इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार – 4

सुबह 9.20 बजे दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके 2 सिक्ख बॉडीगार्ड सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने गोलियों से छलनी कर दिया। उन्हें तुरंत एम्स (AIIMS) अस्पताल में भरती कराया गया।

सुबह 10.50 बजे इंदिरा गाँधी का एम्स अस्पताल में निधन हो जाता है। सुबह 11.00 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर यह खबर प्रसारित हुई की इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही दो सिख बॉडीगार्डो ने की और पूरे भारत में मातम छा जाता है।

इस तनावपूर्ण माहौल में राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी जाती है। देश में सिक्खों पर छोटे – मोटे हमले होते दिखते हैं। इस हिंसा पर जब दूरदर्शन पर राजीव गाँधी से सवाल पूछा जाता है तो वो जवाब देते हैं – “जब जंगल में कोई बड़ा पेड गिरता है तो आसपास की जमीन हिलने लगती है और छोटे मोटे पेड़ उखड़ जाते हैं”।

जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और नासमझी भरा बयान था और उनकी अपरिपक्वता दर्शाता था। इन दंगो के समय भारत के राष्ट्रपति एक सिक्ख “ज्ञानी जैलसिंह” ही थे। खैर ये तो इतिहास में दर्ज तथ्य थे।

जिस समय श्रीमती गांधी की हत्या हुई मैं दसवीं कक्षा में था और दक्षिणी दिल्ली के एक अच्छे स्कूल में, पिताजी जो उस समय दिल्ली सरकार में पटवारी थे, ने उसी साल मुझे गांव से लाकर दाखिला करवाया था। अब अचानक शहर की चकाचौंध देख मैं छोटा पटवारी बौराया हुआ था। जिस दिन श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षा गार्डों ने गोली मारी और उन्हें दिल्ली के AIIMS लाया गया था, मैं अपने दो दोस्तों रहीस मियाँ जो निज़ामुद्दीन दरगाह के पास कहीं रहता था और दूसरे पूरन सिंह जो पूर्वी दिल्ली में कल्याण पूरी नामक जगह पर रहता था, के साथ स्कूल बंग करके कमल सिनेमा हॉल में फ़िल्म देख रहा था।

रईस मियाँ के पिताजी पैन्टर थे और निहायत ही गरीब। रईस मियाँ एक शानदार तैराक था, जो निजामुद्दीन दरगाह में स्थित बावड़ी में कूद कूद कर तैराकी सीख गया था और जिसके बूते उसका दाखिला इस दक्षिण दिल्ली के अच्छे स्कूल में हुआ था स्पोर्ट्स कोटे में।

उसी तरह पूरन सिंह के पिताजी “सिगलिकर” शायद रामगढ़िया सिक्ख थे और साइकिल पर घूम घूम कर चारपाई बुनने का उनका काम था, पूरन सिंह दुबला पतला साँवला सा बड़ी बड़ी आँखों वाला भोला भाला बहुत ही डरपोक चुपचाप रहने वाला… शायद उसकी आर्थिक स्थिति ने उसे ऐसा बना दिया था? पता नही अब कुछ याद भी नहीं ठीक से… उसके सर पर एक छोटी सी जुड़ी बंधी होती थी।

पूरन सिंह एक बेहतरीन एथलीट था और 100 मीटर 200 मीटर और 400 मीटर रिले टीम का हमारे स्कूल का स्टार धावक भी यानी इसका दाखिला भी स्पोर्ट्स कोटे से ही था।

हम तीनों फ़िल्म देख कर निकले तो तकरीबन दोहपर का समय था जब DTC की बस में आल रूट स्टूडेंट पास का भरपूर लाभ उठाते हुए हम AIIMS पहुंचे।

वहाँ चारों ओर पुलिस ही पुलिस और हज़ारों लोगों का हुजूम तब AIIMS पर बना ग्रांड सेपरेटर ( एक तरह का फ्लाईओवर ) नहीं बना था, एक तरफ जोर बाग दूसरी तरफ सरोजनीनगर तीसरी तरफ IIT गेट और चौथी तरफ मूलचंद तक जाम लगा हुआ था… सैकड़ो पुलिस के जवान मतलब पूरा मसाला था जो हम तीनों को अपनी रुक रुक कर चलती या रुकती ज्यादा चलती कम बस से उतर कर तमाशा देखने को मजबूर करने को काफी था!

भीड़ में घुसने पर मालूम पड़ा कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी थी और उनका शव अंदर अस्पताल में है, लोग जोर जोर से इंदिरा गांधी अमर रहे, और जब तक सूरज चांद रहेगा इंदिरा तेरा नाम रहेगा के नारे लगा रहे थे, सब दुखी और हताश दिख रहे थे और बिना किसी के कहे या उकसाये अपने आप ही नारे लगा रहे थे, उधर सायरन बजाती लाल बत्ती लगी गाड़ियां जिनमें अम्बेडसर और उस जमाने में पुलिस द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बाबा आदम के जमाने की जीप गाड़िया ही ज्यादा थी, अस्पताल में लगातार आये जा रही थी और अस्पताल के बाहर लोगो की भीड़ और नारे बाजी बढ़ती जा रही थी।

तभी अंदर से भारत का झण्डा लगी हुई एक सफेद मर्सडीज कार अस्पताल से बाहर आती है जिसके आगे पीछे पुलिस की बहुत सारी गाड़ियां थी, को लोग घेर लेते हैं और खून का बदला खून चिल्लाते हुए अचानक उस गाड़ी पर पथराव शुरू कर देते हैं उसी बीच भीड़ में से कोई चिलाता है मारो सरदार को!

