हमारा दायित्व है 65,000 वर्ष पुरानी सभ्यता के लोगों का संरक्षण

जब कोई विदेशी भारत घूमने आता है तो उसे कुछ प्रतिबंधित क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है, जिसे Restricted Area Permit (RAP) कहा जाता है।

भारत सरकार ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह को जून 2018 में RAP की लिस्ट से बाहर कर दिया था परन्तु वनवासी जनजातीय क्षेत्रों (Tribal Areas) में जाने पर प्रतिबंध यथावत हैं।

चूँकि नॉर्थ सेंटिनेल द्वीप भी ट्राइबल एरिया घोषित है अतः वहाँ भी ANPATR के अंतर्गत (पिछला लेख देखें) तथा इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927 के अंतर्गत बिना अनुमति प्रवेश वर्जित है।

जॉन एलन चाऊ यह सब जानता था, इसके बावजूद उसने कुछ मछुआरों को 25,000 रुपए देकर मनाया और 14 नवम्बर को रात में 8 बजे चोरी से नॉर्थ सेंटिनेल द्वीप के लिए निकला। सुबह तट पर पहुँचने के पश्चात मछुआरों ने लौटकर मिलने का स्थान निश्चित किया और चाऊ को नॉर्थ सेंटिनेल द्वीप पर छोड़कर चले गए।

नवम्बर 17 को प्रातःकाल मछुआरों ने तट पर किसी व्यक्ति को दफनाये जाते हुए देखा जिसके कपड़ों और सामान से प्रतीत हुआ कि वह चाऊ ही था जिसे दफनाया जा रहा था।

अंडमान निकोबार पुलिस के आधिकारिक प्रेस रिलीज़ में उन मछुआरों का नाम भी दिया है जिन्होंने चाऊ को नौसेना तथा कोस्टगार्ड की निगरानी से बचा कर नॉर्थ सेंटिनेल द्वीप तक पहुंचाया। जॉन चाऊ इससे पहले भी एक बार सेंटिनेल द्वीप का दौरा कर चुका था।

इस प्रकरण से ईसाई मिशनरियों के खतरे की गम्भीरता को समझने की आवश्यकता है। जो व्यक्ति सात समुंदर पार से आकर प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने के लिए 25,000 रुपए खर्च कर सकता है वह भी उन लोगों को मतांतरित करने के लिए जिनकी संख्या 2001 में महज 39 थी (आज कितनी है पता नहीं!) वह क्या नहीं कर सकता?

मूल विषय से भिन्न एक उदाहरण देता हूँ। मैं कुछ दिनों से जम्मू कश्मीर राज्य के वाल्मीकि समुदाय के लोगों पर एक शोधकार्य कर रहा हूँ जिनकी समस्या अनुच्छेद 35A को लेकर है। शोध के लिए मैंने पुस्तकों के अतिरिक्त ऑनलाइन डेटा जमा करना भी प्रारंभ किया।

नेट पर खोजते हुए मुझे जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट मिली जिसपर वाल्मीकि समुदाय के लोग भारत में कहाँ-कहाँ कितनी संख्या में रहते हैं इसका पूरा डेटा दिया है साथ यह भी लिखा है कि उन लोगों का हिन्दू धर्म से ईसाई मत में मतांतरण करना है क्योंकि यह उनकी ‘प्रमुख आवश्यकता’ है।

अर्थात मिशनरी अपने समक्ष एक चुनौती लेकर चलता है कि उसे इतने लोगों को मतांतरित करना है और उन्हें उनकी मूल संस्कृति और परम्पराओं से च्युत कर देना है। इसी कार्य का बीड़ा उठाये चाऊ सेंटिनेल द्वीप पर गया था।

अंडमान निकोबार द्वीप समूह भारत से किसी भी तरह भिन्न नहीं है। आश्चर्य नहीं कि ‘हनुमान’ से अंडोमान होकर फिर उससे अंडमान शब्द निर्मित हुआ। अंडमान निकोबार द्वीप समूह चेन्नई से लगभग 1200 किमी दूर है इसलिए भारत की मुख्य भूमि पर रहने वाले लोगों को अंडमान निकोबार के वनवासियों का गाहे बगाहे उपहास करने का मौका मिल जाता है।

परन्तु तथ्य यह है कि अंडमान के निवासी और भारत की मुख्य भूमि पर रहने वाले लोग जेनेटिकली समान हैं (देखें: Indica- A Deep Natural History of the Indian Subcontinent by Pranay Lal, 2016).

प्रश्न है कि ये लोग दक्षिण भारत से इतनी दूर द्वीप पर पहुँचे कैसे? प्रणय लाल लिखते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व वे समुद्र में लकड़ी की नाव पर लम्बी यात्रायें करते होंगे। सम्भव है कि बंगाल की खाड़ी में उपजे किसी समुद्री तूफान में बहकर वे ज्वालामुखी से बने सुंदर अंडमान द्वीपों तक पहुंच गए हों। तब से वे वहाँ रह रहे हैं और उन्हें बाहरी दुनिया के विकास की कोई जानकारी नहीं है।

यहाँ तक कि हमारे शरीर में रोगों के प्रति जितनी प्रतिरोधक क्षमता है उतनी अंडमान निकोबार के वनवासियों में नहीं है। हम उनके पास जाकर उन्हें अपनी बीमारियाँ दे सकते हैं। और उनकी संख्या इतनी कम है कि यदि 10-20 लोगों को हमारे द्वारा जुकाम भी हो गया और वे नहीं झेल पाए तो इस धरती से 50-65,000 वर्ष पुरानी सभ्यता के लोग विलुप्त हो जाएंगे। इसलिए उनका संरक्षण हमारा दायित्व है।

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