तब कहां दुम दबाए बैठे थे हिंदुत्व के ‘ये’ ठेकेदार!

24 नवम्बर को लिखे मेरे लेख ‘मोदी-भाजपा के लिए इसलिए राजनीतिक-चुनावी मुद्दा नहीं है राम मंदिर‘… की अगली और अन्तिम कड़ी…

यह भाग लिखना नहीं चाहता था, इसीलिए टाल रहा था। लेकिन वॉट्सऐप मैसेंजर के माध्यम से कई मित्र लगातार पूछ रहे थे कि कब लिखेंगे, क्यों नहीं लिख रहे? ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर में अन्ततः यह भाग आज लिख दिया।

2004 में सत्ता मिलने के साल भर बाद ही देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुलेआम यह ऐलान कर रहे थे कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक है।

सत्ता मिलने के दो साल बाद ही यूपीए सरकार अदालत में हलफनामा देकर एलान कर रही थी कि प्रभु श्रीराम और रामकथा एक गप्प मात्र हैं।

उसी शासनकाल में NCERT की सरकारी पाठ्यपुस्तकों में मां दुर्गा को शराबी, व्यभिचारिणी, भगवान शंकर को बलात्कारी लिखा गया था। ब्रह्मा जी, बजरंगबली जी के लिए भी ऐसे अभद्र अश्लील सम्बोधन थे…

इसी सरकार ने कांची पीठ के निरपराध निर्दोष शंकराचार्य को दीवाली की रात सड़क पर घसीटते हुए गिरफ्तार कर काल कोठरी में डाल दिया था। साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, हिन्दू आतंकवाद उसी सरकार के कुकर्म थे।

उस सरकार के ऐसे कुकर्मों की सूची लम्बी थी। पर एक ज़िक्र बहुत ज़रूरी है। ‘साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी बिल” सरीखा औरँगज़ेबी कानून बनाने के लिए उसी यूपीए सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

इस कानून के अनुसार दंगा होने पर बिना किसी सबूत के, केवल किसी मुस्लिम के मौखिक आरोप के आधार पर उस हिन्दू के बैंक एकाउंट समेत सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर उसको तबतक के लिए जेल भेज दिया जाएगा जबतक अदालत उसे निर्दोष घोषित कर रिहा नहीं कर देगी।

तुगलकी नियम यह था कि कहीं दंगा होने पर यह कानून केवल हिन्दुओं के खिलाफ लागू होगा। मुसलमानों के खिलाफ यह कानून लागू नहीं होगा।

संसद से सडक़ तक केवल भाजपा/ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचण्ड विरोध के कारण ही वो यूपीए सरकार यह औरंगज़ेबी कानून लागू नहीं कर पाई थी। ऐसी सरकार अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिये कितना प्रतिबद्ध, संकल्पबद्ध रही होगी? यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

लेकिन 2009 में जब वही कांग्रेस चुनावी मैदान में उतरी तो 2004 में उसको मिली 142 सीटों की संख्या बढ़कर 206 हो गयी थी? और 2004 में भाजपा को मिली 139 सीटों की संख्या 2009 में घटकर 119 हो गयी थी।

ऐसा क्यों हुआ था?

दिल्ली से लेकर अयोध्या तक गरज रहे हिंदुत्व के ठेकेदारों को यह जवाब देना चाहिए। क्योंकि 2009 में वोट डालने के लिए मतदाता मंगल ग्रह से नहीं आए थे। ना ही पाकिस्तान से आए थे।

अंत में बस यह याद दिला दूं कि 1998 में 3.5% GDP विकास दर की विरासत सम्भाल कर अटल जी ने मई 2004 में 8.9% GDP विकास दर की विरासत मनमोहन सिंह को सौंपी थी।

उनके उस 6 साल के कार्यकाल में ऐसा एक भी कुकर्म नहीं हुआ था जैसे यूपीए के कुकर्मों का उल्लेख ऊपर किया है। लेकिन उस समय भी हिंदुत्व के ठेकेदारों ने अटल जी की उस अल्पमत सरकार की नाक में दम कर दिया था कि ‘मन्दिर बनाओ’, भांति भांति के ताण्डव किये थे।

लेकिन 2004 में अटल जी की उस सरकार को खा-चबा गए वही ठेकेदार यूपीए के शासनकाल में 2004 से 2014 तक दुम दबाए बैठे रहे थे। अयोध्या जाना तो दूर, कभी अयोध्या का ज़िक्र तक नहीं किया इन ठेकेदारों ने।

अटल जी के बाद अब मोदी सरकार को खा जाने, चबा जाने की ज़िद पर अड़े हैं यह ठेकेदार। लेकिन अब ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।

इन ठेकेदारों की ऐसी करतूतों की जड़ क्या है? यह भी लिखूंगा ठोस तथ्यों, तर्कों के साथ।

यह लेख हिंदुत्व के उन फेसबुकिया ठेकेदारों को भी जूतांजलि है जो अपने मोदी विरोध के गुप्तरोग को धर्म के कंडोम से छुपाने की कोशिश करते रहते हैं। इन ठेकेदारों को भी कभी फुर्सत से और तबियत से आईना दिखाऊंगा।

अटल सरकार के खिलाफ अपनाए हथकंडे फिर आज़मा रही कांग्रेस, पर तब नहीं था सोशल मीडिया

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY