इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार – 3

सरदार फौजा सिंह की मौत के बाद उनकी विधवा ने 1978 में आतंकवादी दल बब्बर खालसा की स्थापना की! अपने पति की मौत का बदला लेने के लिये.

वैसे अलग पंजाब देश के लिए “खालिस्तान” शब्द पहली बार 1971 में न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार में छपे विज्ञापन में NRI सिख Expat जगजीत सिंह चौअन ने इस्तेमाल किया था.

1978 में ही पंजाब की माँगों पर अकाली दल ने अपनी खोयी हुई जड़ों को पाने के लिए आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया.

इसके मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य सब विषयों पर राज्यों के पास पूर्ण अधिकार हो.

वे ये भी चाहते थे कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में उन्हें स्वायत्तता मिले. इसके मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य सब विषयों पर राज्यों के पास पूर्ण अधिकार हो.

हालात बद से बद्दतर हुए जा रहे थे जुलाई और अगस्त 1982 में दो बार इंडियन एयरलाइंस के जहाज को हाइजैक कर लाहौर ले जाया गया था. दो बार दरबारा सिंह की हत्या के भी प्रयास किये गए. 25 अप्रैल 1983 को जालंधर के दबंग डीआईजी एएस अटवाल की, जब वो दरबार साहिब में मत्था टेक कर बाहर आ रहे थे, स्वर्णमंदिर की सीढ़ियों पर गोली मारकर हत्या कर दी गई. हालात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि DIG अटवाल साहेब के साथ लगभग सौ भारी हथियारों से लैस गार्ड थे फिर भी उनकी लाश कई घण्टे लावारिस वहाँ सीढ़ियों पर पढ़ी रही थी और सिख समाज के सयाने लोगो के भिंडरावाले को गुहार लगाने के बाद पुलिस उनकी लाश वहाँ से उठा पाई थी!

उसी साल पांच अक्टूबर को आतंकियों ने अमृतसर से दिल्ली जाने वाली एक बस का अपहरण कर लिया और उसमें बैठे छह हिंदुओं को गोलियों से भून दिया.

हवा से लेकर सड़क तक और सड़क से लेकर रेल की पटरियों तक उखाड़े जाने की घटनाएं होने लगी थीं. जब तक सरकारी तंत्र उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करता, भिंडरावाले दिसंबर 1983 को स्वर्ण मंदिर के अकाल तख़्त की सुरक्षा में रहने लगा. हरदम 200 हथियारबंद लोग उसे घेरे रहते. वह समझ चुका था कि अब संघर्ष का दूसरा चरण आ चुका है. उसने स्वर्ण मंदिर में हथियार और गोला-बारूद जमा करने शुरू कर दिए थे. पंजाब में आतंकवाद चरम पर पहुंच चुका था.

तेज़ी से बदलते हालात में अकालियों और भिंडरावाले ने हाथ मिला लिए और वे एक साथ सरकार के ख़िलाफ़ खड़े हुए थे. 1982 में हरचरण सिंह लोंगोवाल ने ‘धर्म युद्ध’ मोर्चा की स्थापना की जिसकी मुख्य मांग आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को मनवाना थी.

इस प्रस्ताव की कुछ मांगें तो देश के संघीय ढांचे को तोड़ने वाली थीं. दूसरा, पंजाब को इसमें ज़्यादा अधिकार देने की मांग थी. हालांकि इसमें फौरी तौर पर खालिस्तान की मांग नहीं की गयी थी. BBC पत्रकार हरमिंदर कौर अपनी किताब ‘1984, लेसन फ्रॉम हिस्ट्री’ में लिखती हैं, ‘खालिस्तान की मांग पर भिंडरावाले की स्थिति कुछ साफ़ नहीं थी.’
पंजाब में असंतुलन बिगड़ चुका था और अब एक ही रास्ता रह गया था- सरकार और भिंडरावाले के बीच टकराव जो अब बस कुछ ही समय की बात थी.

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की ज़्यादातर मांगें इंदिरा सरकार ने नामंजूर कर दी थीं और जो मानी थीं उन पर अमल नहीं किया था. टकराव बढ़ता ही जा रहा था. बकौल हरमिंदर कौर ‘सरकार और असंतुष्टों के बीच 1984 में छह बार मीटिंग हुई और आख़िरी मीटिंग मई, 26, 1984 को हुई . ये भी बेनतीजा रही. न इंदिरा गांधी मानने को राज़ी थीं और न ही भिंडरावाले गुट के लोग.

