विषैला वामपंथ : शैतान का मैनुएल है अलिन्स्की की ‘रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स’

1950-60 के दशक में अमेरिकी वामपंथ में एक बड़ा नाम था, सॉल अलिन्स्की (Saul Alinsky)। अलिन्स्की कार्ल मार्क्स जैसा सिद्धांतवादी नहीं था। उसने वामपंथ को कोई सिद्धांत नहीं दिया, पर उसे उसकी तकनीक के लिए जाना जाता है।

वामपंथियों के आंदोलन और संघर्ष की तकनीक को 50 और 60 के दशक में अलिन्स्की ने अपने प्रयोगों और अनुभवों से निखारा। 1971 में उसने अपने सारे अनुभवों का सार एक पुस्तक में लिखा जो आज भी वामपंथी रणनीति की बाइबिल गिनी जाती है – ‘रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स’।

वामपंथ की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ या ‘दास कैपिटल’ नहीं है, वह है ‘रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स’। दुनिया के 2% वामियों ने भी ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ नहीं पढ़ी होगी, लेकिन ‘रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स’ हर वामपंथी आंदोलन और रणनीति की रीढ़ है।

अलिन्स्की का वाम आंदोलन में महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि राष्ट्रपति बराक ओबामा और राष्ट्रपति पद की पिछली उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन एक समय अलिन्स्की के शिष्य रह चुके हैं।

अलिन्स्की के 13 रूल्स हैं। ये कोई नैतिक सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि ये शुद्ध रणनीति है। और यह अमेरिका तक सीमित नहीं है। आप भी इन्हें देख कर समझिये कि आपको इनमें से कितने रूल्स आज भारत के वामी उपद्रवियों द्वारा प्रयोग किये जाते दिखते हैं।

रूल नंबर 1 – “शक्ति सिर्फ वह नहीं है, जो आपके पास है। शक्ति वह भी है जो आपका शत्रु समझता है कि आपके पास है।

आप देखते हैं कि ये वामी कहीं भी चुनाव नहीं जीतते। जनता इनके साथ कहीं नहीं है। फिर भी ये यह भ्रम बनाये रखते हैं कि जनता इनके साथ है और ये जो भी कर रहे हैं उसे अपार समर्थन प्राप्त है।

रूल नंबर 2 – “कभी भी अपने expertise (विशेषज्ञता) के बाहर जाकर कुछ मत करो।

आप पाएंगे कि वामपंथी अपने कुछ सीमित मुद्दों पर, सीमित भाषा में बात करते हैं।

रूल नंबर 3 – “जब भी संभव हो, अपने शत्रु को उसके expertise की सीमा से बाहर लाओ। हमेशा चिंता, अनिश्चितता और असुरक्षा बनाये रखने के प्रयास करो।”

वामपंथी आपको हमेशा अपने मुद्दों पर खींच कर लाएंगे। अगर आप उनके मुद्दे पर आ गए तो यहीं उनकी जीत होती है। इसलिए मैं कहता हूँ, किसी भी वामपंथी को किसी भी बहस में उसके किसी भी प्रश्न का उत्तर मत दो – यह आपको खींच कर अपने मुद्दे पर लाने की उनकी चाल होती है। अगर आप इसे समझेंगे तो आप उन्हें उनके मुद्दों पर हराने का लालच नहीं करेंगे।

रूल नंबर 4 – “विपक्षी को उसके अपने नियमों से चलने के लिए बाध्य करो।”

अगर कोई हर पत्र का उत्तर देने का नियम मानता है तो उसे 30000 पत्र भेजो। क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने हर नियम को व्यवहारतः मान नहीं सकता। तो जब आप यह सिद्ध करते हो कि वह अपने बनाये नियम ही नहीं मानता तो आप मूलतः उसकी प्रमाणिकता और विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हो।

आप पाएंगे कि वामी हमेशा अच्छे को अच्छा, सहिष्णु को और सहिष्णु होने को बाध्य करते हैं। हिन्दू सहनशील है तो वे आपकी सहनशीलता को उस सीमा तक टेस्ट करेंगे जब आपकी सहनशीलता समाप्त हो जाये और वे यह कह सकें कि देखिये, असहिष्णुता कितनी बढ़ गई है।

रूल नंबर 5 – “उपहास सबसे बड़ा हथियार है।”

इसका कोई जवाब नहीं है, यह आपके विपक्षी को सबसे निहत्था कर देता है। व्यक्ति आलोचना का जवाब दे सकता है, उपहास का नहीं।

आप देखते हैं कि वे अपने चिह्नित शत्रु का मजाक बनाते हैं। उसपर व्हाट्सएप्प मैसेज, जोक्स, मीम चलाते हैं। कार्टून और कविताएँ चलती हैं और नेट पर वायरल होती हैं। हालाँकि यह दुधारी तलवार है, क्योंकि आज देश में सबसे बड़ा उपहास का पात्र कोई है तो वह उनका प्यारा पप्पू ही है…

रूल नंबर 6 – “अच्छी रणनीति वह है जिसे आपके लोग एन्जॉय करें।”

ऐसे में वे बढ़चढ़ कर सक्रिय होते हैं, और स्वयं भी नई रणनीति सोचते हैं।

रूल नंबर 7 – “जब एक रणनीति लंबी खिंचती है तो लोगों को बोरियत होती है। पुरानी खबर बनने से बचें।”

आप देखते ही हैं, वामियों का एक शगूफा आता है तो वह थोड़े दिन चलता है, फिर ठंडा पड़ जाता है। यह अनायास नहीं है। यह उनके इसी नियम का पालन है।

