जब लेखन और लिपि नहीं थी, क्या तब घटित नहीं हो रहा था इतिहास?

दादी-नानी से कहानियां खूब सुनी होंगी, कभी उनसे उनके दादा-दादी के संदर्भ में सच्ची कहानियां सुनाने के लिए कहिये। आप को बहुत सारी जानकारियाँ मिलेंगी। वे क्या करते थे, कहाँ से आये थे, क्या जीवन था, कोई विशेष उपलब्धि आदि आदि।

यही सब आप अपने पोते-पोतियों को भी सुना सकते हैं। इस तरह से कम से कम नौ पीढ़ियों की जानकारी अगली पीढ़ी को आसानी से हस्तांतरित की जा सकती है।

इसे इस परिवार कुल वंश का इतिहास कह सकते हैं। जो लिखित नहीं है। मगर जीवंत इतिहास है। ऐसे ही दसियों पीढ़ियों का विवरण अनेक परिवार में मिल जाएगा। ये आम परिवार भी हो सकते हैं। अर्थात जो राजपरिवार नहीं हैं उनका भी अपने इतिहास को ज़िंदा रखने का तरीका रहा आया है। स्मृति और श्रुति, प्राचीनतम और मौलिक इतिहास लेखन है।

दूसरा तरीका है पश्चिम का, वामपंथियों का, जिसमें इतिहास वही है जो लिखा हुआ है। इन महानुभावों से कोई पूछे कि जब लेखन और लिपि का अविष्कार नहीं हुआ था तब क्या इतिहास नहीं घटित हो रहा था? यह इसका जवाब नहीं देंगे, दे भी नहीं सकते।

वैसे भी इन सब का इतिहास कुल दो-ढाई हज़ार साल में सिमट जाता है। यह इस बात की कल्पना भी नहीं कर पाते कि यह सृष्टि करोड़ों वर्ष की है और मानव सभ्यता का इतिहास भी लाखों साल पुराना होना चाहिए।

इनके पास इस प्राचीन कालखंड के लिए कोई उपयुक्त शब्द भी नहीं, लेकिन सनातन के पास है, आदिकाल आदिदेव आदिवासी आदि आदि। ये अपने एजेंडे के लिए आदिवासी शब्द को तो पकड़ लेते हैं मगर आदिकाल और आदिदेव को नकार कर काल्पनिक घोषित कर देते हैं। यह इनके दोगलेपन का एक और प्रमाण है।

बहरहाल, सनातन आदि संस्कृति है। इस आदि सभ्यता का इतिहास श्रुति रूप में सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा। यह लोक कथाओं में, लोक परम्पराओं में ज़िंदा रहा।

सीधे सीधे कहना हो तो कह सकते हैं कि हमारे वेद इतिहास हैं, हमारे पुराण इतिहास हैं, हमारी रामायण इतिहास है, हमारा महाभारत इतिहास है। हमारे हर ग्रंथ इतिहास हैं, हमारी हर परम्परा संस्कारों पर्व व्रत में इतिहास है। और यह सब प्रामाणिक इतिहास है। इस आदि इतिहास में साहित्यिक पुट और भाषा में अलंकार हो सकता है मगर इनमें सत्यता है और तथ्य भी।

मेरी बात यहाँ समाप्त नहीं होती है। मेरे लेख का उद्देश्य तो यहां से प्रारम्भ हुआ है। क्या आप बता सकते हैं कि किसी भी वेद, उपनिषद या किसी भी अन्य वैदिक ग्रंथ या फिर किसी भी पौराणिक कथा में, किसी भी तरह से, दूर दूर तक, क्या कभी कोई एक शब्द भी आया जिसका संकेत भी यह निकल सके कि हम आर्य कहीं बाहर से आये थे?

जब हम शिव-पार्वती की कथा सुना सकते हैं, हम मनु और प्रलय की कहानी को ज़िंदा रख सकते हैं, जब हम देवता और राक्षस के बीच के संघर्ष की रोचक कथा को मंचित कर सकते हैं, जब राम-रावण का युद्ध अगले आने वाले सभी युगों को बतला सकते हैं जिसमें सीता माता का अपहरण हुआ था, जब हम भाई भाई के भीषण युद्ध का विस्तृत वर्णन यादों में ज़िंदा रख सकते हैं जिसमें महाविनाश हुआ था, जब हम बुद्ध और महावीर के विचार आगे ले जा सकते हैं, जब हम शक हूण कुषाण को बाहरी बता कर स्वीकार कर सकते हैं, तो फिर हम आर्यों के बाहरी होने के संदर्भ में एक भी शब्द ना कहें, यह कैसे संभव है।

मैं वामपंथी इतिहासकारों को चुनौती देता हूँ कि वो एक भी प्रमाण बतला दें, जो यह साबित कर सके कि आर्य बाहरी थे। यह विश्व इतिहास का सबसे बड़ा झूठ है, जो बिना किसी प्रमाण के मात्र आशंका के आधार पर कल्पना में रच दिया गया। जबकि ऐसे अनगिनत प्रमाण हैं कि आर्य इसी देवभूमि की संतान हैं।

सीधे सीधे कहना हो तो आर्य ही इस भूखंड के मूल निवासी हैं और हम सब भारतवासी आर्यपुत्र हैं। यही कारण है जो यह आर्यावर्त कहलाता था। लीजिये आर्यों के हमारे पूर्वज होने का एक प्रमाण इस एक शब्द ‘आर्यावर्त’ में ही मिल गया।

(अपनी अगली पुस्तक – ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ के प्रथम अध्याय से)

महाबलिपुरम : ‘आर्य बनाम द्रविड़’ के वामपंथी झूठ का प्रमाण

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