उसकी पुरानी ज़ात उसे अपने आप ही मिल जायेगी।

ईसाई या कोई अन्य ऐसा मज़हब चुनने से उसकी ज़ात पर ग्रहण लग जाता है और वापस आते ही ये ग्रहण छंट जाता है। फैसले में बाकायदा एक्लिप्स (Eclipse) शब्द का इस्तेमाल हुआ है इसलिए मुझे कोई दोष न दें।

ऐसे दूसरे बड़े फैसले जी. एम. अरुमुगम बनाम राजगोपाल एवं अन्य (1975) और चतुर्भुज विथाल्दास जसानी बनाम मोरेश्वर पारसराम और अन्य (1954) भी हैं।

एक मुक़दमे का सन्दर्भ दूसरे मुक़दमे में मिलना बड़ी आम बात है इसलिए एक तक भी पहुँच गए तो कई मिल जायेंगे। आपने अगर आज तक ऐसे मुकदमों और ज़ात पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बारे में नहीं सुना तो वो सिर्फ इसलिए क्योंकि आप चुनावों पर नज़र नहीं रखते। हर चुनाव में ऐसे मुक़दमे होते हैं।

बाकी जो ये कहने आये हैं कि राजनीति का क्या स्तर “हो गया है” उन्हें बता दें कि ये हमारी शुरू की हुई हरकत नहीं, इस ज़ात और गोत्र के स्तर की राजनीति तो आप पचास साल पहले से खेलते आये हैं। हाँ बुरा इसलिए लग रहा हो क्योंकि आपका हथियार अब आपको चोट देने लगा हो, तो और बात है।

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