इस युग को आवश्यकता है अपने एक दयानन्द सरस्वती की

Maharshi Dayanand Saraswati - pencil shading by Aaryaa Gambhava

पिछले दिनों सत्यार्थ-प्रकाश पढ़ रहा था। अद्भुत है। बार बार पढ़ने पर हर बार अर्थ को विस्तार मिलता है।

पढ़ने के दौरान कई प्रश्न मन में उठते हैं, इन्हे प्रश्न ही कहूंगा, शंका नहीं, क्योंकि शंका में शक होता है, और वेद की जो भी व्याख्या हो उस पर किसी भी तरह के शक के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता।

हाँ, दुविधा हो सकती है और इस दुविधा को दूर करने के लिए ही प्रश्न पूछे जाते हैं, और फिर मेरे पास अपने प्रश्न के समर्थन में अनेक सार्थक तर्क भी होते हैं।

काश स्वामी दयानन्द जीवित होते तो उनसे तर्कपूर्ण प्रश्न करता और मुझे विश्वास है कि वे उसका समाधान भी उसी तरह करते जिस तरह उन्होंने अनगिनत सवालों के विस्तृत जवाब दे कर किये हैं।

उनकी अनुपस्थिति में क्या मैं अपने सवाल पूछ सकता हूँ? नहीं। इसके जवाब की जगह वर्तमान में यह वाद-विवाद का विषय अधिक बन जाएगा।

ना जाने हम शास्त्रार्थ की स्वस्थ परम्परा कब पीछे छोड़ आये। शायद इसके लिए हम कम जिम्मेवार हैं, यह अन्य आधुनिक पंथ सम्प्रदाय और मज़हब की देन है, जहां सवाल पूछने की आजादी नहीं।

जबकि सनातन जीवन संस्कृति में इसकी पूरी स्वतंत्रता रही आई है। इसमें किसी की जय पराजय जैसा नहीं होता था, बल्कि ज्ञान का वर्धन होता था। यह कुछ कुछ ऐसा है जैसे कि हीरे को तराशा जाए या फिर सोने को तपा कर शुद्ध किया जाए।

ऐसे में जब एक विद्वान मित्र की एक अर्थपूर्ण पोस्ट पढ़ी, जिसमें उन्होंने स्वामी दयानन्द जी के एक शास्त्रार्थ का विस्तृत वर्णन किया। मैं उसे पूरा पढ़ने से स्वयं को रोक नहीं पाया और फिर उसी प्रवाह में प्रतिक्रिया में टिप्पणी भी कर दी थी। सुखद अहसास इस बात का हुआ कि उसे सकारात्मक रूप में लिया गया। जिसे देख कर लगा कि इस पर विस्तार से बात हो सकती है।

इसमें कोई शक नहीं कि स्वामी दयानन्द विद्वान थे। वे धर्मगुरु के साथ साथ समाजसुधारक भी थे। यकीनन सत्यार्थप्रकाश उस काल व समय के लिए आवश्यक था। क्योंकि पंडितों ने मंदिरों में अति कर रखी थी। कर्मकांड के केंद्र में आते ही धर्म व अर्थ और भाव व विचार दूर होने लगते हैं।

मगर यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या यह महान ग्रंथ आज भी अक्षरशः संदर्भित हो सकता है? क्या इसकी आज के परिप्रेक्ष्य में पुनः विवेचना आवश्यक नहीं? ऐसा कहते ही कुछ एक मित्रों को आपत्ति हो सकती है और ऐसा करना उनके अधिकार क्षेत्र में है। यही सनातन की स्वस्थ परम्परा रही आई है।

लेकिन क्या इस सच को भुलाया जा सकता है कि अंतिम सत्य जैसा कुछ नहीं होता। कम से कम सनातन जीवन दर्शन के संदर्भ में तो यह कहा जा सकता है। अगर ऐसा हो तो फिर वो सनातन नहीं रह जाएगा।

जिस वेद का संदर्भ स्वामी जी लिया करते थे उसमें भी नेति नेति ही कहा गया है। अर्थात अंतिम जैसा कुछ नहीं। हर पल परिवर्तनशील सृष्टि में अंतिम जैसा कुछ हो भी नहीं सकता। लेकिन सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने पर वो स्वयं को अंतिम सत्य घोषित करने में प्रयासरत नजर आता है। यह मेरा दृष्टि दोष भी हो सकता है, अगर ऐसा है तो मैं अपने दोष के निवारण के लिए सदा तत्पर रहता हूँ।

दूसरी बात वेद स्वयं ईश्वर के साकार रूप प्रकृति की वन्दना स्तुति करते हैं। सृष्टि ईश्वर का साक्षात और साकार रूप ही तो है, जिसे स्वामी जी भी अपनी तरह से कई स्थानों में कहते हैं। तो फिर वेद मूर्तिपूजक विरोधी कैसे प्रमाणित किये जा सकते हैं?

और फिर यज्ञ भी अग्नि के साकार रूप की पूजा ही तो है। वैसे भी यज्ञ का गहराई से विश्लेषण करें तो वहां भी उसके संदर्भ दूर दूर तक चले जायेंगे जिसमें यह आदिकाल में कृषि से संबंधित होते नजर आने लगते हैं।

सवाल तो कई हैं, मगर एक साथ सबके उठते ही कई महत्वपूर्ण बिंदु अपना ध्यान केंद्रित नहीं करा पाएंगे। बहरहाल, सत्यार्थप्रकाश के पठन-पाठन ने मुझे मनुस्मृति पढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए मैं स्वामी जी की लेखनी का जीवनपर्यन्त आभारी रहूंगा। जिस ख़ूबसूरती से स्वामी जी ने मनुस्मृति का संदर्भ अनेक स्थान पर लिया है वो किसी भी पाठक को इसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

ऐसे में इस महान ग्रंथ के बारे में फैलाई गई अनेक भ्राँतिया दूर होती हैं। मेरे आर्यसमाज के मित्रों का इस ग्रंथ पर बात ना करना मुझे हैरान करता है। वे अनेक बार अपने ही हिन्दू धर्म पर टिप्पणी तो करते हैं, यह उनका वैदिक अधिकार है, लेकिन ये विद्वान मित्र शायद यह भूल जाते हैं कि स्वामी जी ने जिस स्तर की आलोचना ईसाई और इस्लाम की की है वो विश्वइतिहास में किसी ने नहीं की, जबकि सनातन की उन्होंने विश्लेषण और विवेचना ही की है और ऐसा करने से ही हिन्दू धर्म समृद्ध होता आया है।

स्वामी जी को नमन करते हुए सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि इस युग को अपने एक दयानन्द सरस्वती की आवश्यकता है।

शिकारी हमें चारों ओर से घेरे खड़ा है, और हमने काट रखे हैं अपने नाख़ून भी!

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