पहले कुछ दिन देश के हर कोने में बीफ को लेकर हिंसा की खबर चली। फिर क्या हुआ? वह बन्द क्यों हो गया? फिर कुछ दिन चर्चों पर हमले चले। कुछ दिन लगातार बलात्कार की खबरें आती हैं एक के बाद एक। एकाएक दलितों पर हिंसा की बाढ़ आ जाती है। कुछ दिनों पहले एकाएक सवर्णों पर एस सी/ एस टी एक्ट में मुकदमे दायर होने लगते हैं।

उनके मुद्दों का सीज़न चलता है। जैसे गली की कुतिया एक साथ पाँच-सात बच्चे जनती है और आपको पूरी गली में पिल्ले ही पिल्ले दिखने लगते हैं, वामपंथ की कुतिया भी एक साथ खबरों के पिल्ले जनती है… एक बियान में 5-7…

रूल नंबर 8 – “हमेशा दबाव बनाये रखें। जैसे ही शत्रु एक प्रहार का जवाब तैयार करे, उसपर दूसरी ओर से हमला करें।”

यह तो आप देखते ही हैं। इस मामले में वामियों कई ऊर्जा की दाद देनी होगी। यह खिलौना डूरासेल की बैटरी से चलता है।

रूल नंबर 9 – “खतरा अक्सर जितना बड़ा होता है, खतरे का डर उससे ज्यादा बड़ा होता है।”

और यह स्थापित करने में उनका प्रचारतंत्र हमेशा सक्रिय और सफल रहता है।

रूल नंबर 10 – “लगातार दबाव बनाए रखने की प्रक्रिया ही रणनीति का मुख्य बिंदु है। इसी दबाव में शत्रु प्रतिक्रिया देता है और इन्ही प्रतिक्रियाओं से राजनीतिक अवसर निकलते हैं।”

रूल नंबर 11 – “एक नकारात्मक बात को अगर हद से ज्यादा बढ़ावा दिया जाए तो उससे भी सकारात्मक बिंदु उठाते हैं और उनका भी लाभ उठाया जा सकता है।”

अगर शत्रु आपके विरुद्ध हिंसक हो जाये तो इससे आपको सहानुभूति मिल सकती है।

कोई आश्चर्य नहीं है कि इसी उद्देश्य के लिए वे हिंसा करते हैं और आपको हिंसा के लिए भड़काते हैं।

रूल नंबर 12 – “एक सफल आक्रमण का मूल्य है एक सकारात्मक विकल्प।”

शत्रु को इस बिंदु पर पॉइंट स्कोर ना करने दें कि आप जिस समस्या की शिकायत कर रहे हों, उसके समाधान के बिना नहीं पकड़े जाएँ।

इस बिंदु को ध्यान से देखें। हालांकि अलिन्स्की की इस सलाह को वामपंथियों ने सुना नहीं है, और वो आपको कभी किसी भी समस्या का समाधान देते हुए नहीं मिलेंगे। पर अलिन्स्की ने यह नियम सुझाया है कि यह बात पकड़ में आनी नहीं चाहिए…

पर इस नियम में भी इन वामियों की सोच में मूल बिंदु शत्रु पर प्रहार और समस्या का प्रचार है… समाधान का ख्याल सिर्फ एक वाद-विवाद का बिंदु है, उनकी मूल योजना का भाग नहीं है। वामपंथ को समस्या के समाधान का टूल ना समझें, वामपंथी वो हैं जिन्हें समाधान से समस्या है।

रूल नंबर 13 (यह सबसे महत्वपूर्ण नियम है) – “अपने टारगेट को चुनें, फ्रीज़ कर दें, पर्सनलाइज करें और धूल में मिला दें… अपने आक्रमण को व्यक्तिकेन्द्रित रखें।”

उसके समर्थन के सारे रास्ते बन्द कर दें, और उसे किसी भी कोने से सहानुभूति ना पाने दें। व्यक्ति पर हमला करें, संस्था पर नहीं। व्यक्तिगत हमला ज्यादा परिणाम देता है।

इस रणनीति के तो आपको सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे। इनका पूरा का पूरा तंत्र एक बार में एक व्यक्ति पर हमला करता है, एक पार्टी या संस्था पर नहीं। जैसे अगर इन्हें भाजपा के किसी नेता के किसी बयान पर शोर मचाना होता है तो ये पूरी पार्टी पर हमला नहीं करते। मीडिया चिल्लाता है “गिरिराज सिंह का विवादास्पद बयान”…

और थोड़ी देर बाद पार्टी को लगने लगता है कि एक व्यक्ति के लिए पूरी पार्टी की बदनामी हो रही है। वैसे में पूरी पार्टी डैमेज कंट्रोल के लिए उस एक व्यक्ति को अलग थलग कर देती है।

ये वो भेड़िए हैं जो अपने शिकार को उसके झुंड से अलग करके नोच खाते हैं। यह व्यक्तिगत हमले करने की नीति आप पूरी दुनिया में देख सकते हैं, चाहे भारत में मोदी पर हो या अमेरिका में ट्रम्प पर।

‘रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स’ पिछले 40-50 सालों में वामियों की रणनीति की रीढ़ रही है। अलिन्स्की ने पुस्तक की प्रस्तावना में इस पुस्तक को समर्पित किया है लूसिफ़र, यानि शैतान को।

और यह सचमुच शैतान का मैनुएल है। यह नैतिक-अनैतिक का प्रश्न नहीं है। यह शुद्ध रणनीति है। इसे समझना और इसका अभ्यास करना वर्जित नहीं है। क्योंकि शत्रु को जानना युद्ध की तैयारी का पहला कदम है।

अमेरिकी वामपंथ ही वह उद्गम है जहां से बहता है वामपंथ का यह गंदा नाला

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