सुषमा स्वराज की घोषणा के निहितार्थ

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भाजपा की वरिष्ठ नेता और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने घोषणा की है कि स्वास्थ्यगत कारणों से वे अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी।

तमाम महान राजनीतिक लेखक और विश्लेषणकर्ता इसके बाद टिप्पणियों में जुट गए। मैंने तमाम टिप्पणियां पढ़ीं और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये सभी अपने दिमाग़ में दही जमा रहे हैं। इधर-उधर जो दूध बिखरा है, उस पर कोई नज़र नहीं। दिमाग़ में एक इमेज गढ़ी, उसके आधार पर कल्पना का महल तैयार किया और लिख डाला।

अब विडम्बना यह तो अपनी जगह है ही कि जब लिखने से पहले आपने कुछ नहीं पढ़ा, तो आपके पाठक कौन से आप से ज्यादा तीस मार खां हैं? वे तो आपसे और भी आगे हैं। वे तो आपकी टाइमलाइन के अलावा कुछ और देखते ही नहीं।

लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं है। मैं जगदीश्वर चतुर्वेदी को भी पढ़ता हूं, अरुण माहेश्वरी को भी। दिलीप सी मंडल और शीतल पी सिंह से भी मुझे कोई परहेज़ नहीं है। पंकज चतुर्वेदी और ओम थानवी समेत मुझे ब्लॉक कर भाग छूटे समस्त छद्म वामपंथियों के स्टेटस किसी न किसी मित्र के जरिए मुझ तक पहुंच ही जाते हैं और मैं इनका शातिराना अंदाज़ देख-पढ़ कर मुग्ध होता रहता हूं।

सच कहूं, तो ये समस्त कूढ़मग़ज़ दरअसल मेरे लेखन को ऊर्जा देते हैं। पता नहीं, इन्हें अपने ज़हरीले षड्यंत्रों के लिए कितने सारे प्रोटीन्स आदि की आवश्यकता होती होगी, लेकिन इनका वह खाया-पिया मुझे मुफ्त में खुराक पहुंचा देता है।

मेरे पास पत्रकारिता के नए विद्यार्थी अक्सर विचार-विमर्श या करियर के बारे में सलाह लेने के लिए आते रहते हैं। मैं सभी को कहता हूं – अगर धारदार लिखना है, तो विरोधी विचारों को सबसे ज्यादा पढ़ो।

जर्नलिज़्म में वैसे तो विचारधारा नहीं, सत्यनिष्ठा महत्वपूर्ण है, लेकिन वर्तमान काल ऐसा कदापि नहीं है, तो आप जिस भी विचार के हैं, आपको मालिक के रुझान के अनुसार काम करना है, अतः इस बात का वैसे तो कोई महत्व नहीं, लेकिन आपके व्यक्तित्व और लेखन के लिए यह शाश्वत सत्य है।

प्रसंगवश बताता चलूं कि साहित्य यात्रा के अनेकानेक नए यात्री भी अक्सर मुझसे भेंट के लिए आते रहते हैं, और मैं उन्हें सौ टके की एक सलाह देता हूं – साहित्य से प्रेम बनाए रखना है, तो साहित्यकारों से दो गज़ दूर रहो।

मुद्दे पर आएं। ऊपर मैंने जितने इस्म-ए-शरीफ लिखे हैं, इनकी वॉल की सैर करें। यह सम्पूर्ण गिरोह लगभग डेढ़ साल से ताक में है। ये लगातार भारतीय वोटर में भ्रम का माहौल उत्पन्न करने में जुटा है। कुछ ‘नोटा’ का राग अलाप रहे हैं, कुछ बता रहे हैं कि संघ मोदी से नाराज़ है और उन्हें हटाना चाहता है।

इस प्रयास में इस गिरोह ने कुछ नाम सामने रखे हैं कि मोदी के बरअक्स संघ की पसंद ये हैं – सुषमा स्वराज, निर्मला सीतारमण, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह।

अर्थात इनकी तमाम पोस्ट्स का मंतव्य या कहें कि जनता में अवधारणा स्थापित करने का प्रयास यह है कि अगर 2019 में बीजेपी जीत भी गई, तो संघ मोदी को पीएम नहीं बनने देगा। क्यों?

जगदीश्वर चतुर्वेदी का यह स्टेटस पढ़ें –

“जब पीएम विकास, चुनाव घोषणापत्र, सामयिक यथार्थ, नोटबंदी, जीएसटी, बेकारी भूल जाएं तो छद्म अतीत याद आता है। मरे मसले याद आते हैं। पीएम अपनी कोई उपलब्धि नहीं बता रहे, सिर्फ सफेद झूठ बोल रहे हैं। यानी 2018 में ही राजनीतिक उपलब्धियां बताने लायक मोदीजी के पास मसाला नहीं है।

आरएसएस में 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद के ब्लूप्रिंट की तैयारी चल रही हैं। पीएम मोदी को 2019 के चुनाव तक इस्तेमाल किया जाएगा, यदि 2019 में भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिलता है तो रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन को पीएम बनाकर आरएसएस अपनी नई इमेज पेश करने की तैयारी कर रहा है। निर्मला के पक्ष में अनेक चीजें जाती हैं जिसके कारण वे आरएसएस की 2019 के बाद की रणनीति की प्रमुख किरदार बन सकती हैं।

