सोशल मीडिया : यह दुनिया आभासी नहीं, ‘आभा-सी’ है

फेसबुक या सोशल मीडिया एक अथाह सागर की तरह है। इस सागर मे हर समय कई गोताखोर डुबकी लगाते हैं। सब कुछ ना कुछ तलाश रहे हैं। आज के दौर में जब ऐसा प्रतीत होता है कि सोशल मीडिया केवल धर्म जाति और राजनीतिक बहस का अड्डा बन गया है उसी समय कुछ ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जो सोशल मीडिया के प्रति प्रेम को फिर से जागृत कर देते हैं।

तस्वीर ढाई साल की आरुषि और उसके दादा दादी की है।

आरुषि के माता पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। करीबन ढाई साल पहले उसकी मां ने आरुषि और उसकी जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। जन्म देने के पश्चात उनकी तबियत बिगड़ती गयी और एक बेटी और एक बेटे को छोड़ कर माँ चल बसी।

एक ओर बच्चों के पिता पर नवजात शिशुओं को सम्भालने की ज़िम्मेवारी थी और दूजी ओर अपनी जीवनसंगिनी को खो देने का अथाह दुःख था। दादा दादी पर भी बच्चों को सम्भालने की ज़िम्मेवारी आन पड़ी।

कुछ ही दिन बाद कुछ ऐसा हुआ जिसने आरुषि के दादा दादी की दुनिया हिला दी। एक हादसे में आरुषि के पिता भी चल बसे। अभी बहू की चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि वृद्ध दम्पति अपना इकलौता बेटा भी खो चुके थे। एक ओर बेटे का शव था और दूजी ओर गोद में दो अबोध बच्चे थे जो जानते भी नहीं थे के वह माता पिता को खो चुके हैं।

बामुश्किल किसी तरह वृद्ध दम्पति ने हिम्मत की और बच्चों की परवरिश शुरू की। अपने बेटे और बहू को खो चुके दादा दादी हंसना मुस्कुराना भूल गये थे। परन्तु बच्चे करिश्माई होते हैं। हंसती खिलखिलाती बच्चों ने बुज़ुर्गों के चेहरे पर फिर से मुस्कान वापिस लौटा दी।

परंतु प्रकृति ने एक बार फिर वृद्ध दम्पति का इम्तेहांन लिया। डेढ़ साल की आरुषि को हड्डियों की एक खतरनाक बीमारी Congenital Pseudarthrosis ने अपनी चपेट में ले लिया। डॉक्टर्स ने कहा के आरुषि तत्काल एक सर्जरी की आवश्यकता है। अगर अभी सर्जरी ना की गई तो आरुषि इस हड्डियों की बीमारी के चलते कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकेगी। सर्जरी का कुल खर्च 16 लाख रुपये बताया गया।

वृद्ध दादा की आर्थिक स्थिति पहले ही डांवाडोल थी और ऑपरेशन के लिये लाखों की आवश्यकता थी। इधर उधर भटकते दादा जी कुछ पैसों का इंतज़ाम कर पाये और आरुषि को लेकर चिंता दिनप्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।

इसी बीच आरुषि की इस कहानी को मुम्बई के विख्यात फेसबुक पेज ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे (Humans of bombay) तक पहुंची। इस फ़ेसबुक पेज से कई लोग जुड़े हुये हैं। ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे ने अपने पाठकों के आह्वान किया कि आरुषि की सर्जरी पर आने वाले खर्च को वह मिल कर एकत्रित करें।

परंतु राशि बहुत बड़ी थी। 1600000 रुपये की आवश्यकता थी। एक कैम्पेन शुरू किया गया और आरुषि की मदद के लिये राशि पहुंचाने हेतु एक बैंक अकाउंट नम्बर दिया गया।

फिर जो हुआ उसने साबित कर दिया कि राशि बड़ी नहीं थी लोगों का दिल उससे भी बड़ा था।

6 घंटे।

मात्र 6 घंटे में 16, 000,00 की राशि इक्कठी हो चुकी थी। किसी ने 50,000 रुपये दान किये तो किसी ने 50 रुपये का योगदान दिया और 6 घँटे में ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे के इस अभियान के द्वारा 17,98,171 रुपये इक्कठे हो चुके थे।

आरुषि की सर्जरी हुई और सफलतापूर्वक हुई। आज आरुषि चल सकती है। दौड़ सकती है। हज़ारों लोगों ने एकजुट होकर आरुषि को विकलांग होने से बचा लिया है। हज़ारों लोगों की मदद से आज बुज़ुर्ग दादा दादी चैन की नींद सो रहे हैं।

यह है फेसबुक की असली ताकत। द रियल पावर ऑफ सोशल मीडिया। जिन्होंने आरुषि को यह नवजीवन दिया है उनका कोई नाम नहीं है।

वह बस इंसान हैं। उनके सीने में एक दिल है जो किसी की खुशी देख कर हंसता है और किसी का गम देख कर रो पड़ता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जातीय और धार्मिक उन्माद फैलाने वालों की कमी नहीं है वहीं दूजी ओर ऐसे असंख्य लोग हैं जिनका मानवता से भरा दिल किसी “आरुषि” को देख कर पिघल जाता है। यही वजह है कि हर जाति हर वर्ग हर धर्म के व्यक्ति ने आरुषि की मदद में राशि भेजी है।

फेसबुक रूपी समुद्र में आज भी असंख्य लोग डुबकी मारते हैं तो अपने साथ बैर वैमनस्य या भेदभाव नहीं प्यार और सद्भाव लेकर बाहर आते हैं। मेरे लिये आज भी फेसबुक की दुनिया खूबसूरत है और इसे और खूबसूरत बनाने का प्रयास जारी रहेगा।

कभी कभी प्रभु-लीला भी झुक जाती है, प्रेम-लीला के आगे

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