सांस्कृतिक नस्लभेद और टोंगा का बदला

आर्थर कॉनन डॉयल द्वारा रचित जासूस शर्लक होम्स की कहानियों पर आधारित एक चर्चित उपन्यास है- ‘The Sign of Four’. पुस्तक के रूप में यह उपन्यास सन् 1890 में प्रकाशित हुआ था।

इसकी कहानी कुछ ऐसी है कि जब भारत में ब्रितानी कम्पनी सरकार का राज था तब यहाँ एक अंग्रेज अफसर स्मॉल की तैनाती होती है। एक बार स्मॉल तालाब में तैर रहा होता है तभी मगरमच्छ उसका एक पैर अपने जबड़े में दबोच लेता है जिसके कारण स्मॉल को अपनी वह टांग गंवानी पड़ती है।

अपंग होने के कारण स्मॉल को सेना की सक्रिय सेवा से निवृत्त कर दिया जाता है और उसकी तैनाती आगरा के किले में गार्ड के रूप में कर दी जाती है। जब सन् 1857 में भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम प्रारंभ होता है तब आगरा किले में स्मॉल के साथ तीन सिख गार्ड भी तैनात होते हैं।

आर्थर डॉयल ने इन सिख गार्डों को अपने ही लोगों से गद्दारी करने वाले बर्बर हत्यारे के रूप में चित्रित किया है। कहानी के अनुसार सिख गार्ड स्मॉल की गर्दन पर चाकू रखकर उससे कहते हैं कि यहाँ एक व्यक्ति खजाने से भरा बक्सा लेकर आने वाला है जिसे लूटने में या तो स्मॉल उनकी सहायता करे या मरने को तैयार रहे।

स्मॉल उनकी बात मान जाता है और खजाना लेकर आने वाले व्यक्ति की हत्या में सहभागी बनता है। इसके बाद खजाना चार हिस्सों में बंटता है। कालांतर में यह षड्यंत्र पकड़ा जाता है और स्मॉल सहित तीनों सिखों को अंडमान द्वीप पर आजीवन कारावास की सजा होती है। इस बीच उन चारों द्वारा खजाने से भरा बक्सा कहीं छिपाकर उसका नक्शा बनाकर रख लिया गया होता है।

सजा काटने के दौरान स्मॉल की मित्रता दो अन्य फौजी अफसर मेजर शोल्टो और कैप्टन मोर्स्टन से होती है। स्मॉल शोल्टो और मोर्स्टन से कहता है कि यदि वे उसे जेल से छुड़ाने में सहायता करें तो उन्हें भी खजाने में पाँचवां हिस्सा दिया जा सकता है। इस प्रस्ताव पर शोल्टो और मोर्स्टन सहमत होते हैं और एक एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करते हैं।

उस एग्रीमेंट पर हिंदी में अंक ‘४’ का चिन्ह बनाया जाता है। इसी चिन्ह पर उपन्यास का नाम The Sign of Four रखा गया है। उस एग्रीमेंट पर तीनों सिखों और स्मॉल के भी हस्ताक्षर होते हैं। बाइबल पर हाथ रखकर एग्रीमेंट न तोड़ने की सौगंध खाने के बावजूद मेजर शोल्टो सभी को धोखा देता है और नक्शे की सहायता से खजाना खोजकर और उसे लेकर इंग्लैंड भाग जाता है।

इधर स्मॉल जब अंडमान द्वीप से भागता है तब उसके साथ एक बौना वनवासी भी होता है। स्मॉल उसका नाम रखता है- ‘टोंगा’। इंग्लैंड लौट कर मेजर शोल्टो और उसके पुत्रों से बदला लेने में यही टोंगा लँगड़े स्मॉल के लिए हथियार का काम करता है। टोंगा कद में छोटा लेकिन फूँककर मारे जा सकने वाले जहरीले तीरों से लैस होकर अत्यधिक घातक सिद्ध होता है।

उपन्यास में टोंगा के पात्र का चित्रण एक कुरूप, भयानक किंतु वफादार जानवर की भाँति किया गया है जो हत्यायें करने में माहिर है। उसकी संस्कृति को आदिम नरभक्षी तक बताया गया है।

