इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार – 5

कई दिनों तक स्कूल बंद रहे फिर जब काफी दिनों बाद स्कूल जाना हुआ तो पता चला मेरा दोस्त और साथी एथलीट पूरन सिंह उन दंगो में मारा गया था। कई रातों को उसने मुझे सपनों में जगाया था कभी हम साथ साथ दौड़ते नज़र आते, तो कभी साथ साथ DTC की बसों में घूमते!

रईस मियाँ 12वीं के बाद अपने बहन बहनोई के पास गुजरात चला गया था जिनका वहाँ मसालों का काम था और मैं 12वीं करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में BA में दाखिला ले आगे की पढ़ाई करने लगा था।

मेरे पिताजी ने हमें ये भी बताया था कि किस तरह ये दंगे पूर्वी और बाहरी दिल्ली के इलाकों में ज्यादा भयावह थे बाकी जगह के मुकाबले। उन्होंने दक्षिणी दिल्ली के दो गांवों का,जिसमें गुज्जर जाति के लोग थे,किस्सा भी हमें सुनाया था कि गांव जमरूदपुर और गढ़ी कालका जो लेडी श्री राम कॉलेज के पास स्थित है और इन दोनों गाँवों में अलग से पंजाबी मोहल्ला और प्रकाश मोहल्ला नाम से सिखों के दो अलग मोहल्ले थे,की रक्षा और पूरी पूरी रात जाग कर पहरा दे कर रखवाली की थी बाहरी लोगों से,इन गुज्जरों ने सिख परिवारों की!

काश ऐसी ही कोई नज़ीर या मिसाल मेरे अकाली या सिख भाई पंजाब में आतंकवाद के चरम समय में जब हज़ारों हिन्दुओं को मारा जा रहा था, पेश कर देते… खैर….

साल 1984 में हमारे स्कूल जो कि लाजपत नगर में था में उन्ही दिनों में एक एथलीट और था, जो 1000 मीटर और 5000 मीटर की लंबी दूरी की दौड़ों का ज़ोनल चैंपियन था उसका नाम था “सुरजीत सिंह पेंटा”। उम्र में काफी बड़ा था पर था 12वीं क्लास में ही, वो गोविंद पूरी कालका जी में कहीं रहा करता था। वो रोज़ सुबह सुबह तकरीबन चार पाँच बजे कालका जी मंदिर के पास, जहाँ लोटस टेम्पल भी है, वाले सुनसान इलाके में प्रैक्टिस किया करता था और जो भी कोई अकेला डुकेला आदमी या औरत मिली उसकी घड़ी पर्स चेन झपट कर नो दो ग्यारह हो जाता था। शानदार एथलीट था तो पकड़ में आने का सवाल ही नहीं उठता था! वो सुरजीत सिंह भी नवम्बर के उन दुःखद दंगो के बाद गायब हो गया था!

उसके बाद खालिस्तान कमांडो फोर्स नामक एक नए आतंकवादी संगठन का उदय हुआ और उसने बाकायदा हिट लिस्ट बना कर 1984 के दंगों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को मारने का काम शुरू किया, जिसके 31 जुलाई 1985 को सबसे पहले शिकार बने दक्षिण दिल्ली से कांग्रेसी सांसद और पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के दामाद ललित माकन जिनको कीर्ति नगर स्थित उनके आवास के बाहर उनकी पत्नी और एक अन्य सहयोगी समेत गोलियों से भून डाला गया।

और फिर कोंग्रेसी नेता अर्जुन दास इन दो हत्याओं से सुरक्षा एजेंसीयां चौकन्नी हो गयी और बाकी आरोपित लोगों की सुरक्षा बढ़ा दी गई।

अब दिल्ली खालिस्तानी आंतकवादियों के सीधे निशाने पर थी, कई बम्ब ब्लास्ट और निर्दोष लोगों की हत्याएं हुईं!

जुलाई 1987 में दक्षिणी दिल्ली के चितरंजन पार्क कालकाजी व ग्रेटर कैलाश इलाके में रात के वक्त एक टोयटा मिनी ट्रक में सवार कुछ खालिस्तानी आतंवादियों ने अंधाधुंध फ़ायरिंग करके कई दर्जन निर्दोष लोगों को जिनमें चितरंजन पार्क के घर में जन्मदिन मना रहे कुछ मासूम बच्चे भी शामिल थे गोलियों से भून डाला!

कुछ दिनों बाद इन्हीं लोगों ने कालकाजी क्षेत्र के ही निगम पार्षद और स्थानीय नेता हंसराज सेठी व एक अन्य कोंग्रेसी नेता सुदर्शन मुंजाल को दिन दहाड़े गोलियों से भून दिया। पर सिक्ख समाज अभी भी चुप था शायद प्रतिशोध या डर?

