विषैला वामपंथ : फेमिनिज़्म और कुछ नहीं, स्त्रियों के हिस्से का कम्युनिज़्म है

वामपंथियों की न्यायिक व्यवस्था में घुसपैठ अब जग ज़ाहिर है। आखिर न्यायपालिका को हर बात में घुसने की खुजली क्यों है?

समाज संचालन में न्यायिक व्यवस्था का एक सीमित रोल होना चाहिए। वह होना चाहिए कनफ्लिक्ट रेज़ोल्यूशन का।

अगर दो व्यक्तियों में विवाद उत्पन्न हो तभी कोर्ट कचहरी बीच में आएगी ना। कोई किसी का कुछ लूट ले, छीन ले, कोई किसी को मार पीट दे तो कानून-पुलिस का कोई मतलब है।

अगर मुझमें और मेरे भाई में संपत्ति विवाद हो तो कोर्ट जाने की नौबत आएगी। कोर्ट संपत्ति पर फैसला दे सकती है, पर मेरे भाई से मेरा संबंध तो नहीं सुधार सकती।

उससे पहले यह दो भाइयों के बीच संबंधों की विफलता होगी कि कोर्ट जाना पड़ जाए। पर यह कोर्ट का सरदर्द नहीं होना चाहिए कि वे खुद ब खुद, ‘सुओ मोटो’ (suo moto)आकर हमारे बीच दखल दें।

पर आज यही हो रहा है। कानून का काम विवाद सुलझाना नहीं, विवाद खड़ा करना हो गया है। हमने यह क्लीशे बहुत बार सुना है कि ‘कानून का शासन’ ही सभ्य समाज का तरीका है। पर मैं कहूँगा, ‘कानून का शासन’ असभ्य समाजों की आखिरी कोशिश है… सभ्य समाज तो स्वशासित होते हैं। कानून सभ्यता नहीं है। यह सभ्यता की विफलता है, प्लान B है।

पर अगर कानून खुद ही कहीं घुस रहा है तो इसे बिल्लियों के बीच घुसा बंदर समझिये। अब रोटी का क्या होगा, यह आप पहले ही सुन चुके हैं।

कल मैंने बात की कि हमारे देश में कानून स्त्रियों के स्वास्थ्य की चिंता कर रहा है, और सुहृद सुधीजन इस मामले में कानून बनाने पर चर्चा कर रहे हैं। तो मैं क्या मानूँ कि इन कानूनविदों की नीयत में खोट है?

हो सकता है, ना हो… पर अक्सर अच्छी नीयत वाले ही ‘रक्षा में हत्या’ करते हैं। किसी की नीयत में झांकने की सुविधा ना हो तो परिणामों को देख लीजिए। क्या परिणाम होंगे, यह जानना हो तो उन देशों को देख लीजिए जहाँ ये प्रयोग पहले किये गए हों।

स्त्री-उत्पीड़न की कथा कहने का काम बहुत पहले शुरू हुआ, पर इसके सामाजिक परिणाम अमेरिकी समाज में 1960 के दशक में दिखाई देने प्रारंभ हुए।

अमेरिकी नारी मुक्ति आंदोलन, या विमेन्स-लिब के बहुत सारे आयाम हैं, पर मूल सूत्र है पितृसत्तात्मक समाज का विरोध। तब से ‘पितृसत्ता’ शब्द एक गाली की तरह प्रयोग होता है और हम इससे मुँह चुराने लगे हैं।

यहाँ ये लिबरल तत्व कुछ यह कहते सुनाई पड़ रहे हैं कि यह पितृसत्तात्मक समाज स्त्रियों की सभी समस्याओं की जड़ है। यानि पुरुष अपनी किन्ही मूलभूत दानवी प्रवृत्तियों की वजह से स्त्रियों का उत्पीड़न करते हैं, उन्हें स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों से वंचित रखते हैं और उन्हें यह देना भी नहीं चाहते जब तक उन्हें बाध्य ना किया जाए…

