कौन कर रहा है आधुनिक भारत में दलितों पर ‘अत्याचार’

“ब्राह्मणिक पितृसत्ता के टुकड़े टुकड़े कर दो”, किसी दलित कार्यकर्ता ने टि्वटर के प्रमुख जैक डोर्सी को ऎसा पोस्टर पकड़ा के फोटो खींच के शेयर कर दिया।

इस पोस्टर के कारण उठे विरोध और तूफान के कारण ट्विटर को क्षमा याचना करनी पड़ी।

इस अपमान के कारण टि्वटर एवं तथाकथित दलित कार्यकर्ताओं को अपनी कार्यपद्धति पर पुनर्विचार करना चाहिए, जिसमें मैं बिना मांगे कुछ मदद कर सकता हूं।

आखिर स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद भी संसद, विधानसभा तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के बावजूद भी दलित समाज के कुछ लोग यह क्यों मानते हैं कि उन पर अत्याचार हो रहा है?

पूरे देश में सरकारी नौकरियों में लगभग 50% सीट दलित, जनजातियों, तथा पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित है। तमिलनाडु में यह संख्या 69 प्रतिशत हो जाती है जो अब महाराष्ट्र में भी होने जा रही है।

संसद और विधायिका में भी दलितों के लिए सीट आरक्षित है। एक तरह से पूरी प्रशासनिक एवं राजनीतिक शक्ति पर दलितों और पिछड़ों का अपने अनुपात के अनुसार आरक्षण है।

मुस्लिम समुदाय की संख्या कई राज्यों में 15 से 30% तक हैं। फिर इसाई, जैन, सिख, पिछड़े (जिन्हे आरक्षण नहीं मिला है), बौद्ध तथा अन्य समुदाय भी आ जाते हैं।

एक तरह से देखा जाए तो 50% आरक्षण के बाद अगले 35-40% ऐसे लोग हैं जो हिंदू समुदाय की तथाकथित उच्च जाति से नहीं आते।

इसके अलावा पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, दक्षिण के सभी राज्य, पंजाब इत्यादि में गैर भाजपा सरकारें हैं। मोदी सरकार के पहले केंद्र में और लगभग पूरे राष्ट्र में गैर भाजपा सरकारें थीं।

दलित नेता मायावती, पिछड़ों के मसीहा लालू यादव, राबड़ी देवी, मुलायम यादव, अखिलेश यादव, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत, शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू, शीला दीक्षित, करुणनिधि, भजनलाल, चौटाला, ममता बनर्जी, नितीश कुमार इत्यादि, इत्यादि ने राज्यों में कई वर्ष तक शासन किया।

इन सबके शीर्ष पर दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों की मसीहा, ईसा मसीह की अवतार, सोनिया गांधी ने केंद्र में 10 वर्ष तक शासन किया। उसके पहले उनके पति, सास, तथा परनाना ससुर जी ने सत्ता संभाली। 2014 के मध्य से अति पिछड़े वर्ग के नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अब तक दो दलित, तीन अल्पसंख्यक, एक सिख तथा एक महिला देश की राष्ट्रपति रह चुकी हैं या हैं।

अगर आप यूरोप के देशों या हमारे आस-पास चीन और जापान को देखें, तो यह सब के सब देश प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तबाह हो गए थे। इनमें से कई देशों की हालत 1947 के स्वतंत्र भारत से भी ज्यादा खराब थी। लेकिन देखते देखते कुछ ही वर्षों में अपने नेतृत्व की दूरदर्शिता के कारण यह सभी देश भारत से कहीं आगे निकल गए।

क्या यह माना जाए कि सफलता के बाद भारत को दोयम दर्जे का नेतृत्व मिला? इसीलिए हम प्रगति नहीं कर पाए तथा दलितों पर अत्याचार होता रहा। क्या इसके लिए भारत के 60 वर्षों के नेतृत्व को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए?

फिर दलित, पिछड़े, जनजातीय राजनीतिज्ञों, मुख्यमंत्रियों, सांसदों, विधायकों, IAS एवं पुलिस अफसरों के रोल पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहिए? क्यों नहीं उन्होंने दलितों पर होने वाले अत्याचार को समूल नष्ट करने की तरफ ध्यान नहीं दिया? क्यों उन लोगों ने दलितों की प्रगति को बढ़ावा नहीं दिया? क्या बात है कि दलित लोग अब आईएएस एग्जाम में टॉप कर जाते हैं; लेकिन इसके बाद भी उन्हें ब्राह्मणों के तथाकथित अत्याचार का सामना करना पड़ता है?

कहीं ऐसा तो नहीं है कि दलितों के विरुद्ध होने वाले अपराधों के आंकड़े, समस्त भारत में होने वाले अन्य समुदाय के विरुद्ध होने वाले अपराधों के अनुपात के अनुसार हों?

चूंकि अपराध के आंकड़े केवल दलित तथा अनुसूचित जातियों के लिए अलग से दिखाए जाते हैं, हमें यह नहीं पता कि भारत में अन्य समुदायों के विरुद्ध अपराधों के आंकड़ों की क्या स्थिति है।

आखिरकार वर्ष 2016 में फुल 30 लाख अपराध रिकॉर्ड किए गए। इनमें से लगभग 41 हज़ार अपराध दलितों के विरुद्ध थे। यानी कि कुल अपराधों का लगभग 1.4 प्रतिशत दलित के विरूद्ध था, जबकि दलितों की संख्या 15 से 20% तक है।

उन अपराधों को किस श्रेणी में गिना जाएगा जिन्हें किसी दलित ने अन्य दलित के विरुद्ध किया हो? या फिर किसी पिछड़े ने दलित के विरुद्ध किया हो; या फिर अल्पसंख्यक समुदाय ने दलित समुदाय को प्रताड़ित किया हो? वह अपराध भी तो दलितों के विरुद्ध किए गए अपराधों की श्रेणी में जुड़ जाते हैं। क्या उन्हें भी तथाकथित उच्च जाति के लोगों के मत्थे मढ़ना होगा?

एक भी अपराध गलत है, और नहीं होना चाहिए। लेकिन हम मानव हैं और कहीं ना कहीं कानून तोड़ने की हमारी प्रवृत्ति है। अगर अपराधों से पीड़ितों की संख्या समुदायों के अनुरूप हैं, तो अपराधों की हम निंदा तो कर सकते हैं, लेकिन इसे किसी समुदाय विशेष को चिह्नित करना तो नहीं बोल सकते?

क्या भारत के तथाकथित उच्च जाति के युवक-युवतियां बेरोज़गारी नहीं झेल रहे है? क्या इस वर्ग में निर्धनता नहीं है? क्या इस वर्ग को पुलिस की प्रताड़ना नहीं सहनी पड़ती है? क्या इन्हे “पितृसत्ता” का सामना नहीं करना पड़ता है? क्या इनके मन में अलगाववाद और आतंकवाद को लेकर गले तक आक्रोश नहीं भरा हुआ है?

क्या भ्रष्टाचार इनके सपने को नहीं निगल गया है? क्या निचले दर्जे की शिक्षा ने इन्हें इस काबिल बनाया कि वह प्रगति कर सकें? क्या यह वर्ग नहीं देख रहा कि कैसे चौथी पीढ़ी के कम नंबर पाए लोग आरक्षण का सहारा लेकर दिन-प्रतिदिन अमीर होते जा रहे है?

इनकी कहानियों, इनकी पीड़ा को कौन सामने लाएगा?

अन्याय होते लग रहा है तो ये तो बताएं इसे कैसे समाप्त करें!

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