The Sign of Four की कहानी और लम्बी है जिसे प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग पर पढ़ा जा सकता है और यूट्यूब पर ग्रेनाडा सीरीज़ में भी देखा जा सकता है। यहाँ पूरी कहानी सुनाना मेरा उद्देश्य नहीं। कहानी में भारतीय सिखों और अंडमान के निवासियों का चित्रण जिस प्रकार किया गया है उसे समझना अत्यावश्यक है।

आर्थर कॉनन डॉयल निस्संदेह अच्छे लेखक थे किंतु नस्लभेद उस व्यक्ति की मानसिकता में कूट-कूट कर भरा था। उस जमाने के सभी अंग्रेजों में यही भावना थी कि भारतीय जाहिल गंवार और नीची नस्ल के होते हैं।

शर्लक होम्स के चरित्र पर आधारित अन्य कहानियों में भी यही परिलक्षित होता है। उदाहरण के लिए Speckled Band कहानी में एक बाप भारत से लाये साँप की सहायता से अपनी बेटी की हत्या करता है।

एक अन्य कहानी है The Problem of Thor Bridge जिसमें डॉयल ने अपनी नस्लभेदी मानसिकता का परिचय देते हुए एक ब्राज़ीलियन महिला का ऐसा चित्रण किया है जैसे पूरी कहानी में सबसे बड़ी खलनायिका वही हो जबकि विवाहेतर सम्बन्ध बनाकर धोखा देने का काम उसका अमरीकन पति करता है।

आर्थर कॉनन डॉयल के उपन्यासों में ब्रिटिश तथा अमरीकी चरित्र सामान्य मानवीय बुराइयों वाले होते हैं। वे चोरी, हत्या, आपराधिक षड्यंत्र इत्यादि को अंजाम देते हैं परंतु इन कुकृत्यों को करने के लिये उनके ‘हथियार’ बनते हैं वे लोग जो ब्रिटिश-अमरीकी संस्कृति से भिन्न होते हैं। डॉयल ने अपनी कहानियों में इटालियन, स्पेनिश और रूसी पात्रों को भी वैसा नहीं दिखाया जैसा भारतीय अथवा दक्षिण अमेरिकी।

जब कोई चरित्र ऐसा गढ़ा जाए कि परिस्थितिवश उसमें आपराधिक भावनाएं जन्म लें तब वह एक विकसित सभ्यता का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है किंतु जब कहानी के पात्र का सृजन इस प्रकार किया गया हो कि जन्म से ही उसमें अपराध करने की मनोवृत्ति हो तब वह लेखक की नस्लभेदी मानसिकता का परिचायक है जिसके अनुसार सिख बर्बर होते हैं और अंडमान की वनवासी जातियों के लोग जानवरों जैसे असभ्य और जाहिल।

यही मानसिकता ‘white man’s burden’ की थ्योरी के रूप में प्रचलित है। इस नस्लभेदी मानसिकता की मूल अवधारणा ईसाई मत में निहित है जहाँ यह कहा गया है कि परमेश्वर के पुत्र का अवतरण मनुष्य को पापों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ है।

ईसाई मत प्रचारक या एवेंजलिस्ट इसी मिशन के साथ दुनिया भर में जाते हैं कि उन्हें अंधकार में जी रहे गैर-ईसाइयों को मतांतरित कर प्रकाश दिखाना है। नस्लभेद तथा ईसाई मिशनरियों द्वारा कराया जा रहा मतांतरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसकी पुष्टि कुछ दिनों पूर्व अंडमान निकोबार द्वीप समूह के नॉर्थ सेंटिनेल द्वीप पर कथित रूप से ‘सेंटिनलीज़’ वनवासियों द्वारा मारे गए ईसाई मिशनरी जॉन एलन चाऊ की डायरी से होती है जिसमें उसने लिखा है कि ‘हे परमेश्वर! शैतान के कब्जे में क्या यह आखिरी द्वीप है जहाँ तुम्हारा नाम नहीं सुना गया?’

विदेशी मीडिया का एक वर्ग चाऊ को शहीद का दर्जा दे रहा है जिसने ईसाईयत का प्रचार कर परमेश्वर का कार्य करते हुए प्राण त्यागे हैं। यह ईसाईयत की नस्लभेदी मानसिकता नहीं है तो और क्या है?