भिंडारवाले ने अब तेज़ी से स्वर्ण मंदिर को एक किले में तब्दील कर दिया. उसका साथ देने वालों में फौज के पूर्व मेजर-जनरल शुबेग सिंह और सिख फेडरेशन ऑफ़ इंडिया का मुखिया अमरीक सिंह भी था.’ कौर आगे लिखती हैं ‘बीबीसी ने संत लोंगोवाल से इंटरव्यू में पूछा कि क्या स्वर्ण मंदिर की किलेबंदी की जा रही है तो उन्होंने न में जवाब दिया.’

रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं, ‘शुबेग की निगरानी में मंदिर की दीवारों पर रेत के बोरे रखे गए थे और प्लान बनाया गया कि संघर्ष को तब तक जिंदा रखा जाएगा जब तक आम पंजाबी विद्रोह न कर दे. दूसरी तरफ भारतीय फौज के तत्कालीन मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार को आंतकवादियों के ख़िलाफ़ कमान सौंपी गयी.’ “रॉ” की योजना स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरावाले को सेना की मदद से अंदर घुस कर जिंदा पकड़ लेने की थी पर हमेशा जैसा सोचा जाता है वैसा नही होता.

भारत सरकार को पक्की जानकारी तत्तकालीन ब्रिटिश सरकार जहाँ मारग्रेट थैचर प्रधान मंत्री थी जिनसे श्रीमती इंदिरा गांधी के सम्बंध अत्यंत ही आत्मीय थे और वहाँ की खुफिया एजेंसियों से मिल खबर डी कि भिंडरावाले की योजना किसी भी समय एक अलग राष्ट्र की घोषणा कर देने की है.

दमदमी टकसाल पृथक खालिस्तान की करेन्सी पहले ही छापना शुरू कर चुकी थी ब्रिटिश सेना और गुप्तचर विभाग के लोग दिल्ली आ चुके थे और भारतीय गुप्तचर एजेंसीयों और सेना की मदद कर रहे थे.

सेना को सख्त आदेश था कि ‘अकाल तख़्त’ पर गोलीबारी नहीं की जायेगी. कुलदीप सिंह बरार अपनी किताब ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में लिखते हैं, ‘सबसे ज़्यादा गोलीबारी अकाल तख़्त की तरफ से ही हो रही थी और हम उधर फायर नहीं कर सकते थे.’ फौजी और आतंकी तड़ा-तड़ गिर रहे थे. रात के दो बज गए थे और काम अभी आधा भी नहीं हुआ था. समय निकला जा रहा था. बरार ने आतंकियों की ताक़त का गलत अंदाज़ा लगा लिया था.

रामचंद्र गुहा लिखते हैं, ‘बरार ने दिल्ली फ़ोन करके टैंकों से हमले की इजाज़त मांगी जो तुरंत ही मंज़ूर हो गयी. उसके बाद फौज के ‘विजेता टैंकों’ ने मंदिर की बाहरी दीवार तोड़कर ताबड़तोड़ बमबारी की जिससे आतंकियों को काफी नुकसान हुआ. इस अंतिम हमले में शुबेग सिंह, अमरीक सिंह और भिंडरावाले मारे गए. ऑपरेशन ब्लू स्टार को कुछ दिनों बाद रोक दिया गया. इस ऑपरेशन में लगभग 200 आतंकी मारे गए. फौज के 79 जवानों की भी जान गई जिनमें चार अफसर थे.

उसी साल 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी. इसके बाद दिल्ली और पूरे देश में सिख विरोधी दंगे भड़क गए. अगले ही साल जनरल वैद्य की पुणे में हत्या हो गई. इंग्लैंड में कुलदीप सिंह बरार का गला रेतकर उन्हें मारने की कोशिश हुई. पंजाब में आतंकवाद की आग और भड़क गयी. 1985 में संत लोंगोवाल की हत्या कर दी गयी।

क्रमशः
– इकबाल सिंह पटवारी

इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार -2

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