अगर मैं इसे व्यक्तिगत आरोप समझूँ तो इसका अर्थ हुआ कि मैं अपनी बेटी को स्वास्थ्य और उपचार की सुविधाएं नहीं देना चाहता। क्यों? क्योंकि मैं किसी क्रूर, अमानवीय पुरुषवादी भावना से ग्रस्त हूँ। और यह आप पर भी लागू होता है यदि आप पुरुष हैं। और यदि आप महिला हैं तो आपके पिता, पति, भाई पर भी लागू होता है।

इस उदारवादी प्रगतिशील एक्टिविज़्म की सबसे बड़ी सफलता रही है, स्त्री और पुरुषों के पृथक और विपरीत हितों की व्याख्या। जैसे कि इस केस में यह बताया जा रहा है कि स्त्रियों का स्वास्थ्य स्त्रियों का हित है, और एक पितृसत्तात्मक समाज उनके हितों का विरोधी है।

हाँ, हमारा समाज पितृसत्तात्मक है। तो यह अंतर्निहित रूप से स्त्रीविरोधी हुआ!

पर समाज पितृसत्तात्मक क्यों है? यह हज़ारों वर्षों के साझा सांस्कृतिक अनुभव से निकल कर ही बना है। क्या किसी ने स्त्रियों के सर पर बंदूक सटा कर इस पितृसत्ता की स्थापना की है?

स्त्रियों और पुरुषों ने हजारों, संभवतः लाखों वर्षों में मिलकर यह समाज बनाया है… इसमें दोनों साझेदार रहे हैं। आप कहते हो कि यह सच नहीं है। दोनों साझेदार नहीं हैं। इसमें एक शोषक और दूसरा शोषित है।

तो चलिए, इसे बदल देते हैं। आपको पूरब की तरफ मुँह किया घर पसंद नहीं है तो आप उसे गिरा कर एक घर बनाना चाहते हैं जिसका मुँह पश्चिम की तरफ हो, क्योंकि पूरब वाले घर में दोपहर की धूप नहीं आती… वैसे तो इसका समाधान यह था कि पश्चिम की तरफ एक खिड़की खोल दी जाए पर आपका फैसला है कि आप इसे गिरा कर नया घर बनाएंगे।

अब आप यह जो नया घर बना रहे हैं, इसमें अन्याय और ज्यादतियाँ नहीं होंगी इसकी क्या गारंटी है? इसमें घर का मुँह पश्चिम की तरफ होगा तो पूरब से हवा और धूप कैसे आएगी? बल्कि आप तो पूरब के कमरे में पश्चिम से जाने वाला कोई दरवाज़ा, कोई गलियारा भी बनाने को तैयार नहीं हैं। आप पितृसत्ता को हटा कर मातृसत्ता स्थापित करेंगे तो वह भी उतना ही एकांगी नहीं होगा क्या?

या आपके पास कोई एक डिज़ाइन है… एक खुले हवादार घर का। जिसमें हर तरफ खिड़कियाँ और दरवाजे हों… सामने और पीछे हर भरा बाग हो। एक स्विमिंग पूल और सॉना बाथ भी हो। स्मार्ट लाइटिंग और स्मार्ट सिक्योरिटी हो…

एक ऐसा घर जिसको बनाने का किसी को आईडिया ही नहीं आया था आजतक… आपके पास डिज़ाइन है, और इस बेकार पुराने पितृसत्तात्मक घर को गिरा कर आप वह बनाने वाले हैं… रातों रात।

यूटोपिया… यूटोपिया…

वामपंथ आजतक ऐसे ही यूटोपिया बेचता आया है। और इसका रिकॉर्ड देख लीजिए। इनके पुराने यूटोपियन प्रयोगों को देख लीजिए… क्योंकि फेमिनिज़्म और कुछ नहीं, स्त्रियों के हिस्से का कम्युनिज़्म है।

विषैला वामपंथ : स्त्रियों का स्वास्थ्य और चिरपरिचित विलेन हिन्दू धर्म

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