अब कभी नहीं मिलेंगे फिर से खिलखिलाने, अपनी तारीफ़ सुन लजाने के लिए हिमांशु जोशी

अपनी तारीफ़ सुन कर लजा जाने वाले अप्रतिम कथाकार और ख़ूब भले, सौम्य और शालीन आदमी हिमांशु जोशी नहीं रहे। यह जान कर आज की सुबह बरबाद हो गई।

हिमांशु जोशी से मैं पहली बार मई, 1979 में साप्ताहिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली के दफ़्तर में मिला था। गोरखपुर से गया था, प्रेमचंद पर एक परिचर्चा ले कर। 21 साल का था, विद्यार्थी था पर कविता, कहानी के साथ ही उन दिनों मैं परिचर्चा बहुत लिखता था।

हिमांशु जी ने उस परिचर्चा को साप्ताहिक हिंदुस्तान में खूब फैला कर कई पन्नों में छापा भी जुलाई, 1979 के अंक में। साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिका में 21 साल के विद्यार्थी का छपना, मेरे लिए बड़ी उपलब्धि थी।

हालां कि तब तक सारिका और धर्मयुग में भी छप चुका था फिर भी इतनी ढेर सारी जगह साप्ताहिक हिंदुस्तान में ही मिली।

फिर मिला उन से मई,1981 में। साप्ताहिक हिंदुस्तान के दफ़्तर में ही। हिमांशु जी बहुत प्यार से मिलते थे। हमेशा। और प्रोत्साहित भी खूब करते थे। परिजनों, मित्रों का हालचाल पूछते हुए। क्या नया लिख रहे हो पूछते हुए।

उन्हों ने ही मुझे अरविंद कुमार के पास भेजा। हिंदुस्तान टाइम्स बिल्डिंग के सामने ही सूर्य किरण बिल्डिंग में उन दिनों सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट का दफ़्तर था। मैं मिला अरविंद जी से, हिमांशु जी का संदर्भ देते हुए। अरविंद जी ने मुझे तुरंत सर्वोत्तम में नौकरी दे दी। सर्वोत्तम के बहाने मेरा जीवन बदल दिया अरविंद जी ने।

फिर तो जब तक दिल्ली में रहा हिमांशु जी से भेंट होती रही। मनोहर श्याम जोशी से भी हिमांशु जोशी ने ही मिलवाया था। एक बार मैं ने उन से कहा कि फ़िल्म अभिनेता जॉय मुखर्जी और आप की शकल एक जैसी है। तो वह मुसकुरा पड़े।

लखनऊ में साहित्य अकादमी ने कहानी पाठ का आयोजन किया दिसंबर, 2009 में। तब उन के साथ मैं ने कहानी पढ़ी। इस पर मैं ने उन से अपनी खुशी का इज़हार किया तो वह मुझ से भी ज़्यादा खुश दिखे।

अप्रैल, 2010 में उन से फिर भेंट हुई हरिद्वार में। साहित्य अकादमी द्वारा ही आयोजित कहानी पाठ में। कहानी सत्र की अध्यक्षता उन्हों ने ही की। दो दिन उन के साथ रहना हुआ।

फिर उन से मिला बीते 24 जून, 2011 को दिल्ली सरकार के सचिवालय भवन में। अरविंद कुमार को जब हिंदी अकादमी ने शलाका सम्मान से नवाज़ा तब। यह विरल संयोग था। उस समारोह में भी वह फिर पहले ही जैसी ताजगी और खुले मन से मिले। उसी सौम्य मुसकान के साथ।

मैं ने उन्हें फिर बताया कि आप की शकल जॉय मुखर्जी से बहुत मिलती है तो वह फिर हंस पड़े। मैं ने यह बात अरविंद जी से भी कही तो वह भी हंस पड़े। हिमांशु जी के साथ यह मेरी एक फ़ोटो तब की ही है, अरविंद जी के शलाका सम्मान समारोह के मौके पर खिंची हुई। जिसे बाद में अरविंद जी ने मुझे भेजा।

हिमांशु जोशी का उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ जब पढ़ा था तब विद्यार्थी था। तब से ही मैं उन का मुरीद हूं। यह बात जब-जब उन्हें बताता था, वह खुश होने के साथ ही लजा-लजा जाते थे। लजा कर सिर झुका लेते थे। अपनी तारीफ़ सुन कर लजा जाने वाले मेरी जानकारी में वह पहले रचनाकार हैं।

उन की यह सरलता और सहजता ही उन की रचनाओं में भी टपकती मिलती है। उन की मुसकुराहट की ही तरह उन की रचनाएं और उन के पात्र भी जैसे खिलखिला पड़ते हैं। लेकिन दुर्भाग्य कि अब फिर से खिलखिलाने के लिए, अपनी तारीफ़ सुन कर लजाने के लिए हिमांशु जोशी कभी नहीं मिलेंगे। अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि!

सेक्यूलर लेखकों को सांप्रदायिकता सिर्फ़ हिंदूवादियों में दिखती है, लीगियों और मिशनरियों में नहीं!

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