25 नवंबर 2018 : भारत व हिंदुत्व के लिए एक मील का पत्थर

आज भले 25 नवंबर 2018 की तारीख को इतिहास में कोई बड़ी तारीख के रूप में नहीं माना जायेगा लेकिन मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण तिथि रहेगी।

यह भले ही भविष्य के इतिहासकारों के लिए कभी भी मील का पत्थर नहीं होगी लेकिन मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से ज़रूर रहेगी।

ऐसा मैं क्यों कहा रहा हूँ? क्या इसलिये कि कल अयोध्या में, राम मंदिर के लिए हिन्दुओं का विशाल जनसमूह इकट्ठा हुआ था? क्या वहां पहुँचा हर राम भक्त मंदिर बनने की शुरुआत की तिथि निकाल कर आया था?

मैं इन किसी भी कारण से इस तिथि की नहीं याद रखूंगा। मैं याद इसलिये रखूंगा क्योंकि जब परम कट्टर हिंदूवादी/ राष्ट्रवादी मित्र राम मंदिर पर विधवा विलाप कर चूड़ियां नरेंद्र मोदी के सर पर तोड़ते थे, तब इन मोदी विरोधी राम विचारकों, हिंदुत्व के बुद्धिजीवियों और कुरान व हदीस के ज्ञाताओं को यही कहता था कि 2017 के बाद का इंतज़ार करो, क्योंकि मोदी आपकी प्राथमिकता से नहीं बल्कि भारत के लिए बनाई अपनी प्राथमिकता की समयसारणी से चलेंगे।

इसके साथ यह भी लिखता रहा हूँ कि 2018 गेम चेंजर होगा और तमाम अंधकार दिखते हुये भी कहानी बदल जाएगी।

बस, भविष्य का आंकलन करती अपनी इसी लेखनी के कारण मेरे लिए कल की तिथि महत्वपूर्ण है। 25 नवम्बर का दिन राम मंदिर, हिंदुत्व व भारत की अस्मिता के लिए दिशा निर्देश का दिन है। कल ऐसा कुछ भी ऐसा नहीं हुआ है जो वर्षों पहले निर्धारित नहीं किया जा चुका था।

आज अयोध्या में संतों के समागम के साथ बंगलुरू व नागपुर में हुआ जमावड़ा, हिंदुत्व का क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व था और यह जो हुआ वह मोदी सरकार पर राम मंदिर बनवाने का दबाव बनाने के लिए नहीं हुआ है बल्कि मोदी सरकार को सर्वोच्च न्यायालय की हठधर्मिता व हिन्दू बहुसंख्यकों की भावनाओं को कुचलने की प्रवृत्ति पर कुठाराघात करने का अवसर प्रदान करने के लिए स्वयं पर बनवाया गया दबाव था। यह हिन्दू जनसमुदाय को घर से निकल, सार्वजनिक रूप से अपनी अभिव्यक्ति प्रगट करने के लिए उत्प्रेरित करना था।

आज जहां एक तरफ अयोध्या में संत समाज, सार्वजनिक रूप से मंच पर यह बोलता है कि 11 दिसम्बर के बाद, मोदी सरकार, राम मंदिर बनवाने के लिये सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा के विकल्प का रास्ता चुनेगी।

नागपुर में आरएसएस के सरसंघचालक परम पूजनीय मोहन भागवत बोलते हैं कि एक वर्ष पहले उन्होंने राम मंदिर पर लोगो को धैर्य रखने को बोला था, वह आज वापस लेते हैं और लोगों को अपनी भावना का प्रदर्शन करना चाहिए।

और वहीं नरेंद्र मोदी चुनावी भाषण में पहली बार राम मंदिर पर बोलते हैं और सीधा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर ब्लैकमेल होने की टिप्पणी करते हैं।

यह कोई संयोग नहीं है। यह सब पूर्वनिर्धारित रणनीति का प्रकटीकरण है।

मुझको भले ही राम मंदिर को लेकर तिथिवार, मोदी द्वारा उठाये जाने वाले कदमों का ज्ञान न रहा हो लेकिन मुझको, मोदी विरोधी कट्टर हिंदूवादियों की विक्षिप्तता के विपरीत, मोदी के राजनीतिक कौशल और उनकी राष्ट्र, हिंदुत्व व राम मंदिर के प्रति निष्ठा पर कोई संदेह नहीं रहा है।

उनके अपने ध्येय के प्रति समर्पण से ही मुझे यह अगाध विश्वास था कि उनकी व आरएसएस की सामूहिक रणनीति 2018 के अंत के आते तक, पांसा पलट देगी।

यदि बिना भावना में बहे पूर्व की घटनाओं व निर्णयों पर विचार करें तो राम मंदिर बनने की पृष्ठभूमि मार्च 2017 में ही तैयार हो गयी थी जब रातों रात, मनोज सिन्हा की जगह योगी आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया था।

इस सबके साथ इसका भी आभास था कि जब राम मंदिर बनने की परिणति सामने आते दिखेगी तो एक से एक रंगे सियार, उसका श्रेय लेना शुरू कर देंगे।

मैं देख रहा हूँ कि ममता बनर्जी, हार्दिक पटेल जैसों से गलबहियां करने वाले, सबरीमला को भूले, शिव सेना के उद्धव ठाकरे, जो योगी-मोदी राज में ही अयोध्या आने की हिम्मत कर पाये हैं व स्वयं सुब्रमण्यम स्वामी ने टीवी और सोशल मीडिया पर हुआं हुआं शुरू कर दी है।

लोगों को इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये, जब मोदी न्यायालय से परे जाकर किसी विकल्प को अस्त्र बनायेंगे, तब मोदी विरोधी कट्टर हिंदूवादियों द्वारा अपने अहंकार में इसे मोदी पर उनके दबाव का फल मानेगे।

मेरी इस सब सोच के पीछे कारण यही है कि जितना अव्यवहारिक मैं इन कट्टर हिंदूवादियों को समझता हूँ, उतना ही मोदी व भागवत भी उन्हें यही समझते है।

जो वर्ग, केवल अपनी भावना व अपने ज्ञान से अभिभूत होकर, वर्तमान भारत की कलुषता की सत्यता का सामना न कर के, केवल एकल दिशा पकड़े, नेतृत्व को हर पाक्षिक, नाकारा और नालायक घोषित करने पर आत्मगौरव को महसूस करता हो, उस वर्ग के रास्ते केवल आत्महत्या की ओर जाते हैं, यह उनको मालूम है।

यह 25 नवम्बर 2018 का दिन सिर्फ राम मंदिर बनाने के रास्ते को प्रकाशमय करने का ही दिन नहीं है बल्कि न्यायपालिका द्वारा संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से परे जाकर हिंदुत्व की आत्मा पर कुठाराघात करने की प्रवृत्ति को चुनौती देने वाला भी दिन है।

यह याद रखियेगा कि आज से लेकर 2019 में लोकसभा के चुनाव तक, इतनी सारी घटनाओं को जन्म दिया जायेगा, जो न केवल भारत, एक राष्ट्र की दिशा निर्धारित करेंगी बल्कि हिंदुत्व की अस्मिता को स्थायित्व प्रदान करेंगी।

मुल्लाजी आप बहुत हैं मूरखजी..!!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY