सक्तुकः से बना सत्तू

नाई जाति को हमारे यहां बहुत चतुर बताया जाता है। बीच जंगल में पण्डित और नाई की भेंट हुई। पण्डित के पास सत्तू था, जबकि नाई के पास आटा और दाल था।

नाई ने कहा – कहां पण्डित जी, सत्तू के फेर में पड़े हो। सत्तू में पानी मिलाना पड़ता है। नमक मिलाना पड़ता है। फिर उसकी पीड़ी बनानी पड़ती है। तब कहीं जाकर खाने को मिलता है। मेरे पास आटा और दाल है। चट रोटी पट दाल, तोड़ो रोटी खाओ दाल।

आप इसे ले लो। आपके लिए आसानी रहेगी। पण्डित जी नाई के झांसे में आ गये। उन्होंने उसका आटा दाल ले लिया। अपना सत्तू नाई को दे दिया। नाई ने फटाफट सत्तू का आहार किया। अपने गंतव्य की तरफ चल पड़ा। पण्डित जी ने लकड़ी जुटाई। आटा गूंथा। रोटी पकायी। लोटे में दाल पकाई। धुएं से आंख लाल हो गयीं। नाक से पानी आने लगा। तब जाकर वे कलेऊ जिमने बैठे। पण्डित जी को पता नहीं था कि सत्तू विश्व का पहला फास्ट फूड है। सत्तू मन मत्तू, झट घोले पट खाय।

सूरज जिस दिन मेष राशि में प्रवेश करता है तो उस दिन को मेष संक्रांति कहा जाता है। पूर्वांचल में मेष संक्रांति के दिन सत्तू का पर्व मनाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में “सतुआन” कहा जाता है।

सतुआन के दिन लोग गंगा स्नान करते हैं। चना, जौ और मकई का सत्तू दान करते हैं। सत्तू का भोग लगाया जाता है। चना और जौ का सत्तू गुड़ में मिलाकर प्रसाद के रुप में खाया जाता है।

सत्तू अधिकत्तर गर्मियों में खाया जाता है। इसके खाने से लू नहीं लगती। जिन लोगों को पेट की बीमारी होती है, वे सुबह सुबह खाली पेट सत्तू का शरबत पीते हैं। दक्षिण कोरिया की नागरिक ग्रेसली आज से बीस साल पहले भारत के बिहार प्रदेश में अपने पति के साथ आयी थीं। उनके पति का पेट खराब रहता था। किसी ने उन्हें सत्तू का शरबत पीने की सलाह दी। सत्तू के शरबत से ग्रेसली के पति का पेट बिल्कुल ठीक हो गया है। इस बात से ग्रेसली ने भारत में हीं रुकने का निर्णय लिया। वे बिहार में ही रहने लगीं। आज वे सत्तू का एक बड़ा करोबार कर रही हैं। उनका सत्तू दक्षिण कोरिया में 500/- किलो तक बिक रहा है।

सेवानिवृत जज श्री काटजू को क्रानिक एसिडिटी है। वे भी सत्तू का शरबत पीते हैं। लालू यादव अक्सर उनके लिए सत्तू भिजवाते रहते हैं। राजस्थान में कजली तीज के दिन महिलाएं सत्तू खाकर अपना व्रत तोड़ती हैं। सत्तू खाने से खूनी बवासीर में राहत मिलती है। श्वेत प्रदर में सत्तू खाने से रोग जल्दी ठीक होता है।

सत्तू में रेशे होते हैं जो पुराने से पुराने कब्ज को दूर करते हैं। सत्तू में प्रोटीन, स्टार्च, कार्बोहाइड्रेट और खनिज होता है। यह एक तरह का सम्पूर्ण आहार है। इससे बहुमूत्रता और शूगर की बीमारी कंट्रोल करने में मदद मिलती है।

चने के सत्तू में अलसी का पावडर मिलाकर मरहम तैयार किया जाता है, जो पुराने से पुराने घाव को ठीक कर देता है। हमारे पूर्वांचल में सत्तू को आटे में स्टफ कर लिट्टी तैयार की जाती है, परांठे भी बनाए जाते हैं। सत्तू की बर्फी व लड्डू भी बनते हैं। ब्रज क्षेत्र में कृष्ण मंदिर में 56 भोगों में से एक भोग सत्तू का भी होता है।

सत्तू भारत के लगभग हर प्रांत में मिलता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों ने पूरे भारत में फैलकर सत्तू का बहुत ही प्रचार किया है। ये लोग इसे सतुआ या सातु कहते हैं। उत्तराखण्ड में भी सत्तू खाने की परिपाटी है। लेह लद्दाख क्षेत्र में भी जौ के सत्तू के साथ छंग (शराब) पीने का चलन है। कवि उपेन्द्र ने लिखा है –

मैंने राजा गेपंग से मांगी,
ओढ़ने के लिए भेंड़ की खाल
खाने के लिए भेंड़ का मांस,
और स्वाद के लिए जौ का सत्तू
और मस्ती के लिए,
छंग से भरा गिलास।

कश्मीरी लोग सत्तू को “सोतु” और सिंधी “सोंतु” कहते हैं। बंगाल, आसाम और उड़ीसा में इसे “छातु” कहते हैं। वैसे सत्तू को प्राचीन काल में सक्तुकः कहा जाता था। सक्तुकः शब्द का सफर संस्कृत से होता हुआ पाली और प्राकृत भाषाओं के ऊबड़ खाबड़ रास्तों से गिरता पड़ता आज अंतिम पड़ाव पर आ पहुंचा है। आज इसे सत्तू कहते हैं।

– Er S D Ojha

अनीता की रसोई से : तंदूरी ट्विस्ट के साथ वेज मोमोज़

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