रुदाली से बेहतर होगा ये जानना कि हम स्वयं क्या कर सकते हैं

शेक्सपियर का एक नाटक है – मर्चेंट ऑफ वेनिस। उस नाटक ने इंग्लिश को एक मुहावरा दिया है – pound of flesh या (शरीर का) एक पाउंड (वज़न) मांस।

इसका संदर्भ समझना काफी रोचक है और आवश्यक भी। नाटक में इसका बैकग्राउंड कुछ यूं है –

वेनिस शहर में एक सहृदय व्यापारी एंटोनियो (नायक) रहता था जो लोगों की खुले दिल और हाथ से मदद भी करता था। वेनिस में ही एक साहूकार भी रहता था जो यहूदी था। उसका नाम शायलॉक था (खलनायक)। शायलॉक को एंटोनिओ से बहुत खुन्नस थी।

कारण यह था कि शायलॉक सूद का काम करता था और खून चूसने वाले सूद के लिए कुख्यात था। उस जमाने में कर्ज़दारों को केवल कुर्की का ही सामना नहीं बल्कि जेल भी जाना पड़ता था जिसके कारण उनकी साख पूरी खत्म हो जाती थी। लोग डरते थे साहूकारों से और यहूदी साहूकारी और सूदखोरी के के लिए सदियों से कुख्यात रहे।

कहीं न कहीं इसकी भी बड़ी भूमिका रही कि हिटलर जर्मनी में इनके खिलाफ वातावरण बना सका। अस्तु, मूल विषय से भटकाव होगा इसलिए इसका विस्तार फिर कभी।

तो बात यह थी कि शायलॉक एंटोनियो के प्रति अपनी नफरत छुपाता था लेकिन एंटोनिओ को जो उसके प्रति घृणा थी वो उसने कभी नहीं छुपाई। वो शायलॉक को सब के सामने ताने भी मारता था उसके सूदखोरी को लेकर। सूदखोर को जनता से सहानुभूति तो मिलने से रही, इसलिए शायलॉक चुप रहता था लेकिन मन में क्रोध धधक रहा था।

एक दिन दुर्भाग्य से एंटोनिओ को शायलॉक के पास कर्ज़ लेने जाना पड़ा। शायलॉक खुश हुआ लेकिन उसने एंटोनिओ का कोई अपमान नहीं किया। पैसे दिये और कर्ज़ न चुकाने पर एक पाउंड मांस देने की शर्त रखी। एंटोनिओ को विश्वास था कि उसका माल आयेगा और वो कर्ज़ चुका देगा तो वो तैयार हो गया। होनी की बलिहारी थी कि उसका माल लाने वाले जहाज के डूबने की खबर आई।

सब ने मदद करने से किनारा कर लिया और शायलॉक ने कोर्ट में अर्ज़ी लगा दी कि उसे एक पाउंड मांस मिले। कोर्ट ने भी हामी भर दी तो एंटोनिओ भी मजबूरन तैयार हुआ। उसे लगा कि जांघ या कूल्हे का मांस काटेगा, लेकिन शायलॉक ने कहा कलेजे के पास का ही मांस चाहिए।

मंशा साफ थी, न्यायाधीश भी दंग रह गए। उन्होने भी शायलॉक को मनाने की कोशिश की लेकिन उसने एग्रीमेंट पर एंटोनिओ और साक्ष्यों के हस्ताक्षर दिखाये, न्यायाधीश चुप हो गए। शायलॉक छुरा साथ ही लाया था, उसे धार लगाने लगा।

क्लाइमेक्स की घड़ी में एंटोनिओ की प्रेयसी पोर्शिया वकील बनकर खड़ी हुई और उसने दलील दी कि शायलॉक मांस काट सकता है लेकिन रक्त की एक भी बूंद नहीं बहनी चाहिए। एंग्रीमेंट में रक्त बहाने का कोई उल्लेख ही नहीं है इसलिए उस पर सहमति नहीं, रक्त नहीं बहना चाहिए।

शायलॉक को मुंह की खानी पड़ी। बाकी मेरे मुद्दे के लिए क्लाइमैक्स भी महत्व का नहीं है, यहाँ बात करूंगा सहायता के बदले पाउंड ऑफ फ्लेश की। जहां भी सहायता के बदले अप्रत्याशित/ भारी कीमत चुकानी पड़ते है और वसूली जाती है उसे पाउंड ऑफ फ्लेश कहने का प्रघात है।

भारत के इतिहास में जहां भी हिंदुओं ने अपने स्वार्थ के लिए मुस्लिमों से मदद ली है, पाउंड ऑफ फ्लेश ही देना पड़ा है। और यह बात स्वतंत्र भारत में भी उतनी ही सत्य है, नेताओं के लिए वोट बैंक का कर्ज़ हिंदुओं को किस तरह चुकाना पड़ता है यह कई राज्यों में देखने को मिल रहा है।

वैसे जम्मू कश्मीर में मोदी जी ने इसको रिवर्स किया जिसके परिणाम अब दिखाई दे रहे हैं।

पाउंड ऑफ फ्लेश नेता अपना नहीं देते, हिन्दू जनता का देते हैं। इसलिए नेताओं को अगर यह विश्वास होगा कि हिन्दू एकमुश्त उनको सत्ता पर बैठा सकता है – या उठा सकता है – तो हिन्दू अपना पाउंड ऑफ फ्लेश कटवाने से बच जाएगा।

वैसे भी फ्लेश बहुत बचा नहीं है, जो है उसे बचाकर muscle बनाने की ज़रूरत है। कौन क्या कर सकता है या किसको क्या करना चाहिए यह बताकर, वे अपना कर्तव्य निभा नहीं रहे कि रुदाली से यही श्रेयस्कर होगा कि हम स्वयं क्या कर सकते हैं यह जानें। शुरुआत घर से ही करें, माँ बहन, पत्नी बेटी को सस्ता और फ्री होम डेलीवेरी कितनी महंगी पड जाएगी यह समझाएँ। इतना तो कर ही सकते हैं।

मायाजाल ‘निष्पक्ष’ कहलाने का

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