मोदी सरकार का स्पष्ट रुख : Get lost! कोसोवो, हम नहीं जानते तुम्हें

दिल्ली में बॉक्सिंग की विश्व चैंपियनशिप चल रही है और उसमे ढलती उम्र में मैरी कॉम ने स्वर्ण पदक जीता है, इसके लिए उन्हें बहुत बहुत बधाई।

इस विश्व प्रतियोगिता की आड़ में ही एक बहुत बड़ी वैश्विक राजनीति की गई है जिसका बहुतों को ज्ञान नहीं है। खास तौर से उनको बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है जो भावनात्मक रूप से अल्पज्ञानी है और प्रधानमंत्री मोदी के आचरण में आक्रामकता का अभाव देख कर विधवा विलाप में लगे रहते हैं।

अब आते हैं मुख्य बिंदु पर, हुआ यह है कि भारत सरकार ने कोसोवो के एक मुक्केबाज़ को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए वीज़ा नहीं दिया है। मोदी सरकार पर पूरी दुनिया से दबाव पड़ा लेकिन भारत सरकार उनके दबाव में नहीं आई और वीज़ा देने से मना कर दिया गया।

भारत सरकार से यहां तक कहा गया कि अगर कोसोवो के खिलाड़ी को वीज़ा नहीं दिया तो भारत को आगे से किसी भी बड़े खेल की प्रतियोगिता का आयोजन (जैसे ओलंपिक्स, विश्व चैंपियनशिप, एशियाई गेम्स) करने को नहीं दिया जाएगा।

इस धमकी के बाद भी मोदी सरकार ने विश्व के बड़े देशों की बात मानने से इनकार कर दिया और संदेश भेज दिया कि भले ही भारत को भविष्य में इस तरह के आयोजनों को करने का मौका नहीं मिले लेकिन भारत, कोसोवो को मान्यता नहीं देगा।

आखिर ऐसी क्या बात है कि भारत की सरकार ने कोसोवो के खिलाड़ी को वीज़ा नहीं दिया?

इसको समझने के लिए हमें यूगोस्लाविया के विघटन की तारीख पर जाना पड़ेगा लेकिन कम शब्दों में समझा जाये तो यह समझिये कि यूगोस्लाविया के विघटन के बाद उदय हुये राष्ट्र सर्बिया का एक हिस्सा है कोसोवो।

सर्बिया एक ईसाई राष्ट्र है लेकिन कोसोवो में 97% मुसलमान रहते है। अब जिस इलाके में इतनी भारी संख्या में मुसलमान रहते हों तो उनसे तो यह उम्मीद करना बेमानी है कि वे शेष जनसँख्या के साथ मिल जुल कर रह सकें तो उन्होंने आज़ादी की रट लगा दी और 2008 में कोसोवो ने अपने आपको एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।

अब क्योंकि सर्बिया, रूस का मित्र राष्ट्र है इस लिए अमेरिका ने अपने सहयोगी राष्ट्रों के साथ उसको मान्यता दे दी। कोसोवो को समस्त इस्लामिक राष्ट्रों के साथ योरप के कुछ राष्ट्रों ने भी, आनन फानन में मान्यता दे दी।

यह तो बात हुई मान्यता देने वाले राष्ट्रों की लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि किन राष्ट्रों ने मान्यता नहीं दी है। भारत ने नहीं दी है और उसके साथ ही ब्रिक्स (BRICS) राष्ट्रों ने नहीं दी है, जिसमे चीन रूस जैसे राष्ट्र शामिल हैं।

अब जब कि दिल्ली में विश्व चैंपियनशिप हुई तो कोसोवो ने कहा हमारी मुक्केबाज़ भी लड़ेगी, लेकिन मोदी सरकार ने कहा कि आप कौन? भारत कोसोवो को नहीं जानता। खेलने आना है तो सर्बिया से आओ, उसको हम पहचानते हैं।

आखिर भारत कोसोवो को क्यों नहीं पहचानता है? क्यों मान्यता नहीं देता है? इसका कारण बड़ा सीधा है। आज जो मांग कोसोवो की है, वही मांग तो कश्मीर के मुसलमानों की है! कल इसी तरह कश्मीरी भी मुंह उठा के बोल दें कि हम स्वतंत्र हैं तो चीन पाकिस्तान तो एक मिनट में ही काश्मीर को एक अलग नए राष्ट्र के रूप में मान्यता दे देंगे और इस्लामिक राष्ट्रों से मान्यता मिलते देरी भी नहीं लगेगी।

आखिर 1984 में क्या हुआ था अमृतसर में?