आरएसएस नहीं चाहता कि मोदी 2019 के बाद पीएम रहें, उनको पार्टी अध्यक्ष बनाकर रखा जा सकता है अथवा संन्यास देकर घर बैठाया जा सकता है। कारण बहुत साफ हैं सन् 2002 के गुजरात के दंगे पीछा कर रहे हैं। आरएसएस मोदी को घर बैठाकर टेंशन मुक्त होना चाहता है, जिस तरह राममंदिर आंदोलन के मुखिया लालकृष्ण आडवाणी को घर बैठाकर मुक्त कर दिया गया, ठीक वैसे ही मोदीजी को घर बैठाया जा सकता है।

निर्मला सीतारमन आरएसएस की विचारधारा की संगति में एकदम फिट हैं। उनको लेकर कोई विवाद नहीं है, कोई हत्या, करप्शन आदि के आरोप नहीं हैं, ऊपर से वे स्त्री भी हैं और सक्षम हैं। इन सबसे बड़ी बात यह कि उनके पीछे कोई राजनीतिक बल भी नहीं है, एकदम निराधार और पूरी तरह आरएसएस के इशारों पर निर्भर हैं, उनकी इन्हीं विशेषताओं के कारण उनको रक्षामंत्री जैसा सबसे महत्व का पद दिया गया और वहां उन्होंने ठीक वही किया है जो संघ से आदेश मिला।

इसके विपरीत मोदीजी के अनेक दंद-फंद हैं, आंतरिक चक्कर हैं। इस तरह की कोई चीज निर्मला सीतारमन के साथ नहीं है, वे एकदम निष्कलंक इमेज की नेत्री हैं, मंत्रीमंडल में जो लोग हैं उनमें बेहतर राजनीतिक समझ और अकादमिक योग्यता रखती हैं।”

साफ़ समझ लें कि इन सज्जन को ‘कपटीश्वर च्युतवेदी’ जैसा शुभ नाम मैंने ऐसे ही नहीं दिया था। यह बुजुर्ग अद्भुत घाघ है। इसने अपने गिरोह को एक दिशा दिखाई और इसके समस्त चेले पिल पड़े। मार्केट में कई नाम आ गए। अरे, मोदी क्या है? आरएसएस का एक खिलौना है। वह इसे जब चाहेगा, उठा कर कहीं और सजा देगा।

ध्यान दीजिए, विपक्ष में एक परम्परा है कि जब भी बीजेपी ताकतवर होती दिखती है, तो उसे उसके मौजूदा संचालक मंडल से बेहतर पूर्ववर्ती संचालक मंडल नज़र आने लगता है।

उदाहरणार्थ, जब तक अटलजी शीर्ष पर थे, कांग्रेस के नेतृत्व में समूचे विपक्ष को येन केन प्रकारेण ‘बीजेपी’ को सत्ता से दूर रखने के नारे ही सूझते थे। जैसे ही अटलजी बीमार होकर राजनीतिक पटल से ओझल हुए और लालकृष्ण आडवाणी का वर्चस्व पार्टी पर हुआ, फ़ौरन सभी को अटल जी की भूली-बिसरी अच्छाइयां नज़र आने लगीं। वे उनकी ऎसी-ऎसी ख़ुसूसियात खोज लाए, जो आम जनता को खुर्दबीन से देखने पर भी नज़र नहीं आती थीं।

और जब आडवाणी मार्गदर्शक मंडल में गए, तो ये सीताराम केसरी, पी.वी. नरसिंहराव, बूटा सिंह, ज्ञानी जैल सिंह, सोमनाथ चटर्जी आदि को भूल कर उनकी विरुदावली रटने लगे। आगे भी ये ऐसे ही करते रहेंगे यानी अगर कहीं इनके दुर्भाग्य से योगी आदित्यनाथ पीएम बन गए, तो ये नरेंद्र मोदी की अच्छाइयां गिनाने लगेंगे।

सुषमा जी की बीमारी और उपचार के बारे में पता करें। कोई डॉक्टर ही आपको बताएगा कि इसमें कैसे-कैसे कॉम्प्लीकेशंस उभरते हैं। मैं अपना एक सर्वाधिक प्रिय मित्र इसी के कारण खो चुका हूं। उसके संघर्ष के समय मैंने जाना था कि इसे ढोते हुए जीना कितना भयावह है। अतः सुषमा जी के निर्णय पर कतई कोई संदेह नहीं करें।

वे इतने दिन काम कर पाईं और अब भी कर रही हैं, यही बहुत बड़ी बात है। मैं बखूबी जानता हूं कि यह उनकी विवशता है और पार्टी के हित में लिया गया उचित निर्णय है।

मैं उनके दीर्घ जीवन और बेहतर स्वास्थ्य के लिए मंगलकामनाएं करता हूं।

दूसरी तरफ मुझे लगता है कि यह शातिर गिरोह भारतीय मतदाता को अपने जैसा ही कूढ़मग़ज़ समझता है, लेकिन वह बहुत समझदार है। वह इन्हें उपयुक्त उत्तर अवश्य देगा।

भाड़ में जाओ…

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