मायाजाल ‘निष्पक्ष’ कहलाने का

निष्पक्ष कहलाना बहुत सारे हिंदुओं को भाता है। यही उनकी कमज़ोरी है जो उनकी नकेल – लगाम बन जाती है।

खुलकर पक्षपात करनेवाला व्यक्ति भी उनपर आरोप लगाता है कि आप निष्पक्ष नहीं हो, और खुद को निष्पक्ष साबित करने के लिए हिन्दू तरह तरह की गुलाण्ट मारता है।

कभी सोचा है आप ने ऐसा क्यों होता है?

मेरे विचार में इसका संबंध हमारी शिक्षा से है। हम हर बात को उपलब्ध विज्ञान की कसौटी पर परखते हैं और जो उसपर खरा न उतरे, उसे अंधश्रद्धा का लेबल लगाकर त्याग देते हैं।

इसका कोई विरोध नहीं बनता, लेकिन इसके साथ साथ एक और बात होती है जिससे शायद आप अनभिज्ञ हैं, इसलिए लिख रहा हूँ।

क्या होती है वह बात? जिन बातों को असत्य मानकर उनसे आप दूरी बनाते हैं, उनको पूर्णसत्य मानकर उनमें श्रद्धा रखने वालों से भी आप दूरी बनाते जाते हैं।

अक्सर यह इसलिए भी होता है कि आप को उनकी बातें सही नहीं लगती और आप को यह लगता है कि उनके साथ उठने बैठने से आप को भी उनके जैसा ही माना जाएगा। A man is known by the company he keeps यह कहावत आप को टोकती रहती है।

और बाकायदा यह होता भी है। वैसे तो यह बात कई स्तरों पर होती है – जैसे गर्ल फ्रेंड या पत्नी का दोस्तों से दूरी बनाने का दबाव – लेकिन वो अलग विषय है, यहाँ हम केवल हिन्दू और निष्पक्ष की बात करेंगे।

श्रद्धा के विषय में आप की मतभिन्नता आप को श्रद्धावान से दूर कर देती है। वास्तविकता यह है कि आप ही दूर हो जाते हैं। लेकिन गंभीर नुकसान यह होता है कि आप समाज के एक बड़े धड़े से कट जाते हैं।

धीरे धीरे यह होता है कि आप अपने हिन्दू होने को लेकर रक्षात्मक हो जाते हैं। “Yes, I am a Hindu, but….. ” से आप खुद की सफाई देने लगते है। धीरे धीरे बात यहाँ तक चली जाती है कि आप अपने आप को हिन्दू कहलाने से मना कर देते हैं।

फिर भले ही आप अपने तरह के लोगों को ढूंढ लेते हैं, लेकिन आप वृहद समाज से कट जाते हैं। फिर वृहद समाज के शोषण के लिए भी आप का उपयोग किया जा सकता है। और अगर आप शोषक या शोषक के हथियार न बने तो भी आप के और समाज के बीच की दूरी इतनी हो जाती है कि दोनों में संवाद खत्म हो जाता है।

और जब संवाद खत्म हो जाता है तो मदद के लिए लगाई गई पुकार सुनी नहीं जाती। आप जैसों की संख्या न केवल कम होती है, हिंसक आक्रमण का उतना ही न्यायोचित हिंसक प्रतिकार भी आप के बस की बात नहीं रहता। आप का अस्तित्व तो मिटता है ही, आप के जो भी संसाधन हैं वे भी शत्रु के संसाधन बन जाते हैं।

क्या आप ने उनके लिए वे संसाधन कमाए थे?

गीता में श्रीकृष्ण सही उपदेश दे गए कि ऐसे परिस्थिति में क्या करना होगा

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्।।3.26।।

हिंदुओं में एक ही नाम उभर आता है जिसने इस श्लोक को अपनी ज़िंदगी में जिया हो – वीर सावरकर।

वीर सावरकर असामान्य विज्ञाननिष्ठ व्यक्ति थे और यह उनके दो मराठी पुस्तकों से पूर्णतया प्रमाणित है। लेकिन इस विज्ञान निष्ठा ने उन्हें बहुजन समाज से काटा नहीं। कोई वामी होता तो दलितों के लिए मंदिर न खुलवाता, बल्कि दलितों को मुख्य समाज से तोड़ता ही।

सावरकर ने दलितों के लिए मंदिर खुलवाए और उनको समाज से जोड़े रखने का कार्य किया। उनकी पीड़ा को अलगाव का शस्त्र नहीं बनाया जो वामियों ने किया, बल्कि उनकी श्रद्धा को वह सूत्र बनाया जिससे वे मुख्य धारा से जुड़े रहे। यह उनकी दूरदर्शिता थी, फिर भले ही उसके लिए उन्होने अपनों के ताने सहे।

क्या आप अब समझ रहे हैं कि वामपंथी, वीर सावरकर से इतनी नफरत क्यों करते हैं?

गीता के इस श्लोक को विधर्मी हम से अधिक समझे हैं और हमसे अधिक वे इसका अनुपालन करते हैं। मुसलमान, विशेष रूप से। आप को कई ईसाई और मुसलमान मिले होंगे जो वाकई प्रखर बुद्धिवादी होंगे। विज्ञाननिष्ठ भी होंगे। लेकिन क्या आप ने उनको अपने धर्मग्रन्थों में जो अवैज्ञानिक बाते हैं उनका विरोध करते पाया है कभी?

हाँ, इतना अवश्य है कि वे आप के सामने हिन्दू श्रद्धाओं का मज़ाक नहीं उड़ाएंगे, यह काम जन्मना हिन्दू वामपंथी ही करेंगे जहां ये मौन मंद मुस्कान बिखेरेंगे, उनका तो काम हो रहा है। लेकिन इस्लाम पर चर्चा नहीं होने देंगे, यह कहकर कि माहौल खराब होता है। और आप उनके संजीदगी की तारीफ करते लहालोट होंगे।

अपने रिलीजन और मज़हब की आलोचना इसाई और मुसलमान आप के सामने नहीं करते। यूं भी कम लोग ही करते हैं, अधिकतर लोग कम्यूनिटी बने रहने के फायदे समझते हैं।

वे कम्यूनिटी में रहते हैं और हम कम यूनिटी में।

गीता हम बेहतर समझे या वे ? क्या “वयम् पञ्चाधिकं शतं” के बारे में भी यह उतना ही सत्य नहीं है?

समय लिखेगा ज़रूर, पर बाँचने को आप तो रहेंगे ही नहीं, शायद आप का नामलेवा भी कोई नहीं रहेगा।

हिंदुओं ने न अपने नेरेटिव को कभी महत्वपूर्ण समझा, न अपने लोगों को सपोर्ट करना

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