तत्कलीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 2 जून को एक गुप्त संदेशा आया कि भारत की सरकार यहां सो रही है वहां खालिस्तान की घोषणा होने जा रही है, जिसको पाकिस्तान, अफगानिस्तान और कुछ अन्य इस्लामिक राष्ट्र मान्यता देने जा रहे हैं।

यह सन्देश मिलते ही इंदिरा गांधी की तन्द्रा टूटी और उन्होंने आनन फानन में तीन दिन में सेना को भेजा और अकाल तख्त को खाली करवाया। यह आपरेशन ब्लूस्टार था और इसके साथ पूरे पंजाब में कर्फ्यू लगा दिया गया। इस कड़ी कार्यवाही के बाद ही पंजाब की स्थिति संभाली थी। (ज़्यादा जानने के लिए जनरल के एस बरार की किताब पढिये)।

एक तरफ कनाडा में बैठे खालिस्तानी 2020 में रेफरेंडम कराने की मांग कर रहे हैं और दूसरी ओर काश्मीर की घाटी से भी यही मांग बार बार उठती है। अब कल कोई इलाका अपनी तरफ से खुद को स्वतंत्रत घोषित कर दे और उसे 3-4 राष्ट्र मान्यता दे दें तब?

अब ऐसे में भारत कैसे कोसोवो को मान्यता दे दे? इसलिए तमाम कूटनैतिक दबाव पड़ने के बाद भी भारत ने कोसोवो के होने को नहीं स्वीकार किया है। भारत से यह भी कहा गया कि कोई मध्यमार्ग निकाला जाए लेकिन भारत ने इस विषय पर कोई भी वार्ता करने से ही इनकार कर दिया।

भारत से चीन का अनुसरण करने को भी कहा गया, जैसे चीन, जम्मू काश्मीर को एक डिस्प्यूटेड टेरिटरी (विवादित क्षेत्र) मानता है और कश्मीर के भारतीय नागरिक को स्टैपेल्ड वीज़ा देता है। भारत ने इस विकल्प को भी अस्वीकार कर दिया और मोदी ने अंतराष्ट्रीय समुदाय को स्पष्ट कर दिया कि भारत सर्बिया-कोसोवो को डिस्प्यूटेड टेरिटरी ही नहीं मानता है। यदि खेलने के लिये भारत आना है तो सर्बिया के झंडे के नीचे आओ नहीं तो हम तुमको नहीं पहचानते है।

अब ज़रा आप अपने भारत के अंदर दृष्टि घुमाइये, आपको नये स्वर, नये नारे सुनाई देंगे। दशकों से समाप्त खालिस्तान का नारा फिर लगने लगा है और इस बार यह कश्मीरी अलगाववादियों की ताल के साथ लग रहा है।

कश्मीर की घाटी की तरह खालिस्तान आंदोलन को भी भारत के कुछ राजनैतिक लोग अपने स्वार्थ में हवा दे रहे है। इस वक्त पंजाब में खालिस्तानियों को हथियार व लॉजिस्टिक, कश्मीर की घाटी के अलगावादियों से मिल रहा है और यह बहुत बड़ा कारण था जिसके लिये जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया है।

भारत की केंद्र सरकार को यह खबर लग गयी थी पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस का कांग्रेस के साथ जम्मू कश्मीर में सरकार बनने से कश्मीर की घाटी के साथ पंजाब में हालात बिगड़ जाएंगे।

भारत की सरकार को इस तरह की सूचना मिल गयी थी, सरकार बनने के बाद पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जम्मू कश्मीर की विधानसभा में ऐसा कोई प्रस्ताव पास कर सकते है जिससे जम्मू कश्मीर की यथास्थिति को अंतराष्ट्रीय स्तर पर फिर विवादित किया जा सकता है या फिर पाकिस्तान द्वारा अनाधिकृत कश्मीरी हिस्से के साथ, कोसोवो के तर्ज पर स्वतंत्र होने का प्रस्ताव आ सकता है।

इसी लिए भारत पर तमाम दबाव पड़ने के बाद भी, मोदी सरकार अपनी नीति में टस से मस नहीं हुई और अंतराष्ट्रीय समुदाय को स्पष्ट सन्देश दे दिया कि हम कोसोवो को नहीं जानते और साथ में खालिस्तानी व कश्मीरी अलगावाद के तत्वों को भी सन्देश दे दिया कि हम तुमको भी नहीं मानते।

भारत की संप्रभुता व अखंडता का रक्षा कवच हैं मोदी सरकार की चीन केंद्रित नीतियां

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