मजेदार बात यह है कि कई दशकों तक नस्लभेद को समाप्त करने के लिए विश्वभर में प्रचण्ड अभियान चलाए गए जिनका साक्षी इतिहास है परन्तु ईसाई मिशनरियों द्वारा छद्म रूप से प्रसारित किए जा रहे नस्लभेद पर बोलने वाला कोई नहीं है।

भारत के बहुत से वामपंथी बुद्धिजीवी वनवासी जनजातियों को सनातन धर्म से बाहर बताते हैं परंतु उनके होंठ इस प्रश्न पर सिल जाते हैं कि यदि वनवासी जनजातियाँ सनातनी नहीं हैं तो उन्हें ईसाई होने पर बाध्य कैसे किया जा सकता है? आर्थर कॉनन डॉयल के समय से लेकर अब तक डेढ़ शताब्दी बीत चुकी है लेकिन आज भी ब्रिटिश और अमरीकियों को अंडमान द्वीप के निवासी ‘टोंगा’ के रूप में ‘animal like creature’ जैसे क्यों दिखाई पड़ते हैं?

अंडमान निकोबार द्वीप समूह धरती पर स्वर्ग से कम नहीं हैं। यहाँ जरावा, ओंज तथा सेंटिनलीज़ जातियों के लोग लगभग पचास हजार वर्षों से रह रहे हैं। उनकी अपनी संस्कृति, भाषा और परम्पराएँ हैं। कुछ तो ऐसी हैं जो विलुप्त होने की कगार पर हैं।

उदाहरण के लिए सन् 2010 में ‘बो’ भाषा बोलने वाली अंतिम महिला बोआ का देहांत हो गया था जिसके बाद यह भाषा बोलने वाला अब विश्व में कोई नहीं बचा। सेंटिनेल द्वीप पर रहने वाले सेंटिनलीज़ जनजाति के लोगों की जनसंख्या 15 है, 50 या 500 यह कोई नहीं जानता।

सन् 1789 में अंग्रेजों ने अंडमान को उपनिवेश बनाने का निर्णय लिया और 1858 में उन द्वीपों को काला पानी की सजा देने का स्थान घोषित किया। सन् 1863 से पहले जरावा या किसी अन्य जनजाति के लोगों ने अंग्रेजों पर हमला किया हो इसका उल्लेख नहीं मिलता। बल्कि 1860 में जब अंग्रेज पोर्ट ब्लेयर आये थे तब तक जरावा लोग अंग्रेजों से मित्रवत् व्यवहार रखते थे।

कालांतर में अंडमान निकोबार द्वीप समूह के लोगों के साथ अंग्रेजों ने बहुत बुरा बर्ताव किया। उनके लाखों पेड़ काट लिए गए, महिलाओं को नँगा नचाया गया और उनके चित्र दुनियाभर में दिखाए गये। बाहरी दुनिया के इस आक्रमण से तंग आकर ओंज और जरावा जनजाति के लोगों ने भी जवाबी हमला करना प्रारंभ किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भारत सरकार की अधिकांश नीतियाँ नेवल बेस को सशक्त करने और पर्यटन को प्रोत्साहित करने की रही हैं। सन् 1956 में Andaman and Nicobar Protection of Aboriginal Tribe Regulation (ANPATR) बनाया गया तथा 1957 में इसे लागू कर द्वीप समूहों में ट्राइबल रिज़र्व अर्थात संरक्षण प्राप्त जनजातीय क्षेत्र घोषित किये गए।

सन् 2002 में उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अंडमान ट्रंक रोड का निर्माण उन क्षेत्रों में वर्जित किया गया जहाँ वनवासी जनजाति के लोग रहते हैं। दीर्घकाल तक अंडमान निकोबार द्वीप समूहों में पर्यटन हेतु विदेशियों को Restricted Area Permit की आवश्यकता पड़ती रही।

भारत सरकार ने अगस्त 2018 में RAP की सूची से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को निकाल दिया है जिसके कारण यहाँ पर्यटकों की संख्या बढ़ गयी है। समस्या यह है कि किसी पर्यटक के चेहरे पर तो लिखा नहीं होता कि वह मिशनरी है।

सम्भवतः इसी कारण जॉन चाऊ जैसा मिशनरी भी पर्यटक के भेष में चला आया और किसी सेंटिनलीज़ के क्रोध का शिकार हुआ। इस घटना को वृहद परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह कॉनन डॉयल द्वारा रचित पात्र टोंगा का बदला था जो उसने उसकी सभ्यता और संस्कृति को बदनाम करने के लिये लिया।

क्या अपराध किए बिना ही जेल जाना चाहेंगे आप!

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