एकालाप का रोग ही है तो सोशल मीडिया छोड़ संस्थानों-खानदानों के पालतू बन जाइए

एक स्वघोषित विद्वान हैं। स्वघोषित इसलिए कि मेरे एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उन्होंने बहुत-सी किताबें पढ़ रखी हैं और नेट सर्च कर कल (19 नवंबर को) पैदा होने वाले तमाम शख्सियतों के नाम गिना सकते हैं, और भी बहुत कुछ कर सकते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा कौन-सा सवाल था; तो सुनें… उन्होंने कल इंदिरा गांधी की जयंती पर उन्हें आदरपूर्वक याद किया और उनकी शख्सियत के विविध पहलुओं पर ऋचा उपमा (शायद यही नाम) द्वारा लिखी जा रही एक क़िताब का ज़िक्र किया।

इंदिरा गांधी की प्रशंसा या उनकी शख्सियत के विविध पहलुओं पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? यह उसकी निजी रुचि हो सकती है; परंतु उस प्रशंसा के साथ भारत के असहिष्णु दौर और साढ़े चार साल के ”कयामत… घोर कयामत” का भी ज़िक्र था।

इससे पूर्व भी उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता घोषित करते हुए एक लेख लिखा था, यहाँ भी किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, जैसी जिसकी श्रद्धा..; पर यहाँ भी उन्होंने नेहरू को निर्माता घोषित करते हुए संघ-भाजपा को फ़ासिस्ट, पुरातनपंथी, सांप्रदायिक बताते हुए पिछले साढ़े चार साल के कार्यकाल को देश के लिए एक भयानक दुःस्वप्न, असहिष्णु दौर और न जाने क्या-क्या बताया?

आप फिर कहेंगे कि भई सवाल तो बताओ? तो सुनिए, मैंने कल उनसे सवाल किया कि….

सर जी, आज (19 नवंबर) भारतीय इतिहास के सबसे चमकदार सितारों में से एक महारानी लक्ष्मीबाई की भी जयंती है, क्या उनके लिए भी दो शब्द आपकी वॉल पर मिल जाएँगे?

इतना कहते ही उन्होंने इसे परोक्ष हमला बताते हुए अपने को भारी विद्वान और न जाने क्या-क्या बताते हुए बोला कि ”नेट सर्च कर मैं उन तमाम शख्सियतों के नाम बता सकता हूँ जो आज पैदा हुए। और लक्ष्मीबाई पर ये-ये पुस्तकें इन-इन लोगों ने लिखीं और मैंने इन्हें पढ़ा है और मित्रों के जन्मदिवस पर उपहारस्वरूप भेंट भी की हैं, क्या आपने किया?”

तुरंत एक और स्वघोषित लेखिका ने जवाब दिया कि – ”वाह सर! आपकी तार्किकता का जवाब नहीं!”

यद्यपि मैंने उन्हें पुस्तकों के नाम सुझाने के लिए धन्यवाद दिया; जबकि मैं कह सकता था कि मेरे इस प्रश्न का यह जवाब तो बिल्कुल नहीं मान्यवर; जबकि मैं कह सकता था कि मेरे इस छोटे-से प्रश्न से आप इतना तिलमिला गए प्रभु कि मुझ जैसों को हमलावर, अज्ञानी और पूर्वाग्रही कहने लगे…

जबकि मैं कह सकता था कि संघ-भाजपा को दिन-रात गाली देना आपका परम पुनीत कर्त्तव्य है भगवन, और मेरा एक सवाल एजेंडा, दुःसाहस, पूर्वाग्रह; जबकि मैं कह सकता था कि मान्यवर, झाँसी की रानी आपको सत्ता की मलाई नहीं दिला सकतीं, इसलिए आप उन्हें न याद कर कभी इंदिरा, कभी नेहरू, कभी सोनिया की विरुदावलियां गाते हैं…

जबकि मैं कह सकता था कि हे सर्वज्ञ, भारत की सनातन परंपरा में ज्ञान का सीधा संबंध व्यक्ति के आचरण से जुड़ता है; दस-बीस किताबें पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं बनता! और दूसरों को अज्ञानी घोषित करने वाला तो बिलकुल भी नहीं!

ऐसे ही थोड़े न इस देश ने कबीर, सूर, तुलसी, मीरा को सर-माथे बिठाया है। तमाम सत्ता-केंद्र और प्रचार-तंत्र मिलकर भी कथित विद्वानों-साहित्यकारों को जनता के हृदय में उतार नहीं पाते और वे बिना किसी सांस्थानिक प्रयास के ही लोक के कण्ठहार और हृदय के उद्गार बने रहे।

ख़ैर उनकी सुझाई पुस्तकों के नाम पर मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और भविष्य में पढ़ने का वादा भी किया। पर कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई दोस्तों! यह तो शुरुआत भर थी….!

दिन भर की व्यस्तता के बाद रात को जब मैं घर लौटा तो उनकी वॉल पर मैंने इन शब्दों में पुनः प्रश्न किए (ये भाव थे, उत्खनन के अभ्यस्त बौद्धिक कृपया शब्दों की खुदाई के चक्कर में न पड़ें) :

”सर जी, इस देश के हर प्रधानमंत्री ने अपने-अपने स्तर पर देश के विकास में योगदान दिया है। निःसंदेह नेहरू-इंदिरा का भी योगदान रहा है, क्योंकि सर्वाधिक समय तक उन्होंने ही शासन किया। किंतु क्या इस आधार पर उनके सभी निर्णयों को क्लीन चिट दे दी जाए?