बार बार ये घटनाएं एक खास इलाके में हो रही थी, जो कालकाजी चितरंजन पार्क के आस पास सीमित था। पुलिस को शक हुआ कि कोई स्थानीय व्यक्ति या तो इनकी मदद कर रहा है या सीधे तौर पर शामिल है। पर कौन? जाँच एजेंसीयां जुट गईं और जो नाम सामने आया वो वाकई चौंकानेवाला था……

उधर पंजाब में…
जून1984 में दरबार साहिब परिसर में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान अकालतख्त की इमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। हालांकि केंद्र सरकार ने बुड्ढा दल के मुखिया बाबा संता सिंह के नेतृत्व में कारसेवा के जरिए मरम्मत कार्य करवाकर उसे फिर से भव्य रूप दे दिया था, लेकिन गर्मख्याल जत्थेबंदियों को यह मंजूर नहीं था। लिहाजा, 26 जनवरी 1986 को अकालतख्त पर पंथक कमेटी की ओर से बुलाए गए सरबत खालसा में अकालतख्त की इमारत को गिराकर फिर से बनाने का फैसला किया गया।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के तत्कालीन प्रधान जत्थेदार गुरचरन सिंह टौहड़ा ने समय की नजाकत को देखते हुए इस फैसले पर अपनी सहमति की मोहर लगा दी। इस कार्य को संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले की संस्था दमदमी टकसाल के हवाले कर दिया गया। जैसे ही अकालतख्त के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ, कारसेवा की आड़ में एक बार फिर परिसर में हथियारबंद आतंकवादी पहुंचने लगे और जल्द ही पूरी परिक्रमा में विभिन्न आतंकवादी संगठनों के दफ्तर खुल गए।

यहां तक कि कमरा नं. 13-14 में खालिस्तान का दफ्तर भी खोल दिया गया, जहां जागीर सिंह और निरवैर सिंह पत्रकार सम्मेलन भी बुलाने लग। एक बार फिर लगभग वैसा ही माहौल तैयार हो गया, जैसा ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले था। 1987 आते-आते घटनाओं की जद में गया। जनवरी 1988 में पंजाब में 143 हत्याएं हुईं, फरवरी में 144 और मार्च में संख्या 290 पर पहुंच गई। खून-खराबे में हुई इस बढ़ोतरी ने आम लोगों के साथ प्रशासन को भी हिला कर रख दिया।

9 मई 1988 को सीआरपीएफ के तत्कालीन डीआईजी सर्बजीत विर्क अमृतसर के तत्कालीन एसएसपी सुरेश अरोड़ा, जो इस समय पंजाब पुलिस के डायरेक्टर जनरल के पद पर तैनात हैं, को लेकर आतंकवादियों की ओर से अकालतख्त के निकट किए जा रहे अवैध निर्माण को देखने के लिए गए। तभी प्रसाद घर की छत पर खड़े आतंकवादियों द्वारा चलाई गईं गोलियां में से एक विर्क के जबड़े पर लगी, उनकी वर्दी खून से भीग गई। सुरेश अरोड़ा ने सूझबूझ का परिचय देते हुए उसी वक्त किसी राहगीर का स्कूटर पकड़ा और विर्क को पिछली सीट पर बैठा कर तंग बाजारों से होते हुए उन्हें ग्रीन एवेन्यू स्थित कक्कड़ अस्पताल में पहुंचाने में सफल हो गए।

10 मई 1988 को केंद्र की इजाजत का इंतजार करने की बजाय पुलिस और सुरक्षा बलों ने आतंकवादियों की गोलियों का जवाब गोलियों से देना शुरू कर दिया। यह असल में ऑपरेशन ब्लैक थंडर कार्रवाई थी, जो 18 मई को आतंकवादियों के समर्पण के साथ खत्म हुई।

ऑपरेशन ब्लैक थंडर में अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर सर्बजीत सिंह, पंजाब पुलिस के डीजी केपीएस गिल और सीआरपीएफ के आईजी चमन लाल और एसएसपी सुरेश अरोड़ा ने उल्लेखनीय भूमिकाएं निभाईं। सर्बजीत सिंह पहले दिन से आतंकवादियों को आत्मसमर्पण करने की अपील करने लगे। लेकिन इस अपील का उन पर कोई असर नहीं हो रहा था। यह अपील गुरु रामदास सराय की छत से की जा रही थी, जहां पत्रकारों को भी सारी कार्रवाई देखने की इजाजत दी गई थी। इस बीच सुरक्षा बलों की गोलियों से कई आतंकवादी मारे जा चुके थे। प्रसाद घर के बाहर जागीर सिंह की लाश पड़ी थी।

क्रमशः

– इकबाल सिंह पटवारी

इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार – 4

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