और वहाँ अफरा तफरी मच जाती है, उन्मादी भीड़ उस कार और उसके साथ वाली अन्य कारो पर भारी पथराव शुरू कर देती है पुलिस भीड़ को लाठीचार्ज करके काबू करने की कोशिश करती है, हम तीनों दोस्त वहाँ से यूसुफ सराय मार्किट होते हुए ग्रीन पार्क की तरफ भागते हैं। AIIMS से भागी भीड़ अब यूसुफ सराय मार्किट के पास बने एक गुरुद्वारा साहिब पर पथराव शुरू कर देती है। हम तीनों दोस्त जो सामने पड़ी उसी पहली बस में चढ़ कर IIT गेट की तरफ निकल लेते हैं!

IIT गेट पहुँच कर मैं फरीदाबाद के लिए और सरदार पूरन सिंह और रईस मियाँ लाजपतनगर, जहाँ से उन्हें कल्याण पूरी औऱ निजामुद्दीन के लिए बस मिलनी थी, निकल लिए वाकई हम बहुत डर गए थे!

घर पहुंच जान में जान आयी रात को पिताजी के आने पर और दूरदर्शन पर समाचार देखने पर पता चला कि जिस कार काफिले पर AIIMS के बाहर पथराव हुआ था वो राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का था।

अगले दिन पूरी दिल्ली में दंगे फैल चुके थे ऐसी खबरें थी कि कुछ जगहों पर सिक्ख भाइयों ने इंदिरा गांधी की हत्या होने पर मिठाइयां बांटी थी जिसने उन हालात में आग में घी का काम किया।

बताया जाता है कि रात में दिग्गज कांग्रेसी नेता और बाहरी दिल्ली से कोंग्रेस के सांसद सज्जन कुमार, ललित माकन, जो पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के दामाद भी थे, पूर्वी दिल्ली से सांसद और वहाँ के बेताज बादशाह कहे जाने वाले एक आँख वाले H.K.L.भगत और अर्जुन दास ने दंगाईयो को संगठित कर उन्हें पैसे, तलवार, लाठियाँ, सलाखे मुहैया करवाई।

एक नवम्बर को सुबह सुबह कांग्रेस के सांसद सज्जन कुमार ने कांग्रेसी कार्यकर्ता, गुंडे और दंगाइयों, जो ज्यादातर बाहरी दिल्ली के झुग्गी बस्तियों के रहने वाले बाहारी लोग थे, को लेकर रैली निकाली, उस रैली में सरेआम सिक्खों से बदला लेने के नारे लगाये गए।

त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी इलाको में सबसे ज्यादा सिक्ख मारे गए।

2 नवम्बर 1984, दंगों का तीसरा दिन

दिल्ली के कुछ इलाको में कर्फ्यू लगाया गया, लेकिन इसका कोई प्रभाव नहीं था। क्योकि पुलिस दंगाईयो को काबू करने में नाकाम रही थी, आर्मी बुलाई गई पर उन्हें सख्त आदेश थे कि वो दंगाईयों पर फाइरिंग ना करे। सिक्खों का नरसंहार जारी रहा।

3 नवम्बर 1984, दंगो का चौथा दिन छिट पुट घटनाओं को छोड़कर शाम तक दंगे थम जाते हैं। दिल्ली में सिक्ख की लाशों का अम्बार लग जाता है। 3 नवम्बर तक 2,700 सिख मारे गये। ( सरकारी आंकड़ों के मुताबिक) उन लाशो को एम्स अस्पताल ले जाया गया था।

दंगो की जांच के लिये मारवाह कमीशन, मिश्रा कमीशन, मित्तल कमिटी, नानावटी आयोग और कई अन्य आयोगों का गठन किया गया। आयोग और कोर्ट ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता सज्जन कुमार, R.K.आनंद, ललित माकन, H.K.L.भगत और कांग्रेस पार्टी को दंगे भडकाने और दंगाईयो कों मदद करने के आरोप में सीधा सीधा दोषी ठहराया। पर इस देश के ढीले ढाले कानूनी ढाँचे की बदौलत कोई कारवाई नहीं हो सकी।
कांग्रेस नेता जगदीश टायटलर के खिलाफ चल रहे सभी केस कोर्ट ने 2007 में पुख्ता सबूतों के अभाव में बंद कर दिए और उन्हें बरी कर दिया।
दंगो के बाद लगभग 250 FIR दर्ज की गई थी।
दिल्ली के सभी स्कूल कॉलेज बन्द थे हमारा भी बन्द था और मैं घर पर ही पिताजी और अन्य लोगो से दंगे की बाते सुन सुन कर अपने दोस्त पूरन सिंह के बारे में सोच कर चिंतित था क्योंकि जहाँ वो रहता था समाचारों के मुताबिक वो ही सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका बताया जा रहा था …..

क्रमशः
– इकबाल सिंह पटवारी

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