इस देश की सारी उपलब्धियों का यदि आप उन्हें श्रेय देते हैं तो अनुपलब्धियों और विफलताओं का किन्हें देंगे? क्या इस देश के तंत्र में पैठी तमाम खामियों के लिए उन्हें जिम्मेदार न समझा जाय? क्या व्यवस्था में व्याप्त आकंठ भ्रष्टाचार के लिए ये ज़िम्मेदार नहीं? क्या वंशवादी प्रवृत्तियों के लिए ये जिम्मेदार नहीं?

क्या देश को तमाम अंतर्बाह्य संकटों में झोंकने के लिए ये जिम्मेदार नहीं? चाहे चीन का संकट हो या कश्मीर का; भाषा का या क्षेत्र का; मज़हब या आरक्षण का… यह देश तमाम मुद्दों पर जो बंटा-कटा नज़र आता है, द्वंद्व में फंसा नज़र आता है, उन सबके लिए कौन ज़िम्मेदार है, क्या उनसे कोई सवाल नहीं बनते?

सारे सवाल गत साढ़े चार साल के शासन और शासकों से; ये तो बहुत नाइंसाफ़ी होगी हुज़ूर!

मान्यवर, नेहरू-गाँधी को इस देश ने इतना वक्त दिया था कि ये चाहते तो देश की मुक़म्मल-मनचाही तस्वीर गढ़ सकते थे, हमारे साथ ही जो मुल्क आज़ाद हुए उन्होंने हमसे अधिक बेहतर-मुक़म्मल तस्वीर गढ़ी, भगवान के लिए अब आप भारतीय उपमहाद्वीप के छोटे-छोटे देशों के नाम मत गिनाइएगा कि देखिए उनकी क्या हालत है और हम कितना आगे हैं?

भगवान के लिए यह भी मत कहिएगा कि इन दोनों ने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को ज़िंदा रखा; बल्कि इन्होंने लोकतंत्र को परिवार के नाम नीलाम कर दिया, तुष्टिकरण की अति कर धर्मनिरपेक्षता को भयानक चोट पहुँचाई। अरे, भारत का मूल चरित्र ही लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है, वह भी केवल इसलिए कि सनातन जीवन-पद्धत्ति में संकीर्णता के लिए कोई स्थान ही नहीं रहा है।

लोकतंत्र हमारी रगों में लहू बनकर दौड़ता है, हम ईसा के सैकड़ों वर्ष पूर्व गणतंत्र की स्थापना कर चुके थे, वैशाली गणराज्य इसका उदाहरण था; हमारे यहाँ जितने लोग हैं उतने संप्रदाय की संभावना रहती है; धर्म हमारे लिए मृत पुस्तक या प्रतीक मात्र नहीं!सभी मतों और पंथों को हमने सदैव फलने-फूलने का अवसर दिया है।

मान्यवर, आप व्यक्ति को महामानव बनाएँगे तो सवाल खड़े होंगे, उनके योगदान की चर्चा कीजिए, उनका प्रशस्ति-गायन मत कीजिए। कोई भी व्यक्ति सवालों से परे नहीं है, न हम, न आप, न यह तंत्र, न इसके कर्त्ता-धर्त्ता..!

मान्यवर, केवल आपातकाल ही इंदिरा गांधी के सभी सुकर्मों पर पानी फेरने के लिए पर्याप्त है। क्या आप उसे भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए लिया गया एक ऐतिहासिक निर्णय बताएँगे? मैं समझता हूँ कि यह आप नहीं करेंगे क्योंकि इतनी बौद्धिक ईमानदारी तो बरतेंगे आप।”

मेरी इस टिप्पणी पर उनकी वॉल पर असहमति के कुछ अन्य स्वर भी सुनाई दिए। मित्रों, मुझे उम्मीद थी कि शायद स्वघोषित विद्वान् अपने तर्कों के तूणीर से तथ्यों के कतिपय ब्रह्मास्त्र निकालेंगे और विमर्श निष्कर्ष तक पहुँचेगा और उन मोहतरमा को एक बार फिर यह कहने का सौभाग्य प्राप्त होगा कि ”वाह सर! आपकी तार्किकता का जवाब नहीं!”

पर हाय रे दुर्भाग्य! उस महाज्ञानी ने मुझ अल्प-ज्ञानी को ब्लॉक कर दिया। ज्ञानी लोग कितने घबराए हुए हैं कि अल्पज्ञानियों से डरकर मैदान छोड़ जाते हैं।

पर चलते-चलते उस महाज्ञानी को यह अल्पज्ञानी कहना चाहता है कि एकालाप का ऐसा ही रोग पाल रखा है प्रभु तो सोशल मीडिया का मैदान छोड़कर संस्थानों-खानदानों के पालतू बन जाइए। सोशल मीडिया तो विमर्श का खुला मंच है, यहाँ एकालाप या प्रशस्ति-गायन नहीं चलेगा। और हाँ प्रभु! मनुष्य का मनुष्य हो जाना ही उसकी चरम उपलब्धि है, शेष तो सब बाहरी आकर्षण हैं, समय के साथ उन सबकी चमक का फीकी पड़ जाना ही उनकी एकमात्र नियति है!

नमन उस वीरांगना को जिनके स्मरण मात्र से नस-नस में दौड़ जाती हैं विद्युत तरंगें

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